Sunday, July 30, 2017

राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' से आपत्ति क्यों ?

सत्यम सिंह बघेल (आलेख)

मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु के सभी स्कूल-कॉलेजों, सरकारी दफ्तर और संस्थानों में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' गाना अनिवार्य करने का ऑर्डर दिया। अगर इसके संस्कृत और बंगाली भाषा में होने के चलते कोई परेशानी आए तो सरकार तमिल में अनुवाद करा इसे सभी सरकारी वेबसाइट्स पर अपलोड करे। सुनवाई के दौरान जज ने कहा- ''देशभक्ति हर नागरिक के लिए जरूरी है। सभी को समझना चाहिए कि देश मातृभूमि होती है। इसकी आजादी के लिए कई लोगों ने कुर्बानी दी है। 

जिसके बाद महाराष्ट्र के बीजेपी विधायक राज पुरोहित ने महाराष्ट्र में भी इस फैसले को लागू करने की मांग किये, उन्होंने कहा कि मैंने सीएम देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की है, हम चाहते हैं कि सीएम सभी के लिए वंदे मातरम् गाया जाना अनिवार्य करें। इसके बाद महाराष्ट्र सपा और एआईएमआईएम के नेता इसका विरोध किया। AIMIM के विधायक वारिस पठान ने कहा कि मैं वंदे मातरम् नहीं गाऊंगा, चाहे कोई मेरी कनपटी पर रिवाल्वर ही क्यों ना रख दे, किसी एक विचारधारा को हम पर थोपा नहीं जा सकता। मेरा धर्म (इस्लाम) और कानून इसे गाने की इजाजत नहीं देता है, हम विधानसभा में भी इसका विरोध करेंगे। दूसरी ओर, महाराष्ट्र के सपा नेता और विधायक अबु आजमी ने कहा, मैं राष्ट्रगीत नहीं गा सकता हूं, चाहे देश से बाहर क्यों ना निकाल दिया जाऊं, मैं इस्लाम का सच्चा फॉलोअर हूं, इसे गाना मेरे धर्म के खिलाफ है, कोई भी मुसलमान इसे कभी नहीं गाएगा।

यदि बाँग्ला भाषा को ध्यान में रखा जाय तो इसका शीर्षक 'बन्दे मातरम्' होना चाहिये 'वन्दे मातरम्' नहीं। चूँकि हिन्दी व संस्कृत भाषा में 'वन्दे' शब्द ही सही है, लेकिन यह गीत मूलरूप में बाँग्ला लिपि में लिखा गया था और चूँकि बाँग्ला लिपि में व अक्षर है ही नहीं अत: बन्दे मातरम् शीर्षक से ही बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसे लिखा था। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शीर्षक 'बन्दे मातरम्' होना चाहिये था। परन्तु संस्कृत में 'बन्दे मातरम्'का कोई शब्दार्थ नहीं है तथा 'वन्दे मातरम्' उच्चारण करने से 'माता की वन्दना करता हूँ' ऐसा अर्थ निकलता है, अतः देवनागरी लिपि में इसे वन्दे मातरम् ही लिखना व पढ़ना उचित होगा।

सन् 2003 में, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक अन्तरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिये दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और बी.बी.सी. के अनुसार 155 देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था।

1870 के दौरान अँग्रेज हुक्मरानों ने 'गॉड सेव द क्वीन' गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेज़ों के इस आदेश से बंकिमचंद्र चटर्जी को, जो तब एक सरकारी अधिकारी थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने संभवत:1876 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नए गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया "वंदे मातरम्"। शुरुआत में इसके केवल दो पद रचे गए थे, जो केवल संस्कृत में थे। गीत के पहले दो छंदों में मातृभूमि की सुंदरता का गीतात्मक वर्णन किया गया था, लेकिन1880 के दशक के मध्य में गीत को नया आयाम मिलना शुरू हो गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि बंकिम चंद्र ने 1881 में मातृभूमि के प्रेम से ओतप्रोत इस गीत को अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में शामिल कर लिया। उसके बाद कहानी की माँग को देखते हुए उन्होंने इस गीत को और लंबा किया। बाद में जोड़े गए हिस्से में ही 'दशप्रहरणधारिणी', कमला और वाणी के उद्धरण दिए गए हैं। लेखक होने के नाते बंकिमचंद्र को ऐसा करने का पूरा अधिकार था और इसको लेकर तुरंत कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं हुई, यानि तब किसी ने ऐसा नहीं कहा कि यह मूर्ति की वंदना करने वाला गीत है। काफ़ी समय बाद जब मुस्लिम लीग की स्थापना हुई उसके बाद यह राष्ट्रगीत से एक ऐसा गीत बन गया, जिसमें सांप्रदायिक निहितार्थ थे। 1920 और ख़ासकर 1930 के दशक में इस गीत का विरोध शुरू हुआ।

अभी भी कुछ मुस्लिम नेता 'वन्दे मातरम्' का विरोध करते हैं। जबकि इस गीत के पहले दो बन्द, जो गाये जाते हैं उनमें कोई भी मुस्लिम विरोधी बात नहीं है और न ही किसी देवी या दुर्गा की आराधना है। पर इन लोगों का कहना है कि इस्लाम किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करने को मना करता है और इस गीत में दुर्गा की वन्दना की गयी है, यह ऐसे उपन्यास से लिया गया है जो कि मुस्लिम विरोधी है, दो बन्द के बाद का गीत, जिसे कोई महत्व नहीं दिया गया, जो कि प्रासंगिक भी नहीं है में दुर्गा की अराधना है। राष्ट्रगीत के दो पदों में एक शब्द भी ऐसा नहीं है, जो इस्लाम के विरुद्ध हो। संस्कृत का'वन्दे' शब्द वंद धातु से बना है, जिसका मूल अर्थ है, प्रणाम, नमस्कार,सम्मान, प्रशंसा और कुछ शब्दकोशों में पूजा-अर्चना भी लिखा हुआ है लेकिन लाखों वर्गमील में फैली भारत-भूमि की कोई कैसे पूजा कर सकता है? क्योंकि वह कोई व्यक्ति, मूर्ति, पेड़-पौधा, चित्र या मूर्ती नहीं है, उसे किसी मंदिर या देवालय में स्थापित नहीं किया जा सकता, कोई उसका अभिषेक कैसे करेगा, उसकी आरती कैसे और किस जगह करेगा, परिक्रमा कैसे लगाएगा? यहाँ मातृभूमि की वंदना का मतलब यह है कि अपने राष्ट्र के प्रति आस्था और सम्मान रखना। मातृभूमि की मूर्तिपूजा जैसी पूजा तो बिलकुल असंभव है लेकिन आस्था के रूप में यह मान लिया जाये कि मातृभूमि पूज्य है तो इससे तौहीद (एकेश्वरवाद) का विरोध कैसे हो सकता है ? क्या मातृभूमि अल्लाह की रकीब (प्रतिद्वंद्वी) बन सकती है ? मातृभूमि की जो पूजा करेगा, क्या वह यह मानेगा कि उसके दो अल्लाह हैं, दो ईश्वर हैं, दो गॉड हैं, दो जिहोवा हैं, दो अहोरमज्द हैं ? बिलकुल नहीं। दो ईश्वर तो हो ही नहीं सकते। यदि मातृभूमि पूज्य है तो ईश्वर परमपूज्य है। दोनों में न तो कोई तुलना है न बराबरी है। रही बात वन्दे मातरम् के उर्दू मतलब का, तो 'वन्दे' मतलब है, सलाम या तस्लीमात। कहीं भी 'वन्दे' शब्द को इबादत या पूजा नहीं कहा गया है। क्या किसी को भी सलाम करने कि इस्लाम में मनाही है? इसी तरह वन्दे मातरम् के अंग्रेजी में 'वन्दे' को 'सेल्यूट' कहा जाता है। उसे कहीं भी पूजा '(वरशिप)' नहीं कहा गया है। इसलिए वन्दे मातरम् को तौहीद के विरुद्ध खड़ा करना और उसे इस्लाम-विरोधी बताना बिलकुल भी तर्कसंगत नहीं लगता। वन्दे मातरम् कभी किसी हिन्दू मंदिर या देवालय में नहीं गया जाता है, क्योंकि वह धर्मगीत नहीं राष्ट्रगीत है. इसीलिए राष्ट्रगीत को बुतपरस्ती से जोड़ने में कोई बुद्धिमानी दिखाई नहीं पड़ती। हर इस्लामी देश अपनी मातृभूमि का सम्मान करता है, आस्था रखता है, अपनी मातृभूमि प्रति श्रद्धा रखने का विरोध कोई इस्लामी देश नहीं करता है। अफगानी लोगों ने ही हमने 'मादरे-वतन' शब्द सिखाया, क्या वे लोग मुसलमान नहीं हैं? बांग्लादेश के राष्ट्रगान में मातृभूमि का उल्लेख चार बार आया है। क्या सरे बांग्लादेशी काफिर हैं? इंडोनेशिया, तुर्की और सउदी अरब के राष्ट्रगीतों में भी मातृभूमि के सौंदर्य पर जान अनुपम वर्णन है। क्या ये राष्ट्र इस्लाम का उल्लंघन कर रहे हैं? मातृभूमि कि वंदना पर हिन्दुओं का एकाधिकार नहीं है.इसे हिन्दू, मुसलमान, बौद्ध सभी मानते हैं।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत के सभी मुसलमानों को इस पर आपत्ति जताते हों। सच्चाई तो यह है कि वन्दे मातरम् का विरोध मुसलमानों ने नहीं मुस्लिम लीग ने किया था. जबकि उससे पहले इस गीत को हमारे स्वतंत्रता सेनानी आजादी की लड़ाई के दौरान लोगों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए गाते थे। बंगाल के हिन्दुओं और मुसलमानों ने यही गीत एक साथ गाकर बंग-भंग का विरोध किया था, कांग्रेस के अधिवेशनों में मुसलमान अध्यक्षों की सदारत में यह गीत हमेशा लाखों हिन्दू और मुसलमानों ने साथ-साथ गया है, गाँधी के हिन्दू और मुस्लमान सत्याग्रहियों ने चाहे वे बंगाली हों या पठान, वन्दे मातरम् गाते-गाते अपने सीने पर अंग्रेजों की गोलियां खाएँ हैं. उस दौरान स्वाधीनता-आन्दोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा। धीरे-धीरे यह गीत लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया। ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से भयाक्रान्त हो उठी और उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया। सन् 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया। पाँच साल बाद यानी सन् 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। सन् 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने स्वर दिया। कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आजादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं। लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस 'जर्नल' का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम वन्दे मातरम् रखा। अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़नेवाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जुबान पर आखिरी शब्द ‘वन्दे मातरम्’ ही थे। सन् 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया तो उसके मध्य में ‘वन्दे मातरम्’ ही लिखा हुआ था। मौलाना आजाद से बढ़कर इस्लाम को कौन मुसलमान जनता था? उन्होंने स्वयं इस गीत को गाने की सिफारिश की थी।भारत के पूर्व राष्ट्रपति कलाम जी ने हमेशा राष्ट्रगीत गाया और सम्मान किया। कुछ साल पहले विख्यात संगीतकार ए.आर. रहमान ने, जो ख़ुद एक मुसलमान हैं, वन्दे मातरम् को लेकर एक संगीत एलबम तैयार किया था जो बहुत लोकप्रिय हुआ। मुस्लिम लीग को सिर्फ वन्दे मातरम् से ऐतराज़ नहीं था, हर उस चीज़ से उसे नफरत थी, जो हिन्दू और मुसलमान को जोड़े रखती थी। वर्तमान में मुस्लिम नेताओं द्वारा विरोध करना अधिकतर लोगों का मानना है कि यह विवाद राजनीतिक है और जो राष्ट्रगीत नहीं गाने का ऐलान कर रहे हैं, वे देशद्रोही नहीं बुद्धिद्रोही हैं।

राष्ट्रगीत का हिन्दी अनुवाद जिसे गाया जाता है-

वंदे मातरम्‌।- (हे माँ तुझे प्रणाम)  
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्‌-
सुजलाम- सुजल (पानी) से भरी हुई, सुफलाम्- फलों से भरी हुई, मलयज का मतलब है मलय (जो की केरल के तट का नाम है) मलयज शीतलाम से यहाँ मतलब ये है की हे माँ तुम, जिसे मलय से आती हुई शीतल हवा ठंडा करती है, कवि भारत माँ की विभिन्न विशिष्टताओं का वर्णन कर रहा है।

स्यश्यामलां मातरम्‌-                                   
सस्य का मतलब होता है उपज/खेती/फ़सल, श्यामला का मतलब श्याम से है अर्थात गेहरा रंग, पूरे वाक्यांश का मतलब ये है की हे माँ तुम जो फसल से ढकी रहती हो।

शुभ्रज्योत्‍स्‍नापुलकितयामिनीं (शुभ्रय+ज्योत्सना+पुलकित+यामिनी)-
शुभ्र-चमकदार, ज्योत्सना- चन्द्रमा की रौशनी(चांदनी), पुलकित- अत्यधिक खुश/रोमांचित, यामिनी-रात्रि, पूरे वाक्यांश का मतलब है- वो जिसकी रात्रि को चाँद की रौशनी शोभायमान करती है।

फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीं (फ़ुल्ल+कुसुमित+द्रुम+दल+शोभिनी)-
फ़ुल्ल- खिले हुए कुसुमित(फूल), द्रुम- वृक्ष, दल- समूह, शोभिनीं- शोभा बढ़ाते हैं, पूरे वाक्यांश का मतलब है- वो जिसकी भूमि खिले हुए फूलों से सुसज्जित पेड़ों से ढकी हुई है।

सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीं-                         
सुहासिनीं- सदैव हंसने वाली, सुमधुर भाषिनी- मधुर भाषा बोलने वाली

सुखदां वरदां मातरम्‌-                                 
सुखदां- सुख देने वाली, वरदां- वरदान देने वाली

वंदे मातरम्‌- (हे माँ तुझे प्रणाम)।

नीतीश कुमार की यथार्थवादी राजनीति

सत्यम सिंह बघेल (आलेख)

आखिरकार बिहार की राजनैतिक हवाओं में जिसकी महक थी वही हुआ। बुधवार शाम नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से स्तीफा देकर महागठबंधन के टूटने का ठीकरा लालू और कांग्रेस पर फोड़ दिया। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे RJD प्रमुख लालू यादव के बेटे और बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से इस्तीफा मांगने के सवाल पर नीतीश ने कहा कि उन्होंने तेजस्वी से इस्तीफा नहीं स्पष्टीकरण मांगा था। उन्होंने कहा कि अगर वे (तेजस्वी और लालू) स्पष्ट कर देते तो हमें भी एक आधार मिल जाता। हमें लगा कि उनके पास जवाब नहीं है। ऐसे में हम सरकार चलाने की स्थिति में नहीं है इसलिए मैंने इस्तीफा दे दिया। यह पहला ऐसा मामला है जब किसी मुख्यमंत्री ने गठबंधन की सरकार के किसी अन्य सदस्य पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दिया हो, हालाँकि इतिहास में ऐसे कुछ और उदाहरण जरूर मौजूद हैं जब राजनेताओं ने अपने ऊपर लगे आरोपों के चलते या फिर अन्य मुद्दों पर खुद ही नैतिकता के आधार पर इस्तीफा सौंपा हो। न्याय के साथ विकास का मूलमंत्र अपनाने वाले राजनीति के माहिर खिलाड़ी नीतीश कुमार राजनैतिक जोखिम लेने से कभी पीछे नहीं हटते, साल 2014 में भी एनडीए से अलग होने का जोखिम लिए थे और अब महागठबंधन की सरकार में मुख्यमंत्री पद से स्तीफा देकर दिखा दिए कि वे साहसी राजनेता हैं, तभी तो लोग उन्हें राजनीति का चाणक्य भी कहते हैं। साल 2014 के जोखिम को तो यह कहकर समझा जा सकता है कि नीतीश ने राष्ट्रीय स्तर पर खुद की पहचान बनाने को लेकर वह जोखिम लिया था, लेकिन वर्तमान समय में तो उन्हें राजनीति का महारथी कहना ही उचित होगा। 2014 में एनडीए से अलग होने के नीतीश कुमार के फैसले में बड़ा जोखिम था। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी राजनैतिक भूमिका तलाशने में नीतीश ने ये जोखिम लिया। बिहार में महादलित के नए फॉर्मूले के साथ सोशल इंजीनियरिंग करके वो एक नया प्रयोग कर रहे थे। बिहार की दस करोड़ से ज्यादा की आबादी में 15 फीसदी हिस्सेदारी दलितों की है। दलित मुख्यतौर पर 22 जातियों में बंटे हैं। नीतीश ने इन जातियों में अत्यधिक पिछड़े 21जातियों को लेकर महादलित का एक नया वोटबैंक तैयार किया था। अपने इस वोटबैंक के लिए उन्होंने काम भी किए थे। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने उनके फॉर्मूले को फेल कर दिया, 2009 में 20 सीटें लेकर आने वाली जेडीयू 2014 में सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई। इस हार के बाद नीतीश कुमार के लिए नई राजनीतिक संभावनाएं तलाशनी जरूरी हो गई, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में उन्होंने एक और बड़ा जोखिम लिया, लालू विरोध की जिस राजनीति के बूते उन्होंने बिहार की सत्ता पाई थी बदली परिस्थितियों में उन्हीं के साथ दोस्ती कबूल करनी पड़ी, आरजेडी से दोस्ती का रिस्क लेना इस बार कामयाब रहा, आरजेडी, जेडीयू और कांग्रेस के महागठबंधन को 178 सीटें मिली, आरजेडी (80 सीट) से कम सीटें (71 सीट) लाकर भी नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और बिहार चुनाव के असली विजेता बने, लेकिन इस जीत के साथ भी एक अस्वाभाविक दोस्त को साथ लेकर शासन-प्रशासन चलाने पर सवाल बना रहा, नवंबर 2016 में बिहार में गठबंधन सरकार के सिर्फ एक साल हुए थे. लालू-नीतीश की नई-नई दोस्ती परवान चढ़ने से पहले ही पटरी से उतरती दिखाई पड़ रही थी, नीतीश कुमार ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले की खुलकर तारीफ की थी, जिसके बाद उनके बीजेपी के करीब जाने के किस्से नमक-मिर्च लगाकर मीडिया के साथ ही आमजन में चर्चा का विषय बने हुए थे। तमाम तरह के कयास लगाए जाने लगे। धारणाएं बनाई जाने लगी कि लालू-नीतीश की दोस्ती मजबूरी की दोस्ती है जो ज्यादा दिन चल नहीं सकती, बिहार में बीजेपी-जेडीयू का दौर बेहतर था दोस्ती के नए समीकरण में कुछ भी सहज नहीं है, या 17 साल की दोस्ती निभाने वाली बीजेपी ही नीतीश की स्वभाविक सहयोगी हो सकती है लालू और उनकी पार्टी आरजेडी नहीं। दरअसल यही बड़ी मजबूत धारणाएँ हैं जो बिहार में पिछले दो सालों के दौरान कई वक्त में सच के इर्द-गिर्द दिखी है, मीडिया ही नहीं आमजन के बीच भी चर्चा का विषय थी।

नीतीश खुद को बेदाग दिखाने की कोशिश में जो कहते हैं वही वही करते भी हैं, पिछले दो साल के दौरान सिर्फ इस दोस्ती को कटघरे में रखकर नीतीश पर न जाने कितनी बार सवाल उछाले गए हैं, 2015 के बाद बिहार में घटी हर छोटी-बड़ी घटना को लेकर लालू-नीतीश की बेमेल दोस्ती पर सवाल उठे, फिर चाहे वो सीवान के पत्रकार का हत्याकांड हो या फिर जेल से आरजेडी के बाहुबलि नेता शहाबुद्दीन और लालू यादव के बीच फोन पर बातचीत का खुलासा, नीतीश हर बार कानून सम्मत उपाय निकालकर अपनी साफसुथरी छवि और लालू यादव से अपनी दोस्ती की मर्यादा निभाते रहे, लेकिन हाल में लालू यादव के परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति हासिल करने के आरोप लगे. बेटे, बेटियों के साथ दामाद भी इस घेरे में आए, भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लालू परिवार के साथ ने जिस तरह से उनकी बेदाग छवि को प्रभावित करना शुरू किया. काजल की कोठरी में रहकर खुद को बेदाग रख पाना आसान नहीं था, इस बदली राजनीतिक परिस्थिति ने नीतीश को एक बार फिर से बड़ा जोखिम लेने पर मजबूर किया और इस मामले पर जब नीतीश कुमार की चुप्पी पर सवाल उठे तो उन्होंने सशक्त प्रशासक और कुशल राजनेता की तरह फैसला लिया, अपनी साफसुथरी छवि के साथ किसी भी तरह का समझौता न किए जाने का जोखिम, एक तरफ उन्हें नैतिकता के पैमाने पर ऊँचा कद देता है तो दूसरी तरफ महागठबंधन टूटने में फिर एक नई अप्रत्याशित संभावना टटोलने पर मजबूर भी करता, नीतीश कुमार ने एक बार फिर दिखा दिया कि उनकी साफसुथरी छवि ही उनकी कुल जमा राजनीतिक पूंजी है और वे इसके लिए किसी भी तरह का समझौता नहीं कर सकते हैं।

नीतीश कुमार की इस तरह की राजनीति को उनके चालाकी वाले फैसले के बतौर देखा जाता है, लेकिन इसे रियलिस्टिक पॉलिटिक्स कहना ज्यादा सही होगा, वो साफगोई से अपनी बात रखते हैं, सिर्फ खुद को विरोधी दिखाने के लिए किसी भी मुद्दे पर विरोध नहीं करते, अपनी राजनीतिक हैसियत का सही आकलन करते हैं और इसी का नतीजा है कि आरजेडी से कम विधायक होने के बावजूद बिहार सरकार पर उनका पूरा कंट्रोल रहा, वो बिहार के सबसे ताकतवर राजनीतिक शख्सियत हैं, उनके करीब कोई और दूसरा नेता नहीं ठहरता। बिहार से बाहर भी गैरबीजेपी दलों में वो एक सर्वमान्य और सम्मानित नेता हैं, कड़े फैसला लेने से पीछे नहीं हठते।

यह नीतीश की रियलिस्टिक पॉलिटिक्स ही है कि वो सहजता और विनम्रता से हर बार सटीक निर्णय लेते हैं। वे हमेशा लोकतांत्रिक राजनीति के निष्ठुर आंकड़े सामने रख देते हैं। लेकिन वे जितनी बार भी ऐसा करते हैं उनकी छवि मजबूत ही होती है। शायद इसलिए क्योंकि इतनी भी राजनीतिक ईमानदारी किसी दूसरे नेता में नहीं दिखती। नीतीश की इसी रियलस्टिक पॉलिटिक्स की बदौलत उनकी सहज स्वीकार्यता है। उनकी तारीफ पीएम मोदी भी करते हैं और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह भी। जबकि जैसे केंद्र में पीएम मोदी के सामने कोई नहीं है वैसे ही बिहार में नीतीश के सामने कोई नहीं है। नीतीश एक छोटे दल का प्रतिनिधित्व करते हैं लेकिन उनकी साफ सुथरी राजनीति ने उन्हें ऊंचा कद दिया है।

नीतीश कुमार को राजनीति का माहिर खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने न केवल राज्य में मुख्यमंत्री के रूप में दो पारियां खेली हैं, बल्कि केंद्रीय मंत्री के रूप में भी वे सफलता के साथ काम कर चुके हैं। बिहार के नालंदा जिले के कल्याण बिगहा के रहने वाले नीतीश बिहार इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी। साल 1974 में जयप्रकाश नारायण के 'संपूर्ण क्रांति' के जरिए राजनीति का ककहारा सीखने वाले नीतीश बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और अपने जमाने के धाकड़ नेता सत्येंद्र नारायण सिंह के भी काफी करीबी रहे हैं।साल 1985में नीतीश पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य बने और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

हालांकि बीजेपी के करीब जाने का नीतीश का फैसला उनके लिए उतना फायदेमंद नहीं रहने वाला है जितना बीजेपी के लिए। बीजेपी के प्रचंड लहर के दौर में नीतीश कुमार विपक्ष का ऐसा चेहरा हैं जिन्होंने सीधे मोदी से टक्कर लेकर उन्हें पटखनी देने में कामयाबी हासिल की है। इसी बूते वो 2019 में विपक्ष का चेहरा बनने की क्षमता रखते हैं. बीजेपी से हाथ मिलाने पर वो बिहार की सरकार तो बचा लेंगे लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका से उन्हें हाथ धोना पड़ेगा। यानी बीजेपी के साथ से नीतीश का विकास संभव नहीं दिखता। वहीं दूसरी बात 2014 के लोकसभा चुनाव में महादलित के फॉर्मूले के फेल हो जाने के बाद नीतीश कुमार ने महिलाओं के मुद्दों पर फोकस किया। बिहार में शराबबंदी का फैसला महिलाओं को लुभाने के मद्देनजर लिया गया। इस फैसले ने नीतीश कुमार के लिए महिलाओं के एक बड़े वोटबैंक को तौर पर तैयार किया है। अगर नीतीश अब बीजेपी के साथ जाते हैं तो सीधे-सीधे उनके वोटबैंक में सेंध होगी। नीतीश का अपना कद कमजोर होगा। क्योंकि जिन लोगों ने मोदी के चेहरे को तिलांजलि देकर बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश को वोट किया था वो अगले चुनावों में बीजेपी और मोदी की ओर झुकेंगे। नीतीश कुमार के लिए ये अपना जनाधार खोने जैसा होगा। खैर जो भी हो, लेकिन बिहार के राजनैतिक गलियारों में सियासी मामला गर्मा गया है, नीतीश के इस्तीफे के तुरंत बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर कह दिया कि भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई में जुड़ने के लिए नीतीश कुमार जी को बहुत-बहुत बधाई। वहीं बीजेपी की प्रदेश इकाई ने तुरंत अपने समर्थन का ऐलान कर दिया। तस्वीर कमोबेश साफ हो गई कि बीजेपी ने नीतीश को अपनी तरफ खींच लिया है। अब देखना होगा कि नीतीश कुमार का यह राजनैतिक दांव उन्हें कितना सफल बनाता है।

चीन की महत्वाकांक्षा, समुद्र और सीमाएं

सत्यम सिंह बघेल (आलेख)-

जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत और चीन की सीमा करीब 3488 किलोमीटर लंबी है। इसका 220 किलोमीटर लंबा हिस्सा सिक्किम में आता है। चूंकि सिक्किम सेक्टर में बना हुआ गतिरोध अभी तक जारी है, इस विवाद को शुरू हुए एक महीने से भी अधिक समय बीत गया है, लेकिन तनाव जस के तस बना हुआ है। भारत, चीन और भूटान की सीमा पर डोकलाम में कायम मौजूदा तनाव पर चीन ने एकबार फिर भारत को चेतावनी दी है। डोकलाम पर जारी तनातनी को लेकर अब तक चीन अपने सरकारी मीडिया के जरिए युद्ध की धमकी देता आ रहा था, लेकिन अब सीधे चीन की सेना भारत को युद्ध की चेतावनी दे रही है। चीन की सेना के प्रवक्ता ने कहा कि भारत पीछे नहीं हटा तो चीन डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा देगा। चीनी सेना के प्रवक्ता वू चिऐन ने भारत को धमकी भरे लहजे में कहा, चीनी सेना का 90 साल का इतिहास हमारी क्षमता को साबित करता है। पहाड़ को हिलाना तो मुमकिन है, पर चीन की सेना को नहीं, उन्होंने आगे कहा कि भारत किसी भ्रम में न रहे, हम हर कीमत पर अपनी संप्रभुता की रक्षा करेंगे। जब से यह विवाद शुरू हुआ है, तब से ही चीनी मीडिया लगातर इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ लिख रहा है। ग्लोबल टाइम्स तो आएदिन अपने लेखों में भारत को चेतावनियां देता रहता है। इस पूरे मसले पर भारत का रुख न केवल काफी दृढ़ रहा है, बल्कि भारत की प्रतिक्रिया काफी सधी हुई भी दिख रही है। 

डोकलाम में पूरा विवाद सड़क निर्माण को लेकर शुरू हुआ था। 16 जून को डोकलाम में चीन का सड़क बनाने का एकतरफा फैसला उसकी गलत विदेश नीति का हिस्सा है। भूटान ने चीन के इस कदम का सही कूटनीतिक रास्ते के जरिए विरोध जताया था। चीन को इस बात का अहसास था कि भूटान ऐसा ही करेगा, लेकिन उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि भारत अपने पड़ोसी देश भूटान की मदद के लिए इतनी ताकत से आगे आएगा। भारतीय सेना ने भूटान सरकार से बात करने के बाद यथास्थिति के लिए कदम उठाया, यही बात संभवत: चीन के परे रही।

1984 से सीमा के इस विवाद पर चीन-भूटान दोनों देशों के बीच बातचीत चलती रही है। अब तक 24 दौर की बातचीत हो चुकी है। चीन के सैनिक अब तक इस इलाके में गश्त के लिए आते रहे हैं, लेकिन वापस चले जाते थे। 16 जून को चीन की सेना की कंस्ट्रक्शन टीम भारी संख्या में मशीनों और वाहनों के साथ आई और भूटान के इलाके में घुस गई। इस तरह की मूवमेंट पहले कभी नहीं देखी गई थी। इस मूवमेंट की तस्वीरें भी सामने आईं हैं। वहां चीनी सेना के लोगों को सड़क बनाने की कोशिश करते देख जोमपेरी चौकी पर मौजूद भूटान के सैनिकों ने उन्हें वापस जाने के लिए कहा। चीन के सैनिकों से यह भी कहा गया कि उनका एकतरफा कदम  1988  और  1998 की संधि का उल्लंघन है। भूटान के सैनिकों के मुकाबले चीन के सैनिक भारी संख्या में थे और उन्होंने भूटानी सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। भारत और भूटान की सेनाओं के बीच अरसे से सहयोग होता रहा है, भूटान में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी भी रही है। चीन के सैनिक जिस इलाके में सड़क बनाना चाह रहे थे, वह भूटान के साथ भारत के लिए ढेरों सुरक्षा चिंताएं खड़ी करता है। उस इलाके से भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर की दूरी काफी कम है, जो नॉर्थ ईस्ट को भारत के शेष इलाकों से जोड़ता है। भारतीय सैनिक भूटान के सैनिकों के सपॉर्ट में डोका ला चौकी से नीचे उतर कर आए, लेकिन तब तक चीन के सैनिक वापस जा चुके थे। सोशल मीडिया में ऐसी क्लिपिंग भी आई कि भारत और चीन सैनिकों के बीच तब हाथापाई हो गई थी, लेकिन इन क्लिपिंग को पुराना पाया गया है। चीन के सैनिकों ने भारतीय बंकर जरूर नष्ट कर दिए थे, लेकिन भारत ने इसे तूल नहीं दिया क्योंकि वे पहले भी बंकर नष्ट कर चुके हैं। 20 तारीख को नाथू ला में भारत और चीन के बीच बॉर्डर पोस्ट मीटिंग में पूरा मुद्दा उठा था। चीन इस मामले में आरोप लगा रहा था कि भारतीय सैनिकों ने सिक्किम सेक्टर में सीमा पार की है, लेकिन भारत का यह रुख रहा है कि भारत और चीन के बीच सिक्किम की स्थिति को लेकर भले ही मामला सुलझ चुका हो, लेकिन सिक्किम से लगी सीमा का विवाद नहीं सुलझा है, इसलिए यह कहना गलत है कि भारतीय सैनिकों ने सीमा पार की है। वैसे भी भारत के सैनिकों को भूटान जाने के लिए चीन की सीमा पार करने की कहीं से भी जरूरत नहीं है। 

सड़क निर्माण को लेकर भारत-चीन का कोई सीधा विवाद नहीं हैं, मसलन यह भूटान-चीन के बीच का है. डोकलाम को भूटान अपना हिस्सा मानता है। ऐसे में हो सकता है कि चीन को लगा हो कि भारत, भूटान के बचाव में सामने नहीं आएगा। लेकिन भारत डोकलाम पर भूटान के दावे का समर्थन करता है और उसे पता है कि डोकलाम में होने वाले हर विवाद का सीधा असर भारत-चीन बाडर पर भी पड़ेगा, ऐसे में भारत ने चीन के कदम का पुरजोर विरोध किया। 

वजह यह भी है कि साल  2010 से चीन अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा के प्रति बेहद आक्रामक हो गया है। चीन कोरियाई प्रायद्वीप में धीरे-धीरे तनाव पैदा कर रहा है। जापान और दक्षिण चीन सागर के तटीय देशों के साथ उसका विवाद है। अब चीन, दक्षिण चीन सागर, जापान सागर और पीओके को अपना समझ कर इस्तेमाल करता है। एक तरह से ये चीन के हो चुके हैं। 2015  में जापान सागर और 2016 में दक्षिण चीन सागर में चीन के दावे से उसकी इस महत्वाकांक्षा का पता चल चुका है। चीन धीरे-धीरे पाकिस्तान से आधा पीओके ले चुका है। अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को लेकर भी वह बेहद आक्रामक है, वह अपना दावा जताता है। 

वैसे भी भारत और चीन के आपसी रिश्तों में कई द्विपक्षीय मुद्दों को लेकर तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। चीन ने जहां परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) समूह में भारत के प्रवेश को लेकर आपत्ति जताई वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव पर अड़गा लगा दिया था। इसके अलावा भारत-चीन के बीच इन मुद्दों को लेकर विवाद है-

विवाद की सबसे बड़ी वजह है सीमा- भारत- चीन के बीच 4 हजार कि.मी की सीमा है जो कि निर्धारित नहीं है। इसे LAC कहते हैं। भारत और चीन के सैनिकों का जहां तक कब्जा है वही नियंत्रण रेखा है। जो कि 1914 में मैकमोहन ने तय की थी, लेकिन इसे भी चीन नहीं मानता और इसीलिए अक्सर वो घुसपैठ की कोशिश करता रहता है। विवाद की दूसरी अहम वजह है अरुणाचल प्रदेश- चीन अरुणाचल पर अपना दावा जताता है और इसीलिए अरुणाचल को विवादित बताने के लिए ही चीन वहां के निवासियों को स्टेपल वीजा देता है जिसका भारत विरोध करता है। तीसरी वजह है अक्साई चिन रोड- लद्दाख में इसे बनाकर चीन ने नया विवाद खड़ा किया। चौथी वजह है चीन का जम्मू-कश्मीर को भारत का अंग मानने में आनाकानी करना। पांचवीं वजह है पीओके को पाकिस्तान का भाग मानने में चीन को कोई आपत्ति न होना। छठी वजह है पीओके में चीनी गतिविधियों में इजाफा। हाल ही में चीन ने यहां 46 बिलियन डॉलर की लागत का प्रोजेक्ट शुरू किया है जिससे भारत खुश नहीं है। सातवीं वजह है तिब्बत। इसे भारतीय मान्यता से चीन खफा रहता है। आठवीं वजह है ब्रह्मपुत्र नदी- दरअसल यहां बांध बनाकर चीन सारा पानी अपनी ओर मोड़ रहा है जिसका भारत विरोध कर रहा है। नौवीं वजह है हिंद महासागर में तेज हुई चीनी गतिविधि। दसवीं वजह है साउथ चाइना सी में प्रभुत्व कायम करने की चीनी कोशिश। तिब्‍बत के आध्‍यात्मिक नेता दलाई लामा से मुलाकात को लेकर भी चीन कड़ा एतराज जताता है। 

सीमा की विस्तारबाद नीति के साथ ही पिछले 35 साल के दौरान चीन बड़ी शिद्दत के साथ दो सैन्य शासन को परमाणु हथियारों से लैस करने की नीति पर चलता रहा है और ये देश हैं- पूर्वोत्तर एशिया में उत्तर कोरिया और दक्षिण एशिया में पाकिस्तान। कुछ रणनीतिक मतभेदों के बावजूद ये दोनों देश चीन के वफादार रहे हैं। दोनों चीन का उतना ही इस्तेमाल कर रहे हैं, जितना चीन उनका। चीन की तरह न तो उत्तर कोरिया और न ही पाकिस्तान को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर भरोसा है। उसे अपनाने में दोनों की कोई दिलचस्पी नहीं है। चीन की आक्रामक नीति को आगे बढ़ाने के लिए नुकसान पहुंचाने वाले देश उसे उपलब्ध हैं। उनकी करतूतों से उन्हें खुद नुकसान पहुंचता है, लेकिन चीन को फायदा होता है। चीन का उनके बिना काम नहीं चल सकता और न उनका चीन के बिना। तीनों देश कहीं न कहीं प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीके से सैन्य शासन द्वारा चलाए जा रहे हैं।

अमेरिका ने 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में जो नीति अपनाई थी, चीन भी वही कर रहा है। चीन, जापान और द. कोरिया के खिलाफ अपनी ताकत दिखाने के लिए उत्तरी कोरिया का इस्तेमाल कर रहा है। इसी तरह भारत के खिलाफ ताकत दिखाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। अब यह सिर्फ वक्त की बात है कि चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के साथ नाटो जैसा कोई एशियाई गठजोड़ बना ले। चीन के दो मकसद हैं। पहला- चीन पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को सत्ता में टिकाए रखना। दूसरा- ऊंची विकास दर के जरिये अपने लक्ष्य को बरकरार रखना, ताकि अगले एक दशक में जब चीनी जनता की आय कम हो जाए या स्थिर हो जाए, तो वे बगावत पर न उतर आएं। इसके लिए इसे बड़ा बाजार और कच्चा माल चाहिए, यही वजह है कि वह जमीन और समुद्रों पर कब्जा करने में लगा है। चीन की इस महत्वाकांक्षा को देखते हुए उसके पड़ोसी देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में लगे हैं, अमेरिका को साथ लेकर वे अपना सुरक्षा संपर्क बढ़ा रहे हैं, एशियाई सदी में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य का यही सार है। कहने का मतलब यह है कि हम एक दूसरे शीतयुद्ध की ओर बढ़ चले हैं, जो आगे तेज भी हो सकता है। इस स्थिति में भविष्य के टकराव भारत बनाम पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया, जापान बनाम उत्तरी कोरिया के तौर पर देखने को मिलेंगे। भविष्य को छोड़िये, ये टकराव तो अब दिखने भी लगे हैं।

चीन को लेकर भारत की समस्या यह रही है कि इसने चीन को सदैव ही 'कोल्ड पीस' (निष्क्रियता ओढ़कर शांति बनाए रखने की नीति) अपनाया है, हालाँकि इस बार भारत ने मजबूती से अपना पक्ष रखा है, लेकिन भारत को अभी और अधिक आक्रामकता दिखाने की जरूरत है। जब तक भारत अपनी स्थिति को देखते हुए मुखर और आक्रामक नहीं होता स्थिति सुधरने वाली नहीं है। साथ ही उम्मीद की जा सकती है कि चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के सैन्य इलिट के खिलाफ एक साथ खड़े होने के लिए दुनिया की अन्य शक्तियां ज्यादा वक्त नहीं लेंगी खुद को सत्ता में बरकरार रखने के लिए पहले भी वे एक साथ आ चुके हैं। अब समय लोकतांत्रिक देशों को एक साथ आने का है। इतिहास गवाह है ऐसे आक्रामक देश के प्रतिरोध के खिलाफ बाकी दुनिया को साथ आने में थोड़ा वक्त लगता है, लेकिन इस बार जल्दी करना होगा, क्योंकि चीन के मामले में इस तरह की पहल के लिए अब समय कम होता जा रहा है।

Tuesday, July 25, 2017

चीन की महत्वाकांक्षा, समुद्र और सीमाएं

सत्यम सिंह बघेल (आलेख)-

जम्मू-कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत और चीन की सीमा करीब 3488 किलोमीटर लंबी है। इसका 220 किलोमीटर लंबा हिस्सा सिक्किम में आता है। चूंकि सिक्किम सेक्टर में बना हुआ गतिरोध अभी तक जारी है, इस विवाद को शुरू हुए एक महीने से भी अधिक समय बीत गया है, लेकिन तनाव जस के तस बना हुआ है। भारत, चीन और भूटान की सीमा पर डोकलाम में कायम मौजूदा तनाव पर चीन ने एकबार फिर भारत को चेतावनी दी है। डोकलाम पर जारी तनातनी को लेकर अब तक चीन अपने सरकारी मीडिया के जरिए युद्ध की धमकी देता आ रहा था, लेकिन अब सीधे चीन की सेना भारत को युद्ध की चेतावनी दे रही है। चीन की सेना के प्रवक्ता ने कहा कि भारत पीछे नहीं हटा तो चीन डोकलाम में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा देगा। चीनी सेना के प्रवक्ता वू चिऐन ने भारत को धमकी भरे लहजे में कहा, चीनी सेना का 90 साल का इतिहास हमारी क्षमता को साबित करता है। पहाड़ को हिलाना तो मुमकिन है, पर चीन की सेना को नहीं, उन्होंने आगे कहा कि भारत किसी भ्रम में न रहे, हम हर कीमत पर अपनी संप्रभुता की रक्षा करेंगे। जब से यह विवाद शुरू हुआ है, तब से ही चीनी मीडिया लगातर इस मुद्दे पर भारत के खिलाफ लिख रहा है। ग्लोबल टाइम्स तो आएदिन अपने लेखों में भारत को चेतावनियां देता रहता है। इस पूरे मसले पर भारत का रुख न केवल काफी दृढ़ रहा है, बल्कि भारत की प्रतिक्रिया काफी सधी हुई भी दिख रही है। 

डोकलाम में पूरा विवाद सड़क निर्माण को लेकर शुरू हुआ था। 16 जून को डोकलाम में चीन का सड़क बनाने का एकतरफा फैसला उसकी गलत विदेश नीति का हिस्सा है। भूटान ने चीन के इस कदम का सही कूटनीतिक रास्ते के जरिए विरोध जताया था। चीन को इस बात का अहसास था कि भूटान ऐसा ही करेगा, लेकिन उसे इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं था कि भारत अपने पड़ोसी देश भूटान की मदद के लिए इतनी ताकत से आगे आएगा। भारतीय सेना ने भूटान सरकार से बात करने के बाद यथास्थिति के लिए कदम उठाया, यही बात संभवत: चीन के परे रही।

1984 से सीमा के इस विवाद पर चीन-भूटान दोनों देशों के बीच बातचीत चलती रही है। अब तक 24 दौर की बातचीत हो चुकी है। चीन के सैनिक अब तक इस इलाके में गश्त के लिए आते रहे हैं, लेकिन वापस चले जाते थे। 16 जून को चीन की सेना की कंस्ट्रक्शन टीम भारी संख्या में मशीनों और वाहनों के साथ आई और भूटान के इलाके में घुस गई। इस तरह की मूवमेंट पहले कभी नहीं देखी गई थी। इस मूवमेंट की तस्वीरें भी सामने आईं हैं। वहां चीनी सेना के लोगों को सड़क बनाने की कोशिश करते देख जोमपेरी चौकी पर मौजूद भूटान के सैनिकों ने उन्हें वापस जाने के लिए कहा। चीन के सैनिकों से यह भी कहा गया कि उनका एकतरफा कदम  1988  और  1998 की संधि का उल्लंघन है। भूटान के सैनिकों के मुकाबले चीन के सैनिक भारी संख्या में थे और उन्होंने भूटानी सैनिकों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया। भारत और भूटान की सेनाओं के बीच अरसे से सहयोग होता रहा है, भूटान में भारतीय सैनिकों की मौजूदगी भी रही है। चीन के सैनिक जिस इलाके में सड़क बनाना चाह रहे थे, वह भूटान के साथ भारत के लिए ढेरों सुरक्षा चिंताएं खड़ी करता है। उस इलाके से भारत के सिलिगुड़ी कॉरिडोर की दूरी काफी कम है, जो नॉर्थ ईस्ट को भारत के शेष इलाकों से जोड़ता है। भारतीय सैनिक भूटान के सैनिकों के सपॉर्ट में डोका ला चौकी से नीचे उतर कर आए, लेकिन तब तक चीन के सैनिक वापस जा चुके थे। सोशल मीडिया में ऐसी क्लिपिंग भी आई कि भारत और चीन सैनिकों के बीच तब हाथापाई हो गई थी, लेकिन इन क्लिपिंग को पुराना पाया गया है। चीन के सैनिकों ने भारतीय बंकर जरूर नष्ट कर दिए थे, लेकिन भारत ने इसे तूल नहीं दिया क्योंकि वे पहले भी बंकर नष्ट कर चुके हैं। 20 तारीख को नाथू ला में भारत और चीन के बीच बॉर्डर पोस्ट मीटिंग में पूरा मुद्दा उठा था। चीन इस मामले में आरोप लगा रहा था कि भारतीय सैनिकों ने सिक्किम सेक्टर में सीमा पार की है, लेकिन भारत का यह रुख रहा है कि भारत और चीन के बीच सिक्किम की स्थिति को लेकर भले ही मामला सुलझ चुका हो, लेकिन सिक्किम से लगी सीमा का विवाद नहीं सुलझा है, इसलिए यह कहना गलत है कि भारतीय सैनिकों ने सीमा पार की है। वैसे भी भारत के सैनिकों को भूटान जाने के लिए चीन की सीमा पार करने की कहीं से भी जरूरत नहीं है। 

सड़क निर्माण को लेकर भारत-चीन का कोई सीधा विवाद नहीं हैं, मसलन यह भूटान-चीन के बीच का है. डोकलाम को भूटान अपना हिस्सा मानता है। ऐसे में हो सकता है कि चीन को लगा हो कि भारत, भूटान के बचाव में सामने नहीं आएगा। लेकिन भारत डोकलाम पर भूटान के दावे का समर्थन करता है और उसे पता है कि डोकलाम में होने वाले हर विवाद का सीधा असर भारत-चीन बाडर पर भी पड़ेगा, ऐसे में भारत ने चीन के कदम का पुरजोर विरोध किया। 

वजह यह भी है कि साल  2010 से चीन अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा के प्रति बेहद आक्रामक हो गया है। चीन कोरियाई प्रायद्वीप में धीरे-धीरे तनाव पैदा कर रहा है। जापान और दक्षिण चीन सागर के तटीय देशों के साथ उसका विवाद है। अब चीन, दक्षिण चीन सागर, जापान सागर और पीओके को अपना समझ कर इस्तेमाल करता है। एक तरह से ये चीन के हो चुके हैं। 2015  में जापान सागर और 2016 में दक्षिण चीन सागर में चीन के दावे से उसकी इस महत्वाकांक्षा का पता चल चुका है। चीन धीरे-धीरे पाकिस्तान से आधा पीओके ले चुका है। अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को लेकर भी वह बेहद आक्रामक है, वह अपना दावा जताता है। 

वैसे भी भारत और चीन के आपसी रिश्तों में कई द्विपक्षीय मुद्दों को लेकर तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। चीन ने जहां परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) समूह में भारत के प्रवेश को लेकर आपत्ति जताई वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव पर अड़गा लगा दिया था। इसके अलावा भारत-चीन के बीच इन मुद्दों को लेकर विवाद है-

विवाद की सबसे बड़ी वजह है सीमा- भारत- चीन के बीच 4 हजार कि.मी की सीमा है जो कि निर्धारित नहीं है। इसे LAC कहते हैं। भारत और चीन के सैनिकों का जहां तक कब्जा है वही नियंत्रण रेखा है। जो कि 1914 में मैकमोहन ने तय की थी, लेकिन इसे भी चीन नहीं मानता और इसीलिए अक्सर वो घुसपैठ की कोशिश करता रहता है। विवाद की दूसरी अहम वजह है अरुणाचल प्रदेश- चीन अरुणाचल पर अपना दावा जताता है और इसीलिए अरुणाचल को विवादित बताने के लिए ही चीन वहां के निवासियों को स्टेपल वीजा देता है जिसका भारत विरोध करता है। तीसरी वजह है अक्साई चिन रोड- लद्दाख में इसे बनाकर चीन ने नया विवाद खड़ा किया। चौथी वजह है चीन का जम्मू-कश्मीर को भारत का अंग मानने में आनाकानी करना। पांचवीं वजह है पीओके को पाकिस्तान का भाग मानने में चीन को कोई आपत्ति न होना। छठी वजह है पीओके में चीनी गतिविधियों में इजाफा। हाल ही में चीन ने यहां 46 बिलियन डॉलर की लागत का प्रोजेक्ट शुरू किया है जिससे भारत खुश नहीं है। सातवीं वजह है तिब्बत। इसे भारतीय मान्यता से चीन खफा रहता है। आठवीं वजह है ब्रह्मपुत्र नदी- दरअसल यहां बांध बनाकर चीन सारा पानी अपनी ओर मोड़ रहा है जिसका भारत विरोध कर रहा है। नौवीं वजह है हिंद महासागर में तेज हुई चीनी गतिविधि। दसवीं वजह है साउथ चाइना सी में प्रभुत्व कायम करने की चीनी कोशिश। तिब्‍बत के आध्‍यात्मिक नेता दलाई लामा से मुलाकात को लेकर भी चीन कड़ा एतराज जताता है। 

सीमा की विस्तारबाद नीति के साथ ही पिछले 35 साल के दौरान चीन बड़ी शिद्दत के साथ दो सैन्य शासन को परमाणु हथियारों से लैस करने की नीति पर चलता रहा है और ये देश हैं- पूर्वोत्तर एशिया में उत्तर कोरिया और दक्षिण एशिया में पाकिस्तान। कुछ रणनीतिक मतभेदों के बावजूद ये दोनों देश चीन के वफादार रहे हैं। दोनों चीन का उतना ही इस्तेमाल कर रहे हैं, जितना चीन उनका। चीन की तरह न तो उत्तर कोरिया और न ही पाकिस्तान को मौजूदा वैश्विक व्यवस्था पर भरोसा है। उसे अपनाने में दोनों की कोई दिलचस्पी नहीं है। चीन की आक्रामक नीति को आगे बढ़ाने के लिए नुकसान पहुंचाने वाले देश उसे उपलब्ध हैं। उनकी करतूतों से उन्हें खुद नुकसान पहुंचता है, लेकिन चीन को फायदा होता है। चीन का उनके बिना काम नहीं चल सकता और न उनका चीन के बिना। तीनों देश कहीं न कहीं प्रत्यक्ष और परोक्ष तरीके से सैन्य शासन द्वारा चलाए जा रहे हैं।

अमेरिका ने 20वीं सदी के दूसरे हिस्से में जो नीति अपनाई थी, चीन भी वही कर रहा है। चीन, जापान और द. कोरिया के खिलाफ अपनी ताकत दिखाने के लिए उत्तरी कोरिया का इस्तेमाल कर रहा है। इसी तरह भारत के खिलाफ ताकत दिखाने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। अब यह सिर्फ वक्त की बात है कि चीन, उत्तर कोरिया और पाकिस्तान के साथ नाटो जैसा कोई एशियाई गठजोड़ बना ले। चीन के दो मकसद हैं। पहला- चीन पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी को सत्ता में टिकाए रखना। दूसरा- ऊंची विकास दर के जरिये अपने लक्ष्य को बरकरार रखना, ताकि अगले एक दशक में जब चीनी जनता की आय कम हो जाए या स्थिर हो जाए, तो वे बगावत पर न उतर आएं। इसके लिए इसे बड़ा बाजार और कच्चा माल चाहिए, यही वजह है कि वह जमीन और समुद्रों पर कब्जा करने में लगा है। चीन की इस महत्वाकांक्षा को देखते हुए उसके पड़ोसी देश अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाने में लगे हैं, अमेरिका को साथ लेकर वे अपना सुरक्षा संपर्क बढ़ा रहे हैं, एशियाई सदी में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य का यही सार है। कहने का मतलब यह है कि हम एक दूसरे शीतयुद्ध की ओर बढ़ चले हैं, जो आगे तेज भी हो सकता है। इस स्थिति में भविष्य के टकराव भारत बनाम पाकिस्तान और दक्षिण कोरिया, जापान बनाम उत्तरी कोरिया के तौर पर देखने को मिलेंगे। भविष्य को छोड़िये, ये टकराव तो अब दिखने भी लगे हैं।

चीन को लेकर भारत की समस्या यह रही है कि इसने चीन को सदैव ही 'कोल्ड पीस' (निष्क्रियता ओढ़कर शांति बनाए रखने की नीति) अपनाया है, हालाँकि इस बार भारत ने मजबूती से अपना पक्ष रखा है, लेकिन भारत को अभी और अधिक आक्रामकता दिखाने की जरूरत है। जब तक भारत अपनी स्थिति को देखते हुए मुखर और आक्रामक नहीं होता स्थिति सुधरने वाली नहीं है। साथ ही उम्मीद की जा सकती है कि चीन, पाकिस्तान और उत्तर कोरिया के सैन्य इलिट के खिलाफ एक साथ खड़े होने के लिए दुनिया की अन्य शक्तियां ज्यादा वक्त नहीं लेंगी खुद को सत्ता में बरकरार रखने के लिए पहले भी वे एक साथ आ चुके हैं। अब समय लोकतांत्रिक देशों को एक साथ आने का है। इतिहास गवाह है ऐसे आक्रामक देश के प्रतिरोध के खिलाफ बाकी दुनिया को साथ आने में थोड़ा वक्त लगता है, लेकिन इस बार जल्दी करना होगा, क्योंकि चीन के मामले में इस तरह की पहल के लिए अब समय कम होता जा रहा है।

Tuesday, May 10, 2016

आगस्ता पर असमंजस कब तक

बोफोर्स के बाद सबसे बड़े कथित रक्षा घोटाले अगस्ता हेलिकॉप्टर खरीदी में करप्शन को लेकर राज्यसभा में हुई चर्चा के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तीन महीने के अंदर जांच पूरी कर अगले सत्र में रिपोर्ट पेश किए जाने की चुनौती देकर मोदी सरकार को असमंजस में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल ही में मनोनीत सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उछाले गए भ्रष्टाचार से जुड़े इस हाईप्रोफाइल मामले में बीजेपी ने भी सदन के बाहर और अंदर आक्रामक रुख अपनाया लेकिन कोई बड़ा सबूत प्रमाणिकता के साथ सामने नहीं ला पाई जिससे कांग्रेस बैकफुट पर जाने को मजबूर हो।  करीब 5 घंटे चली कार्रवाई के दौरान सदन में बचाव, सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता रहा ।

राज्यसभा में इस चली बहस में चर्चा की शुरुआत बीजेपी सांसद भूपेंद्र यादव ने की। यादव ने कहा, यूपीए सरकार ने घूस लेने वालों की जांच क्यों नहीं कराई?
इसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी ने राज्यसभा में मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि NDA ने पहली बार 1998 में 6 पुराने हेलिकॉप्टर की जगह 8 नए चॉपर की डील की बात की। उस समय हेलिकॉप्टर की हाइट 6000 मीटर तक ले जाने की बात कही गई थी। यूपीए-1 के टेन्योर में हेलिकॉप्टर की लिमिट को 4500 मीटर कर दिया। ये कहना गलत है कि एनडीए सरकार ने हेलिकॉप्टर की हाइट के स्पेसिफिकेशन को चेंज कर दिया। तब डिफेंस मिनिस्टर ने इसे चेंज करने की बात को माना। वीवीआईपी हेलिकॉप्टर लेने का मकसद ज्यादा हाइट वाले इलाकों जैसे सियाचिन में उड़ान भरना था। 6000 मीटर की ऊंचाई पर उड़ने में कैपेबल हेलिकॉप्टर मंगाने का मकसद उसे शोल्डर रॉकेट की रेंज से भी बाहर रखना था। उन्होंने फील्ड में AW101 एयरक्राफ्ट का यूज नहीं किया। उन हेलिकॉप्टर का यूज किया, जिनमें खराबी थी। ओरिजिनल प्रपोजल 8 हेलिकॉप्टर को खरीदने की बात कही गई थी। अगस्ता ही एक ऐसी कंपनी थी जो पैरामीटर पर क्वालिफाई कर सकी। लेकिन उन्होंने 4 और खरीदे। कैग की रिपोर्ट के मुताबिक 1988 में 8 हेलिकॉप्टर खरीदे गए थे, जिनका यूज कम हुआ था। इसके बाद 4 अन्य को खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी? ट्रायल भी विदेश में किया गया।
इसके बाद चर्चा के दौरान यूपीए सरकार में डिफेंस मिनिस्टर रहे एंटनी ने कहा कि डिफेंस प्रॉक्योरमेंट में हमने कभी भी करप्शन को टॉलरेट नहीं किया। यूपीए सरकार ने ही 6 कंपनियों को ब्लैकलिस्ट किया था। आज आप हम पर सवाल उठा रहे हैं। आप सोनियाजी, मनमोहनजी पर सवाल उठा रहे हैं? नवंबर 2003 में ही तय हो गया था कि हेलिकॉप्टर की उड़ान भरने की ऊंचाई 6000 मीटर से घटाकर 4500 मीटर तक रखी जा सकती है। इस मीटिंग में तब के पीएम के सेक्रेटरी मौजूद थे। केबिन हाईट 1.8 मीटर्स तय की गई थी। हमने कार्रवाई की। डील कैंसल की। जांच कराई। मौजूदा सरकार हमें ब्लैकमेल ना करे। स्वामीजी। हमें धमकाएं नहीं। आपके साथ सबूत हैं तो जांच कराएं, हम पर मुकदमे चलाएं। पर धमकाएं नहीं।

मामले में सफाई देते हुए कांग्रेस नेता सिंघवी ने कहा कि हमने सीबीआई जांच करवाई है। सरकार सेंस से सोचे, सेंसेशनलिज्म को छोड़े।
इतालवी कोर्ट ने साफतौर पर कहा, सोनिया गांधी के खिलाफ सबूत नहीं हैं। जजमेंट को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। उनका नाम केवल उसी पर्सनैलिटी के तौर पर था जो उस वीवीआईपी हेलिकॉप्टर में सफर करतीं। हमें अपनी कोर्ट पर भरोसा क्यों नहीं है।
सिंघवी ने इतालवी कोर्ट के फैसले में कूट शब्दों के जिक्र पर कहा, 'AP' का अर्थ गुजरात की मुख्यमंत्री के नाम से भी हो सकता है।
आप किसी नाम से नफरत करते हैं इसका मतलब यह नहीं है कि उन नामों को आप इस कूट नाम से जोड़ें। सिंघवी ने शेर से अपनी बात को खत्म किया, शाखों से टूट जाएं, वो पत्ते नहीं हैं हम। आंधियों से कह दो, औकात में रहें।

राज्यसभा में पांच घंटे से ज्यादा चली चर्चा का जवाब देते हुए डिफेंस मिनिस्टर मनोहर पर्रिकर ने कहा, आज अभिषेक मनु सिंघवी चले गए। उनका बड़ा नुकसान हो गया। इतनी अच्छी तरह उन्होंने मामला पेश किया कि एक बार तो मैं भी सोचने लगा। वे अच्छे वकील हैँ। लेकिन एक बात महसूस हुई कि अगर केस कमजोर तो अच्छा वकील भी उस मुकदमे को जीत नहीं सकता। एक कहानी सुनाना चाहता हूं। एक बार बादशाह अकबर ने बीरबल को बुलाया। कहा- सोने का चम्मच चोरी हो गया है। बीरबल ने सारे नौकरों को बुलाया और कहा कि ये बांस पकड़ो। ये जादुई बांस है। जिसने चोरी की होगी, उसका बांस रातभर में चार इंच बढ़ जाएगा। जिसने चोरी की थी, वह बेचैन था। उसने अपना बांस चार इंच काट दिया। अगले ही दिन वह पकड़ा गया। लगता है कि आपने (कांग्रेस ने भी) अपने सारे बांस काट दिए हैं।
पर्रिकर ने कहा कि एंटनी ने खुद कहा था कि करप्शन हुआ है। एक ही वेंडर के फेवर में हालात बना दिए गए थे। इटली की कोर्ट ने डील में कई स्टेज पर नियमों के खिलाफ काम होने की बात कही है। एनडीए की सरकार ने हेलिकॉप्टर के स्पेसिफिकेशन नहीं बदले थे।  देश जानना चाहता है कि करप्शन किसने किया था? देश जानना चाहता है कि अगस्ता वेस्टलैंड डील से किसे फायदा हुआ? हम इसका पता लगाएंगे। हम इसे ऐसे ही नहीं जाने दे सकते। सरकार इसका पता लगाएगी। इटली की कोर्ट के फैसले में जितने भी लोगों के नाम हैं, उनके खिलाफ जांच होगी।
वस्तुतः भ्रष्टाचार के इस मुद्दे पर देश के दो बड़े नेता जिनकी छवि भारतीय राजनीति में ईमानदार नेता के रूप में बनी हुई है और प्रतिद्वंदी दल भी उनकी ईमानदारी के कायल हैं वो दो नेता मनोहर पारिकर और एके एंटोनी, एक वर्तमान रक्षा मंत्री और दूसरे पूर्व रक्षा मंत्री सदन में आमने सामने नजर आए तो इन दोनों की आड़ में कांग्रेस बीजेपी ने अपनी सरकारों के दौरान लिए फैसलों को सामने रखकर खुद को बेहतर साबित करने की कोशिश की। सवाल  आखिर साख पर  जो खड़े हुए उनका क्या होगा चाहे वो स्वामी के आरोप हो या सफाई देने को मजबूर हुई सोनिया या फिर आरोप और सफाई के बीच मोदी सरकार की प्रमाणिकता के बीच संसद और देश जिस पर विश्व की नजर टिक गई है।
जांच होने के बाद ही पता चलेगा कि बात दूर तलक जाएगी या फिर खोदा पहाड़ और निकली चुहिया वाली कहावत चरितार्थ होगी।

सत्यम सिंह बघेल

किसान हितैषी बयानों से घिरी किसानों की दर्द भरी जिंदगी

किसान के लिए उसके खेत खलिहान और उसकी फसल ही उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके अरमान, उम्मीदें, सबकुछ होती हैं । लेकिन जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारण वश किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है उसकी उम्मीदें बिखर जाती हैं, सपने चूर चूर हो जाते हैं . वर्तमान समय में भी सूखा पड़ने के कारण देश के अन्नदाता के यही हाल बने हुए हैं ।
देश के अधिकांश भागों में बारिश कम होने और सूखा पड़ने के कारण पिछले वर्ष खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हुई थीं । इसके बाद ओलावृष्टि के कारण कुछ क्षेत्रों में रबी की फसल पूरी तरह चौपट हो चुकी है । इससे अन्नदाता कहे जाने वाले भारतीय किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, वह अपनी बेहताशा आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है ।
किसानों का जीवन अस्त-व्यस्त और बेहाल है, जीना मुसकिल हो गया है । किसान खून के आंसू पीने पर मजबूर हैं । किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं और हमारे देश की राजनैतिक दल एवं सरकार उसकी विवशता पर उसे सहयोग देने, आर्थिक मदद करने , उसका हौसला बढ़ाने की बजाये उसकी इस दशा पर सिर्फ अपनी राजनैतिक सियासत की गोटियाँ खेल रहे हैं । अब मप्र के किसानों के हाल ही देख लीजिये । वहां पिछले रबी के सीजन में भारी ओलावृष्टि से कुछ जगह फ़सलें पूरी तरह चौपट हो चुकी हैं । ओलावृष्टि से चौपट हुई फसलों का सर्वे भी हुआ। नुकसान की रिपोट भी तैयार हुई । उस समय ओलावृष्टि से पीड़ित किसानों की बदहाल दशा पर खूब राजनीति भी हुई । सभी दल के नेताओं ने खेतों में जाकर नष्ट हुई फसल और पीड़ित किसानों के साथ खूब फोटो निकलवाया । बढ़-चढ़कर बयान बाजी हुई । खूब घोषणाएं हुई, हर संभव मदद की दिलाशाएं दी गई । सरकार द्वारा बिजली बिल माफ़ करने, इस वर्ष ऋण वसूली स्थगित करने, पीड़ित किसानों को एक रुपया किलो चावल, नमक, गेहूं देने की घोषणा की गई, जल्द से जल्द मुआवजा देने का वादा किया गया लेकिन अभी तक किसानों को कोई मदद नही मिल पाई । समय बीता समय के साथ सारी घोषणा, अस्वासन, वादे सब के सब ठंडे बस्ते में चला गया, अब किसानों के हाल जानने वाला कोई नही है
ऐसा नही है कि किसानो की यह स्थिति केवल वर्तमान समय में है । किसानों की यह दयनीय दशा हमेशा से बनी हुई है । चाहे वह कांग्रेस की सरकार को या भाजपा की सरकार सभी के कार्यकाल में किसानों का शोषण हुआ है, उन्हें अनदेखा किया गया है, उनकी दयनीय दशा पर हमेशा से राजनीति हुई है ।
जब से देश आजाद हुआ तब से अपनी समस्याओं के चलते किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं । राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं की थी । 2009 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 1172 की वृद्धि हुई थी, अत: 2009 के दौरान 17368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई. राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार 1994 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की हैं । सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रूक नहीं रहा है, देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं । वहीं केवल यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 500 पहुँच गई है, इस क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में 5000 लोग आत्महत्या कर चुकें । बुंदेलखंड के लोग घास की रोटी और घास की ही चटनी खाने को मजबूर हैं ।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की स्थिति सभी को मालूम है, जहाँ लोगों के पास पीने तक को पानी नही है उस क्षेत्र के किसानों की क्या दशा होगी । यह सब सोचकर मन बहुत ज्यादा विचलित हो जाता है । लेकिन किसानों की इस दुखदायी घड़ी में राजनैतिक दल उनका साथ देने और उनका सहयोग करने की बजाए, उनकी इस लाचारी एवं बेवसी पर राजनीति कर रहे हैं ।
हाल ही में कुछ माह पूर्व राहुल गाँधी ने किसानों से मिलने के लिए पद यात्रा किये थे। बड़ी आस लगाकर किसान उनसे मिलने पहुंचे कि हमें हमारी समस्या से निपटने के लिए, सूखे की मार से उभरने के लिए, बारिश की चपेट से बचने के लिए सुझाव दिए जायेंगे हमारी कुछ मदद की जाएगी । लेकिन यात्रा में ऐसा कुछ नहीं हुआ, वहां हुआ तो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और अपनी वोट बैंक की राजनीति बस, जो 65 वर्षों से हो रहा है । किसानो की कोई मदद नही, कोई सुझाव नही, किसानो की स्थिति आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है, चाहे विदर्भ या बुन्देलखण्ड हो या फिर अन्य क्षेत्र । ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस को अचानक से किसानों की याद आने लगी, क्या इसलिए कि कांग्रेस का अस्तित्व अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है ? क्या कारण है कि कांग्रेस किसानों की हितेषी बन गई, उसे देश में हो रही नित्य प्रति किसानों की आत्महत्याएं दिखाई देने लगी, उनकी छिनती हुई जमीन याद आने लगी, उन पर अपार सहानुभूति बरसने लगी ।
वैसे ये कोई नयी बात नहीं है ये तो हमेशा से ही हो रहा है, देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों के साथ छल कपट कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हमेशा से ही होता चला आ रहा है, राजनैतिक पार्टियां सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति करती आयी हैं । हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह देश किसानों का देश है, इस देश के किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं . इन बातों को अख़बारों, किताबों में पढ़ते-पढ़ते और भाषणों, समाचार चेनलों में सुनते सुनते वर्षों बीत गये, कई पीढियां गुजर गई, फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है वह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है और राजनैतिक दल उसकी इस हालत पर राजनीति करने में लगे हुए हैं .
हमारे द्वारा ही चुनी गई सरकारें आज इतने संवेदनशून्य हो चुकी हैं कि उन्हें किसानों की मौत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । यही नहीं सरकारें किसानों की फसल खराब होने पर उन्हें मुआवजा राशि के रूप में 6₹, से लेकर 100₹ तक देती हैं । आख़िर ये जले पर नमक छिड़कना नहीं तो और क्या है ? किसान परिश्रम, बलिदान, त्याग और सेवा के आदर्श द्वारा देश का उपकार करता है, प्रकृति का वह पुजारी तथा धरती मां का उपासक है । धन से गरीब होने पर भी वह मन का अमीर और उदार होता है । किसान अन्नदाता है, वह समाज का सच्चा हितैषी है। उसके सुख़ में ही देश का सुख़ है और उसकी समृद्धि में ही देश की समृद्धि है । लेकिन फिर भी देश राजनैतिक दल किसानों के साथ छल-कपट की राजनीति कर रहें है और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, बार-बार सिर्फ कोरे वादे करके अपना प्रचार प्रसार करते हैं बस और कुछ नहीं । आज हम देख रहे हैं किसानों की दशा क्या है यह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है
सरकारों द्वारा किसानों के लिए उचित कार्य जो करने चाहिए थे नहीं किया गया । तभी तो आज भी देश में कृषि शिक्षा के विश्वविध्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है। शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है । राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविध्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं । कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ । जिन फसलों को किसान बोना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक जलवायु, पानी, भूमि आदि कैसा होना चाहिए । इसका परीक्षण कर संबंधित किसानों को शिक्षित किये जाने की भी व्यवस्था कराई जानी चाहिए ताकि वह सुझावानुसार कार्य करने के लिए सहमत हो। इस हेतु अच्छी प्रजाति के बीजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, बीज की बुवाई के समय कृषि क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ अपनी देखरेख में बुवाई कराएं तथा उन पर होने वाली बीमारियों, आवश्यक उर्वरकों, सिंचाई, निकाई, निराई, गुड़ाई आदि का कार्य आवश्यकतानुसार समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों के निर्देशन में कराया जाना चाहिए, इससे उत्पादन बढ़ेगा एवं किसान समृद्ध होगा । किसान समृद्ध होगा तभी तो देश समृद्ध होगा ।

लेखक – सत्यम सिंह बघेल

बलात्कार घटनाएं : शर्मसार होती मानवता

वर्तमान समय में हमारे देश में बलात्कार जैसी अमानवीय दुर्घटनाओं ने समाज को झकझोर कर रख दिया है । अखबार में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले में एक सात साल की बच्ची से बलात्कार किए जाने का शर्मनाक घटना के बारे में पढ़कर मै अंदर से हिल गया हूँ । क्योंकि बच्ची की अस्मत लूटने वाला और कोई नहीं बल्कि उसका नाबालिग फुफेरा भाई है । 14 साल का किशोर अपनी रिश्ते की सात वर्षीय बहन को मोटर साइकिल से घुमाने ले गया । वापस लौटकर आया तो अपने घर के एक कमरे में उसने जबरन लड़की के साथ बलात्कार किया । कितनी निंदनीय, शर्मनाक और दुखद बात है । मैंने जब से उस कुकृत्य के बारे मे पढ़ा हूँ । मन बहुत व्यथित है । यह सब पढ़कर और आज लिखते हुए मेरी आँखों में आंसू आ गये लेकिन उन दरिन्दों ने कितनी क्रूरता वर्ती उन्हें जरा भी दया न आई, उन माता पिता पर और उस मासूम पर भी जिसे हमारे देश में देवी मानकर उपासना की जाती है |
आदर्शों व महान नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नींव पर विकसित हुए इस राष्ट्र में बलात्कार की घटनायें मुख्य चुनौती बन चुकी हैं | शैतानी क्रूरता की शिकार नारी की विवशता हर दिन समाचार पत्र, न्यूज चैनल के माध्यम से देखने, पढ़ने, सुनने को मिल रही हैं, जो देश की कानून व्यवस्था और सभ्य समाज की मुकबधिरता पर सवालिया निशान खड़ा कर रहीं हैं | जब यही अतिअमानवीय घटना दिल्ली में घटी थी तब उस घटना के बाद से राक्षसी मानसिकता एवं व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले देशव्यापी आक्रोश ने जिस प्रकार पहल की थी, उससे लग रहा था कि यह व्यापक जनाक्रोश निःसन्देह ही मौकापरस्त व ढर्रावादी राजनीति के लिए एक चुनौती तथा व्यवस्था के लिए एक शुभ संकेत है | पहली बार बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ एक आन्दोलन का रूप लिया था व सम्पूर्ण सामाजिक विभीषिका पर एक राष्ट्रव्यापी बहस छेड़ी थी | आन्दोलन की व्यापकता देखकर यही कहा जा सकता था कि वर्षों से मौन भारतीय समाज अब जाग चुका है, बदलाव की बहार चल पड़ी है, देश में हमारे सभ्य समाज को कलंकित करने वाली जो अमानवीय घटनायें घट रहीं हैं उनमे बेशक अंकुश लगेगा, उन बदन पिपासुओं के खिलाफ अवश्य कठोर कानून बनेगा | उस समय उस पीड़ाप्रद व निराशाजनक वातावरण में यही थोड़ा सन्तोषप्रद था और उसी आधार पर अधिकतर बुद्धिजीवियों ने उस आन्दोलन को नई पीढ़ी की नेतृत्वहीन क्रान्ति के रूप में परिभाषित करते हुए एक नए दौर की निश्चित भविष्यवाणी तक कर डाली थी |
लेकिन उस समय किसी को क्या मालूम था कि यह आन्दोलन तो सिर्फ एक हवा के झोखे जैसा है, जो चंद समय के लिए मौका परस्ती के चलते उग्र हुआ है, कुछ दिन बाद फिर से वही होगा जो पहले से चला आ रहा है और हुआ भी वही कुछ दिन बाद आन्दोलन शांत | साथ ही सब कुछ जैसा की तैसा न ही उन बदन पिपासुओं के लिए कठोर दंड का प्रावधान बना न ही बलात्कार की घटनाओं में कोई कमी हुई | बल्कि इसके विपरीत देश में बलात्कार जैसी अतिअमानवीय दुर्घटनाओं में वृद्धि हुई है | रूह काँप उठती है इन क्रूर दुर्घटनाओं के बारे में सुनकर-पढ़कर, आज हालत ऐसे बन चुके हैं कि अगर हम आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले कुछ सालों में बलात्कार की घटनाओं में लगातार निरशाजनक इजाफा देखने को मिला है | इस बावत अगर राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के द्वारा जारी किये गए आंकड़ों पर नजर डाली जाये तो भारत में प्रतिदिन 60 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटानाओं को अंजाम दिये जाने की बात सामने आती है | हम देखें तो आज नैतिक मूल्यों को खोते हुए भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें आकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहाँ 1971 में 2487 बलात्कार की घटनायें घटी वहीं 2011 में ये अमानवीय घटनायें बढ़कर 24206 हुई इस तरह 873.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वही एक अन्य आंकड़े में ऐसा बताया गया है कि भारत में बलात्कार के ग्राफ में 30 प्रतिशत की रफ़्तार से प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है जो कि देश की अस्मिता को शर्मसार करने वाला आंकड़ा है | सन 2010 की अपेक्षा सन 2011 में लगभग बलात्कार के दो हजार मामले ज्यादा सामने आये और उसके बाद एक अनुमान के मुताबिक़ सन 2012, 2013, 2014 में भी इसी अनुपात में बलात्कार की अमानवीय दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ है | आदर्शों व महान नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नींव पर विकसित हुए इस राष्ट्र में आज प्रत्येक 22वें मिनट किसी भेड़िये द्वारा एक विवश नारी की अस्मिता को तार तार किया जाता है, ये तो वो आकडे हैं जो पीड़ित द्वारा पुलिस में शिकायत की जाती है, सोचिए ये आंकड़े इससे भी कही ज्यादा होंगे क्योंकि अभी भी 80% स्त्रियाँ लोकलाज, गरीब, असहाय या अशिक्षित होने के कारण थाने तक पहुँच ही नहीं पाती हैं। और हमारे देश की कानून व्यवस्था और हमारा सभ्य समाज क्यों इस तरह मौन साधे सिर्फ तमाशा देखने में मग्न है ?
नित्य प्रति हो रही क्रूरता की हर सीमा को लांघने देने वाली कुकृत्य दुर्घटनाओं से आधी दुनिया के नाम से जानी जाने वाली महिलायें आज घरों सड़कों पर खुद को सुरक्षित नहीं महसूस कर पा रहीं हैं | देश में यही स्थिति रही तो आने वाले समय में महिलाओं की स्थिति क्या होगी इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है |
वर्तमान समय में निरंतर हो रही बलात्कार की घटनाओं की वृद्धि ने सिर्फ हमारी सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं बल्कि तमाम सामाजिक पहलुओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है | देश में जिस तरह से महिलाओं एवं लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ और बलात्कार के सिलसिलेवार मामले एक के बाद एक सुर्ख़ियों में आ रहे हैं, सभी ने क़ानून व्यवस्था के साथ-साथ इस बात पर सवाल उठाये हैं कि आखिर हमारा भारत किस संस्कृति की तरफ जा रहा है ? क्या हम इतने अंधे हो चुके हैं कि सामाजिक संवेदनाए हमारे लिए मायने नहीं रखती या कहीं ना कहीं कोई ऐसा कारक है जो समाज की वर्तमान पीढ़ी को दिग्भ्रमित कर रहा है | निश्चित तौर पर इसके आंकड़ों में तेजी से जो वृद्धि हुई है, वे देश में महिलाओं की स्थिति एवं उनके प्रति असंवेदनशील होते समाज एवं लचर प्रशासनिक व्यवस्था को दिखाने के लिए पर्याप्त हैं |
आज तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानकर इसे पूर्ण रूप से रोकने के लिए  हर संभव प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, इसके लिए भारतीय समाज के हर घटक को एक साथ संगठित होकर इसके खिलाफ मजबूती से खड़े होने की आवश्यकता है, महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुकी इस हैवानियत के विरुद्ध शासन, प्रशासन, समाज, कानून सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं | साथ ही तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ कठोर से कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है, आरोपी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे, साथ ही रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से बलात्कारी को नपुंसकता की स्थिति में लाने की प्रक्रिया को दंड प्रावधान में शामिल किया जाना चाहिए ।

सत्यम सिंह बघेल

गांधी परिवार : आगस्ता और बोफोर्स

आगस्ता वेस्टलैण्ड हेलीकॉप्टर का मुद्दा
मीडिया, सोशल मीडिया और संसद से लेकर सड़क तक देश में हर जगह बहस का विषय बना हुआ है । यह मामला भारत द्वारा आगस्ता वेस्टलैण्ड कम्पनी से खरीदे गए हेलिकॉप्टरों से सम्बन्धित है जो 2013-14 में सामने आया। इसमें कई भारतीय राजनेताओं एवं सैन्य अधिकारियों पर आगस्ता वेस्टलैण्ड से मोटी घूस लेने का आरोप है। इसी तरह का एक और मामला था बोफोर्स इसमे भी कई भारतीय राजनेताओं एवं सैन्य अधिकारियों पर घूस लेने का अरोप था । बोफोर्स कांड के मामले में सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में खलबली मचा दी और राजीव गांधी इसके निशाना बने। 1989 के लोकसभा चुनाव का ये मुख्य मुद्दा था जिसने राजीव गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया और वीपी सिंह राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री बने। और साथ ही बोफोर्स कांड राजीव गांधी को इस कदर ले डूबा कि वे इससे जीवन पर्यन्त उभर ही नही पाये । बोफोर्स मामला ने उनका राजनैतिक कैरियर ही खत्म कर दिया था ।
आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी। काफी समय तक राजीव गांधी का नाम भी इस मामले के अभियुक्तों की सूची में शामिल रहा लेकिन उनकी मौत के बाद नाम फाइल से हटा दिया गया। सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी गयी लेकिन सरकारें बदलने पर सीबीआई की जांच की दिशा भी लगातार बदलती रही। एक दौर था, जब जोगिन्दर सिंह सीबीआई चीफ थे तो एजेंसी स्वीडन से महत्वपूर्ण दस्तावेज लाने में सफल हो गयी थी। जोगिन्दर सिंह ने तब दावा किया था कि केस सुलझा लिया गया है। बस, देरी है तो क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करने की। उनके हटने के बाद सीबीआई की चाल ही बदल गयी। इस बीच कई ऐसे दांवपेंच खेले गये कि क्वात्रोक्की को राहत मिलती गयी।

अब वर्तमान मामला है आगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर खरीदी का । इस मामले में यूपीए-1 सरकार के वक्त 2010 में अगस्ता वेस्टलैंड से वीवीआईपी के लिए 12 हेलिकॉप्टरों की खरीद की डील हुई थी। डील के तहत मिले 3 हेलिकॉप्टर आज भी दिल्ली के पालम एयरबेस पर खड़े हैं। इन्हें इस्तेमाल में नहीं लाया गया। डील 3,600 करोड़ रुपए की थी। टोटल डील का 10 फीसदी हिस्सा रिश्वत में देने की बात सामने आई थी। इसके बाद यूपीए सरकार ने फरवरी 2010 में डील रद्द कर दी थी।
तब एयरफोर्स चीफ रहे एसपी त्यागी समेत 13 लोगों पर केस दर्ज किया गया था। जिस मीटिंग में हेलीकॉप्टर की कीमत तय की गई थी, उसमें यूपीए सरकार के कुछ मंत्री भी मौजूद थे। इस वजह से कांग्रेस पर भी सवाल उठे थे।
मिलान कोर्ट ऑफ अपील्स ने दिए फैसले में माना है कि इस हेलिकॉप्टर डील में करप्शन हुआ है और इसमें इंडियन एयरफोर्स के पूर्व चीफ एसपी त्यागी भी शामिल थे। 90 से 225 करोड़ रुपए की रिश्वत भारतीय अफसरों को दी गई। कोर्ट ने वीवीआईपी हेलिकॉप्टर देने वाली कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड के चीफ जी. ओरसी को दोषी ठहराया है। उन्हें साढ़े चार साल जेल की सजा सुनाई गई है।
इटली की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोर्ट ने अपने जजमेंट में बताया है कि अगस्ता वेस्टलैंड ने कैसे कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी और उनके करीबी सहयोगियों जैसे पीएम मनमोहन सिंह और नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर एमके नारायणन के साथ लॉबिंग की। कोर्ट ने अपने फैसले में चार बार सोनिया गांधी और दो बार मनमोहन सिंह का नाम लिया है।
बोफोर्स के बाद सबसे बड़े कथित रक्षा घोटाले अगस्ता हेलिकॉप्टर खरीदी में करप्शन को लेकर राज्यसभा में हुई चर्चा के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तीन महीने के अंदर जांच पूरी कर अगले सत्र में रिपोर्ट पेश किए जाने की चुनौती देकर मोदी सरकार को असमंजस में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल ही में मनोनीत सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उछाले गए भ्रष्टाचार से जुड़े इस हाईप्रोफाइल मामले में बीजेपी ने भी सदन के बाहर और अंदर आक्रामक रुख अपनाया लेकिन कोई बड़ा सबूत प्रमाणिकता के साथ सामने नहीं ला पाई जिससे कांग्रेस बैकफुट पर जाने को मजबूर हो।  करीब 5 घंटे चली कार्रवाई के दौरान सदन में बचाव, सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप का दौर ही चलता रहा ।

वस्तुतः देखा जाये तो बोफोर्स और आगस्ता दोनो मामलों में बहुत अधिक समानताएं हैं । मामलों का संबंध मुख्यरूप गांधी परिवार से जुड़ा हुआ है । दोनो मामले रक्षा क्षेत्र से जुड़े हैं । दोनो मामलों में भारतीय राजनेताओं तथा सैन्य अधिकारियों पर घूस लेने का आरोप है । दोनो मामले इटली से जुड़े हैं । दोनो मामलों में बिचोलियों ने मध्यस्था की भूमिका निभाई है । बोफोर्स घोटाला में राजीव गांधी का नाम आया था और इस कारण राजीव गांधी को सत्ता से बाहर हो गए थे । साथ बोफोर्स कांड राजीव को इस कदर ले डूबा कि वे इससे जीवन पर्यन्त उभर ही नही पाये । बोफोर्स मामला ने उनका राजनैतिक कैरियर ही खत्म कर दिया था । आगस्ता वेस्टलैंड में सोनिया गांधी का नाम सामने आया है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि यह मामला सोनिया गांधी के राजनैतिक जीवन को कितना प्रभावित करता है । इस मामले में घिरकर सोनिया गांधी का राजनैतिक उम्मीद से पहले ही समाप्त हो जायेगा या फिर आगे भी उनका वर्चस्व कायम रहेगा ।

सत्यम सिंह बघेल

बुंदेलखण्ड में सूखा संकट और सियासत

स्वतन्त्रता प्राप्ति के वर्षों बाद भी उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का बुंदेलखण्ड क्षेत्र सूखे का शिकार है । उत्तर प्रदेश के पचास से अधिक जिलों में सूखे की मार पड़ी है, जिससे भूख-प्यास से लोगों के दम तोड़ने की भी खबरें आई हैं। इस पूरे क्षेत्र में कृषि ही लोगों के जीवन यापन का मुख्य आधार है। सिंचाई के लिए जल न होने के कारण क्षेत्र में अकाल जैसे हालात हो गए हैं। लोग किसानी छोड़कर मजदूरी करने को बाध्य हो गए हैं। भुखमरी जैसे हालात से गुजर रहे इस क्षेत्र में अन्य समाजिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं। क्षेत्र से लोगों का पलायन जारी है। बच्चों के स्कूल छोड़कर बालमजदूरी करने की घटनाओं में 24 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पौष्टिक भोजन नहीं मिलने से बच्‍चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। सूखा और गरीबी के कारण घास की रोटी खाने और गड्ढे का पानी पीने को मजबूर हैं । सूखे से निपटने में अक्षम माता पिता द्वारा अपने बच्चों को बेचने तक की घटनाएं सामने आ रही हैं।
वहीं राजनैतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू है, प्यासे बुन्देलखण्ड को लेकर दलों के बीच सियासत जोरों पर है । वैसे तो बुंदेलखण्ड सदियों से प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होता है लेकिन केन्द्र और राज्य में सरकार किसी की भी हो सभी ने प्रकृति की नियति को नजर अंदाज ही किया है। मनमोहन सिंह सरकार ने बुंदेलखण्ड के लिए पैकेज दिया था लेकिन इस क्षेत्र में समस्या नहीं सुलझी लोग घास खाने को मजबूर हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब बुंदेलखण्ड में पद यात्रा के लिए पहुंचे तब महिलाओं ने अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाई । कि जब बच्चे रात में खाना मांगते हैं तो महिलाएं उन्हें रोटी देने की बजाए चाटें मारकर सुला देती हैं क्योंकी उनके पास इतना अनाज नहीं की बच्चों को कई बार खाना और दूध दे सकें। ये दास्तान बुंदेलखण्ड के हर  घर की है। लोगों के पेट से उफन रही भूख प्यास की आग पर सियासत की हाड़ी जरूर लगती है लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं निकला । राहुल गांधी की बुंदेलखण्ड में पद यात्रा पर कोई अपत्ती नहीं लेकिन देश में सार्वधिक समय कांग्रेस ने राज किया है। उत्तर प्रदेश ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिये है काश कांग्रेस ने समझा होता की समय का निदान कैसे होगा बुंदेलखण्ड की समस्या कम वर्षा की है और ऐसा कई सदियों से होता रहा है । अगर इस बात पर कांग्रेस संवेदनशील होती तो समस्या का समाधान संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से हो सकता था, लेकिन दुर्भाग्य है कि नही हुआ । बुंदेलखण्ड की विडम्बना ये है कि यहां हीरा ग्रेनाइट की खदाने है। जंगल तेंदू पत्ता आवला से पटे पड़े हैं लेकिन इसके वाबजूद ये क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का शिकार तो है ही साथ ही अल्प वर्षा का शिकार लगातार हो रहा है।
आज बुंदेलखण्ड की हालत इतनी खराब है कि वे मृत्यु शयया पर पड़ा नजर आ रहा है ।किसानों को पहनने के लिए कपड़े और खाने को अनाज नहीं हैं। यहां तक कि‍ चारा नहीं होने की वजह से जानवर भी दम तोड़ रहे हैं। सूखे का मतलब सिर्फ पानी का संकट नहीं है। रोज़गार का भी संकट है। खेती नहीं हुई है। किसान का कर्ज़ा बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड में 80.53 फीसदी किसान कर्जदार है। मौत की ट्रेन लगातार अपने रफ़्तार से बुन्देलखण्ड में दौड़ रही है । लाशों और जल संकट पर सियासत का माहौल गर्म है, यहां मौत की फसल अपनी रफ्तार से पक रही है । मगर उन गांव का हाल जस का तस है जहां संनाटे को चीरती किसान परिवारों की चींखें सिसकियों के साथ हमदर्दी जताने वालों की होड़ में बार-बार शर्मसार होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, बुंदलेखंड में 2009 में 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745, 2013 में 750 और 2014 में 58 किसानों ने आत्महत्या कर मौत को गले लगा लिया। 6 वर्षों में 3,223 किसानों ने आत्महत्या की। 2015 के आंकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं।
कभी बुन्देलखण्ड के लोग कम पानी में जीवन जीते थे लेकिन समय के साथ साथ जल स्त्रोत नष्ट हो गये । सिंचाई के पानी की कमी,गिरते जलस्तर और सूखे की मार के कारण खेती का संकट बढ़ता गया राज्य सरकारों ने भी खेतों तक नहर द्वारा पानी पंहुचाने की उचित व्यवस्था नहीं की । ऐतिहासिक अतीत की गवाह रही इस क्षेत्र की धरती जर्जर जर्जर होती गयी। किसान हाशिये की तरफ जाते रहे और भुखमरी का शिकार हो गये। कर्ज के बोझ से दबे होने के कारण मौत को गले लगाने लगे ।
जल संरक्षण उपायों का अभाव और जल संरक्षण का परम्परागत तरीकों के प्रति उदासीनता ने इस संकट को इतना बढ़ा दिया हैकि अब समाधान के लिए ठोस उपाये करने होंगे। जल संकट की यह भयंकर समस्या केवल कुछ टैंक पानी या जल ट्रेन चलाने से समाप्त नही होगी बल्कि कोई बृहद एवम् स्थाई योजना बनाकर काम करना होगा । साथ ही किसान को आत्महत्या से बचाना है, तो उसकी जमीन, मवेशी और चारे को तो बचाना ही होगा। उसे सक्षम बनाना है, तो पहले उस तक बीज, खाद और तकनीक को वाजिब दाम मे पहुंचाना होगा। भंडारण की पर्यापत व्यवस्था करनी होगी। बाजार की समझ पैदा करनी होगी। संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन से ही तस्वीर बदलेगी अन्यथा बच्चों के रोटी मांगने पर मां चाटें मारती रहेंगी। ये भी याद रखना होगा कि जिस देश का बचपन भूखा हो उस देश की जवानी क्या होगी।

सत्यम सिंह बघेल

प्यासे बुन्देलखण्ड में पानी पर सियासत

पिछले कुछ वर्षों से लगातार सूखा एवं जल संकट से जूझ रहे बुन्देलखण्ड में मार्च के महिने में वहां के किसानों और मजदूरों के परिवारों द्वारा अन्न की कमी के कारण घास की रोटी खाने का मामला प्रकाश में आने के बाद प्रशासन हरकत में आया था और प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार की टीमें हालत का जायजा लेने वहां पहुंची थी। उसके बाद ही केंद्र की ओर से राहत पैकेज का ऐलान हुआ था जिसे प्रदेश सरकार ने अपेक्षा के मुताबिक नाकाफी बताया था और कहा कि प्रदेश सरकार के इंतजाम काफी हैं और उन्हें केन्द्रीय मदद की जरूरत नहीं है। लेकिन पिछले हफ्ते तक मामला सुर्ख़ियों में बने रहने तथा रेल मंत्रालय द्वारा पानी की एक ट्रेन झांसी भेजने के बाद फिर शुरू हुआ चिर-परिचित राजनीतिक ड्रामा। वर्षों पहले प्रख्यात फिल्म निर्माता एमएस. सथ्यू की फिल्म ‘सूखा’ (1980) के अंत में डायलॉग था कि इस देश में सूखे पर भी राजनीति होती है। हालात इन 36 वर्षों में कुछ भी बदले नहीं हैं ।
केंद्र सरकार ने लातूर की तर्ज पर सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड की प्यास बुझाने के लिये जल ट्रेन भेजी लेकिन यूपी की अखिलेश सरकार ने ट्रेन का पानी लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि बुन्देलखण्ड में पर्याप्त पानी है और राहत कार्य चल रहें हैं । यह  केवल पानी के मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार के बीच बुंदेलखण्ड में राहत का श्रेय लेने की होड़ का नतीजा है। राज्य सरकार को भय है कि केंद्र व विपक्षी दल यह संदेश देने में कामयाब रहेंगे कि प्रदेश सरकार पानी मुहैया कराने में ठीक से काम नहीं कर रही है। हालांकि पानी की ट्रेन भेजने के पीछे रेल मंत्रालय की ऐसी कोई मंशा नहीं है। वैसे भी पहले से ही केन्द्र का गंगा सफाई अभियान अखिलेश सरकार की आंख की किरकिरी बना हुआ है। अब पानी की ट्रेन के मामले ने अखिलेश सरकार को और डरा दिया। डर यही है कि श्रेय केन्द्र की मोदी सरकार को न मिल जाए। केन्द्र के हर कार्य को राजनीति के चश्मे से देखने की सपा की फितरत ने सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के लोगों तक पानी की ट्रेन पहुंचने ही नही दिया । सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड से लोगों का पलायन रोकने में सपा सरकार कोई ठोस उपाय धरातल पर नहीं ला पाई। लोगों के पास रोजगार नहीं है और खाद्यान्न संकट बना हुआ है। किसान लगातार आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। पानी के लिए देश बहुत हद तक मॉनसून पर निर्भर है, पिछले दो सालों से कमजोर मॉनसून ने हालात और बिगाड़ दिए। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड का क्षेत्र जो लगातार चार वर्षो से सूखे की मार से जूझ रहा है, इन दिनों आखिर बुंदेलखंड उस हालत में पंहुच गया जिसके बारे में पांच महिने पहले ही चेताया गया था। पिछले तीन महिनों में दिल्ली, भोपाल और लखनऊ के चार सौ से ज्यादा बड़े पत्रकार बुंदेलखंड का दौरा कर चुके हैं। लेकिन बुंदेलखंड की व्यथा कथाएं लिखने के अलावा वे भी ज्यादा कुछ सुझा नहीं पाए। हर दिन किसानों की मौतों की गिनती करते रहने के अलावा कोई कुछ नहीं कर पाया।
यह इलाका एक भरे पूरे प्रदेश के बराबर है। आबादी दो करोड़ है। इसे एक नजर में देखना और दिखाना दो-चार हफ्ते का काम नहीं था। ऐसा भी नहीं है कि समझने की कोशिश बिल्कुल भी न हुई हो। हां यह अलग बात है कि देश और विश्व के स्तर पर बुंदेलखंड को समझने की जितनी भी कोशिशें हुईं वे जल प्रबंधन की प्राचीन पद्धतियों को जानने और जटिल भौगालिक परिस्थितियों को समझने की ज्यादा हुईं। सत्तर के दशक में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रुचि वाला बंगरा वाटरशेड अध्ययन हो या अस्सी के दशक में किया गया चंदेलकालीन जल विज्ञान का अध्ययन, किसी का भी फायदा सीधे-सीधे बुंदेलखंड को मिल नहीं पाया। कारण एक ही रहा कि इलाका इतना बड़ा है कि उसके लिए राजनीतिक ईमानदारी और अच्छी खासी रकम की जरूरत थी। इस बात को इसी स्तंभ में कई बार तथ्यों के आधार पर बताया जा चुका है।
उत्तर प्रदेश में सोनभद्र से लेकर महोबा तक जल संकट अब तक के सबसे भयावह रूप में खड़ा है। खेती किसानी तो पहले से चौपट हो चुकी थी अब गृहस्थियां तबाह हो रही है, जल संकट की वजह से रोजगार ठप्प है वहीँ अंतर्राज्यीय पलायन चरम पर पहुँच गया है। गौरतलब है कि अकेले सोनभद्र जनपद से 50 से 60 हजार आदियासियों के पलायन की खबर है। खबर चौंकाने वाली मगर सच है कि पानी के अभाव में पूरे राज्य में हजारों की संख्या में मवेशियों की मौत हुई है, सोनभद्र में पिछले एक सप्ताह के दौरान कई जानवरों ने जंगलों में पानी न मिलने पर पत्थर पर सिर पटक-पटक कर अपनी जान दे दी है। यूपी में 55 जिलों में सूखे की मार है , लेकिन सरकारी तंत्र इस विपदा से निबटने में न सिर्फ नाकाम रहा है बल्कि उसका रवैया असंवेदनशील भी है। ऐसा नहीं है कि सरकारें प्रयास नहीं कर रही हैं, लेकिन आपको समझना यह है कि क्या यह प्रयास पर्याप्त है, कितना बुनियादी हल है, कितना नाम के लिए और कितना दिखावे के लिए।
आज बुंदेलखंड में अकाल जैसे हालात में सरकारें अपना मुंह छिपाने के लिए बुंदेलखंड में कुछ लोगों को रोटी और पानी बंटवाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। वहां मौतों और थोक में पलायन को रोका नहीं जा सकता है। लेकिन हॉ ! अगले साल फिर ऐसे हालात से बचने के बारे में तो सोच ही सकते हैं। राज्य एवं केंद्र सरकारें तथा सभी जन प्रतिनिधि एक बार तसल्ली से बैठकर, गंभीरता से बैठकर, ईमानदारी से बैठकर जल संकट से बचने के ठोस एवं बृहद रूप से तथा स्थाई रूप से योजना बनाने के उपाय ढूंढे ।
उन्हें यह भी समझना पड़ेगा कि आपस में लड़ते रहने से मीडिया में तो बना रहा जा सकता है लेकिन वे काम नहीं हो सकते जो राजनीति के उद्देश्यों में शामिल हैं।
अगर अगले वर्ष जल संकट से बचना है तो अभी से लगना पड़ेगा। सिर्फ लगना ही नहीं पड़ेगा बल्कि युद्ध स्तर पर जुटना पड़ेगा।

सत्यम सिंह बघेल

Tuesday, May 3, 2016

क्या विधवा स्त्री समाज का अंग नही

कुछ साल पहले एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी। इसमें विधवाओं की दयनीय हालत को सुधारने की बात कही गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से विधवाओं को पर्याप्त घर उपलब्ध कराने के लिए कहा। साथ ही मंथली ग्रांट को इस साल 1 जनवरी से 1300 से 5100 रुपए तक बढ़ाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र सरकार वृंदावन में एक हजार विधवाओं के रहने के लिए घर बनवाएगी। इसके लिए 57 करोड़ का बजट रखा गया है। ये घर दिसंबर 2017 तक तैयार हो जाएंगे। इनके मेन्टेनेंस के लिए हर साल 4 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। तथा वृंदावन की विधवाओं को राहत देने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के दूसरे शहरों और पश्चिम बंगाल, ओड़िसा और उत्तराखंड की विधवाओं को भी रिलीफ देने की ओर ध्यान दिया है । संतुलित समाज की कल्पना को साकार करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत ही सराहनीय और सम्मानजनक है। क्योंकि हमारे देश के अंदर समाज में विधवाओं की बहुत ही दयनीय स्थिति है । हमारे यहा विधवाओं की दूसरी शादी का चलन ही नहीं है। पति की मौत के बाद पत्नी को बाकी की जिंदगी अकेले ही बितानी होती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि शादी सात जन्मों का रिश्ता है। ऐसे में विधवा स्त्री दूसरे विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकती। पति की मौत के बाद उसे पूरे जीवन कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। देश में कुछ ऐसे भी इलाके हैं, जहां विधवाओं को अपशकुनी या चुड़ैल मान लिया जाता है। उत्तर व मध्य भारत और नेपाल सीमा से लगे कुछ ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाएं सुनने में आई हैं। ऐसे मामलों में स्थानीय पंचायतें भी कुछ नहीं कर पाती हैं। विधवाओं पर अनेक तरह की सामाजिक बंदिशे हमारे समाज में प्रचलित हैं । उनके लिए श्रृंगार तथा रंग-बिरंगे वस्र धारण करना वर्जित माना गया है। प्रायः वे काली ओढ़नी तथा सफेद छींट का घाघरा पहनते हुए सन्यास- व्रत के नियमों का पालन करती हैं। भारत में विधवाओं के खराब हाल के लिए काफी हद तक पितृसत्तामक व्यवस्था जिम्मेदार है। इस व्यवस्था के तहत परिवार के अंदर सारे अधिकार पति के पास होते हैं। ऐसे में पति की मौत होते ही महिला से सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं और उसका शोषण शुरू हो जाता है। कहने के लिए तो देश में महिलाओं के लिए कई कानून हैं। लेकिन असल में इन कानूनों का पालन नहीं हो पाता है। अक्सर पति की मौत के बाद घर की जमीन भाइयों और बेटों में बट जाती है और विधवा महिला पूरी तरह असहाय हो जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि विधवा के पति अपनी मृत्यु से पहले अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर देते हैं, लेकिन उन्हें यह अधिकार हासिल करने के लिए कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। उन्हें इसके लिए अपने बेटों से एनओसी लेना पड़ता है।
हम सब एक सामाजिक समुदाय का हिस्सा हैं। हमें सदैव एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए, हमें एक-दूसरे की समस्याओं के बारे में पता होना चाहिए जिससे समाधान की दिशा में सही कदम उठाए जा सकें। देश भर में बड़ी संख्या में महिलाएं युद्ध, हिंसा  व बीमारी के चलते अपने पतियों को खो देती हैं और वो विधवा कहलाने लगती हैं | विधवाओं के साथ हमेशा से भेदभावपूर्ण व्यवहार होता आ रहा है। एक अनुमान के अनुसार पति की मौत के बाद अभिशाप समझकर परिवार द्वारा निकाली गईं, ऐसी महिलाओं की संख्या करीब चार करोड़ के आस-पास है | तथा वर्ष 2014 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 5 करोड़ विधवाएं हैं, परंपरा, रीति-रिवाज के नाम पर इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है, परिवार के अंदर उन्हें बोझ समझा जाता है।
वृंदावन और बनारस में रह रही हजारों विधवायें पिछले कई सालों से समाज की मुख्यधारा से दूर एक गुमनाम जिंदगी बिता रही है। इनमें अधिकतर विधवायें पश्चिम बंगाल एवं उत्तर भारत की हैं जो पति की मौत के बाद परिवार से निकाल दी गईं और देश के कई हिस्सों में भटकने के बाद वृंदावन और बनारस के विभिन्न आश्रमों में पहुंची या खुद परिवार द्वारा यहां जबरन पहुंचा दी गई। विधवाओं की खराब स्थिति के लिए अशिक्षा एक बड़ी वजह है। जहां अशिक्षा है, वहां गरीबी होना तय है। गरीबी की वजह से विधवाओं को बुनियादी जरूरतें जैसे भोजन, कपड़े और दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। अनपढ़ होने की वजह से इन महिलाओं को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं होता और वे चुपचाप शोषण बर्दाश्त करने को मजबूर हो जाती हैं। उनके लिए राज्य और केंद्र सरकारों की कई योजनाएं हैं, पर इनका लाभ उन तक नहीं पहुंचता। गैर समाज सेवी संस्थाओं की मदद से इनमें से कुछ को रहने और खाने का आसरा मिल जाता है ।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर की पुस्तक "हिन्दू विधवा विवाह" के अनुसार प्राचीन भारत के इतिहास में ब्राह्मण,  उच्च राजपूत, महाजन, ढोली, चूड़ीगर तथा सांसी जातियों में विधवा विवाह वर्जित था। अन्य जातियों में विधवा विवाह प्रचलित थे। वर्ष 1853 में हुए एक अनुमान के अनुसार कोलकाता में लगभग 12,718 वेश्याएं रहती थी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर उनकी इस हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिंदूसमाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा 1856 में अंग्रेज़ी सरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिश की। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया था। विधवा विवाह से तात्पर्य ऐसी महिला से विवाह है जिसके विवाह उपरांत उसके पति का देहांत हो गया हो और वह वैध्वय जीवन व्यतीत कर रही हो। कुलीन वर्गीय ब्राह्मणों में यह व्यवस्था थी कि पत्नी के निधन हो जाने पर वह किसी भी आयु में दूसरा विवाह कर सकते हैं। यह आयु वृद्धावस्था भी हो सकती थी। पत्नी के रूप वह किशोरवय लड़की का चयन करते थे और जब उनकी मृत्यु हो जाती थी तो उस विधवा को समाज से अलग कर उसके साथ पाश्विक व्यवहार किया जाता था। जो महिलाएं इस तरह के व्यवहार को सहन नहीं कर पाती थीं, वह खुद को समर्थन देने के लिए वेश्यावृत्ति की ओर क़दम बढ़ा लेती थीं। विधवा विवाह को बेहद घृणित दृष्टि से देखा जाता था। इसी कारण बंगाल में महिलाओं विशेषकर बाल विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी।
लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में ऐसी विधवाओं को समाज की मुख्यधारा में वापिस लाए जाने की जरूरत है। जो अपने तन पर सफेद साड़ी आते ही समाज के रिश्ते-नातों और दुनिया के रंगों से अलग कर दी जाती हैं । वे अब बदलते समय के साथ समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहती हैं और इनमें से कई विधवाएं एक बार फिर विवाह बंधन में बंधने एवं नई जिन्दगी जीने का सपना भी देखती हैं। अत: महिलाओं को विधवा होने के बाद पुरुषों की ही तरह फिर से विवाह करने का अधिकार होना चाहिए। विधवा महिलाओं को समाज में बिल्कुल अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि उन्हें फिर से रिश्ते जोड़ने का हक मिलना चाहिए, समाज के लोग इसमे उनका साथ दें। महिला कम उम्र में विधवा हो जाती है तो उसे पुन: घर बसाने का मौका दिया जाना चाहिए। इसके लिए समाज को एवं समाज के हर वर्ग को जागरूक होना होगा और रीति-रिवाज और परम्पराओं को परे रखकर, विधवाओं को उनके अधिकार दिलाने की अवाश्यकता है, जिस समाज में सभी को समान रूप से जीने का अधिकार है उस समाज में विधवाओं का यह अधिकार क्यों छीन लिया जाता है, उनका शोषण क्यों किया जाता है ? क्यों उन्हें अनदेखा किया जाता है ? क्यों उन्हें अछूत की दृष्टि से देखा जाता है ? क्यों उनके साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है ? क्या वे समाज का अंग नही है ? क्यों उनके प्रति दुर्भावना रखी जाती है ? उनके साथ ऐसा नही किया जाना चाहिए उन्हें समाज में समानता का दर्जा दिया जाना चाहिए । अगर वे फिर से विवाह करना चाहती हैं तो विरोध करने की बजाये उनका साथ देना होगा, वे अगर नई जिन्दगी की शुरुआत करने का सपना देखती हैं, तो उनके अंदर सपने सकार करने का हौसला भरना चाहिए । उनकी शोषित, दुखभरी, अनदेखी दुनिया को समाप्त कर फिर से उनके जीवन को खुशियों से भर देना चाहिए । क्योंकि रीति-रिवाज इंसान के लिए हैं न कि इंसान रीति-रिवाज के लिए, अगर किसी अच्छे काम के लिए रीति-रिवाज को बदलना पड़े तो हमे बदल देना चाहिए ।

लेखक - सत्यम सिंह बघेल

किसान हितैषी बयानों से घिरी किसानों की दर्द भरी जिंदगी

किसान के लिए उसके खेत खलिहान और उसकी फसल ही उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके अरमान, उम्मीदें, सबकुछ होती हैं । लेकिन जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारण वश किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है उसकी उम्मीदें बिखर जाती हैं, सपने चूर चूर हो जाते हैं . वर्तमान समय में भी सूखा पड़ने के कारण देश के अन्नदाता के यही हाल बने हुए हैं ।
देश के अधिकांश भागों में बारिश कम होने और सूखा पड़ने के कारण पिछले वर्ष खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हुई थीं । इसके बाद ओलावृष्टि के कारण कुछ क्षेत्रों में रबी की फसल पूरी तरह चौपट हो चुकी है । इससे अन्नदाता कहे जाने वाले भारतीय किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, वह अपनी बेहताशा आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है ।
किसानों का जीवन अस्त-व्यस्त और बेहाल है, जीना मुसकिल हो गया है । किसान खून के आंसू पीने पर मजबूर हैं । किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं और हमारे देश की राजनैतिक दल एवं सरकार उसकी विवशता पर उसे सहयोग देने, आर्थिक मदद करने , उसका हौसला बढ़ाने की बजाये उसकी इस दशा पर सिर्फ अपनी राजनैतिक सियासत की गोटियाँ खेल रहे हैं । अब मप्र के किसानों के हाल ही देख लीजिये । वहां पिछले रबी के सीजन में भारी ओलावृष्टि से कुछ जगह फ़सलें पूरी तरह चौपट हो चुकी हैं । ओलावृष्टि से चौपट हुई फसलों का सर्वे भी हुआ। नुकसान की रिपोट भी तैयार हुई । उस समय ओलावृष्टि से पीड़ित किसानों की बदहाल दशा पर खूब राजनीति भी हुई । सभी दल के नेताओं ने खेतों में जाकर नष्ट हुई फसल और पीड़ित किसानों के साथ खूब फोटो निकलवाया । बढ़-चढ़कर बयान बाजी हुई । खूब घोषणाएं हुई, हर संभव मदद की दिलाशाएं दी गई । सरकार द्वारा बिजली बिल माफ़ करने, इस वर्ष ऋण वसूली स्थगित करने, पीड़ित किसानों को एक रुपया किलो चावल, नमक, गेहूं देने की घोषणा की गई, जल्द से जल्द मुआवजा देने का वादा किया गया लेकिन अभी तक किसानों को कोई मदद नही मिल पाई । समय बीता समय के साथ सारी घोषणा, अस्वासन, वादे सब के सब ठंडे बस्ते में चला गया, अब किसानों के हाल जानने वाला कोई नही है
ऐसा नही है कि किसानो की यह स्थिति केवल वर्तमान समय में है । किसानों की यह दयनीय दशा हमेशा से बनी हुई है । चाहे वह कांग्रेस की सरकार को या भाजपा की सरकार सभी के कार्यकाल में किसानों का शोषण हुआ है, उन्हें अनदेखा किया गया है, उनकी दयनीय दशा पर हमेशा से राजनीति हुई है ।
जब से देश आजाद हुआ तब से अपनी समस्याओं के चलते किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं । राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं की थी । 2009 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 1172 की वृद्धि हुई थी, अत: 2009 के दौरान 17368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई. राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार 1994 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की हैं । सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रूक नहीं रहा है, देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं । वहीं केवल यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 500 पहुँच गई है, इस क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में 5000 लोग आत्महत्या कर चुकें । बुंदेलखंड के लोग घास की रोटी और घास की ही चटनी खाने को मजबूर हैं ।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की स्थिति सभी को मालूम है, जहाँ लोगों के पास पीने तक को पानी नही है उस क्षेत्र के किसानों की क्या दशा होगी । यह सब सोचकर मन बहुत ज्यादा विचलित हो जाता है । लेकिन किसानों की इस दुखदायी घड़ी में राजनैतिक दल उनका साथ देने और उनका सहयोग करने की बजाए, उनकी इस लाचारी एवं बेवसी पर राजनीति कर रहे हैं ।
हाल ही में कुछ माह पूर्व राहुल गाँधी ने किसानों से मिलने के लिए पद यात्रा किये थे। बड़ी आस लगाकर किसान उनसे मिलने पहुंचे कि हमें हमारी समस्या से निपटने के लिए, सूखे की मार से उभरने के लिए, बारिश की चपेट से बचने के लिए सुझाव दिए जायेंगे हमारी कुछ मदद की जाएगी । लेकिन यात्रा में ऐसा कुछ नहीं हुआ, वहां हुआ तो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और अपनी वोट बैंक की राजनीति बस, जो 65 वर्षों से हो रहा है । किसानो की कोई मदद नही, कोई सुझाव नही, किसानो की स्थिति आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है, चाहे विदर्भ या बुन्देलखण्ड हो या फिर अन्य क्षेत्र । ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस को अचानक से किसानों की याद आने लगी, क्या इसलिए कि कांग्रेस का अस्तित्व अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है ? क्या कारण है कि कांग्रेस किसानों की हितेषी बन गई, उसे देश में हो रही नित्य प्रति किसानों की आत्महत्याएं दिखाई देने लगी, उनकी छिनती हुई जमीन याद आने लगी, उन पर अपार सहानुभूति बरसने लगी ।
वैसे ये कोई नयी बात नहीं है ये तो हमेशा से ही हो रहा है, देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों के साथ छल कपट कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हमेशा से ही होता चला आ रहा है, राजनैतिक पार्टियां सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति करती आयी हैं । हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह देश किसानों का देश है, इस देश के किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं . इन बातों को अख़बारों, किताबों में पढ़ते-पढ़ते और भाषणों, समाचार चेनलों में सुनते सुनते वर्षों बीत गये, कई पीढियां गुजर गई, फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है वह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है और राजनैतिक दल उसकी इस हालत पर राजनीति करने में लगे हुए हैं .
हमारे द्वारा ही चुनी गई सरकारें आज इतने संवेदनशून्य हो चुकी हैं कि उन्हें किसानों की मौत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । यही नहीं सरकारें किसानों की फसल खराब होने पर उन्हें मुआवजा राशि के रूप में 6₹, से लेकर 100₹ तक देती हैं । आख़िर ये जले पर नमक छिड़कना नहीं तो और क्या है ? किसान परिश्रम, बलिदान, त्याग और सेवा के आदर्श द्वारा देश का उपकार करता है, प्रकृति का वह पुजारी तथा धरती मां का उपासक है । धन से गरीब होने पर भी वह मन का अमीर और उदार होता है । किसान अन्नदाता है, वह समाज का सच्चा हितैषी है। उसके सुख़ में ही देश का सुख़ है और उसकी समृद्धि में ही देश की समृद्धि है । लेकिन फिर भी देश राजनैतिक दल किसानों के साथ छल-कपट की राजनीति कर रहें है और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, बार-बार सिर्फ कोरे वादे करके अपना प्रचार प्रसार करते हैं बस और कुछ नहीं । आज हम देख रहे हैं किसानों की दशा क्या है यह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है
सरकारों द्वारा किसानों के लिए उचित कार्य जो करने चाहिए थे नहीं किया गया । तभी तो आज भी देश में कृषि शिक्षा के विश्वविध्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है। शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है । राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविध्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं । कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ । जिन फसलों को किसान बोना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक जलवायु, पानी, भूमि आदि कैसा होना चाहिए । इसका परीक्षण कर संबंधित किसानों को शिक्षित किये जाने की भी व्यवस्था कराई जानी चाहिए ताकि वह सुझावानुसार कार्य करने के लिए सहमत हो। इस हेतु अच्छी प्रजाति के बीजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, बीज की बुवाई के समय कृषि क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ अपनी देखरेख में बुवाई कराएं तथा उन पर होने वाली बीमारियों, आवश्यक उर्वरकों, सिंचाई, निकाई, निराई, गुड़ाई आदि का कार्य आवश्यकतानुसार समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों के निर्देशन में कराया जाना चाहिए, इससे उत्पादन बढ़ेगा एवं किसान समृद्ध होगा । किसान समृद्ध होगा तभी तो देश समृद्ध होगा ।

लेखक – सत्यम सिंह बघेल

Sunday, May 1, 2016

बाल मजदूरी : भारत का भविष्य अंधकार के आगोश में

इंसान के लिए बचपन की यादें उसकी जिन्दगी में सबसे बेहतरीन और यादगार पल के रूप में होती हैं, न किसी बात की फ़िक्र, न ही कोई काम और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर पल हर घड़ी खेलते कूदते रहना, पढ़ना-लिखना, आराम करना और अपनी मस्तियों में खोए रहना और ख़ुशी-ख़ुशी जीना । लेकिन समाज में हर किसी का बचपन ऐसा ही हसीन हो यह जरूरी नहीं, आज भी समाज में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है, जो इन सब बातों से अनभिज्ञ है, जो अपनी दैनिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है | समाज का यह वर्ग बचपन से ही अपनी आर्थिक-सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है, मुसीबतों से लड़ रहा है | अपनी गरीबी, निर्धनता, लाचारी के कारण मजदूरी करने के लिए बेबस है | हमारे समाज में आज बहुत अधिक संख्या में 14 वर्ष से भी कम उम्र के बच्चे मजदूरी करने के लिए विवश हैं, जिसे हम बाल मजदूरी कहते हैं |  
दुनिया के कई देशों में आज भी बच्चों को बचपन नसीब नहीं है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 12 जून बाल मजदूरी के विरोध का दिन है, अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन आईएलओ 2002 से हर साल इसे मना रहा है, लेकिन फिर भी दुनिया भर में बड़ी संख्या में बच्चे मजदूरी कर रहे हैं, इनका आसानी से शोषण हो सकता है | उनसे काम दबा छिपा के करवाया जाता है, वे परिवार से दूर अकेले इस शोषण का शिकार होते हैं, घरों में काम करने वाले बच्चों के साथ बुरा व्यवहार बहुत आम बात है | वैश्विक स्तर पर देखें तो सभी गरीब और विकासशील देशों में बाल मजदूरी बड़ी समस्या बनी हुई है | दुनिया में ऐसे 71 देश हैं जहां बच्चों से मजदूरी करवाई जाती है, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट में 140 देशों का आंकलन किया गया है | 'फाइंडिंग्स ऑन द वर्स्ट फॉर्म्स ऑफ चाइल्ड लेबर' नाम की इस रिपोर्ट में ऐसी 130 चीजों की सूची बनाई गई है जिन्हें बनाने के लिए बच्चों से काम करवाया जाता है | इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ईंटें तैयार करने से लेकर मोबाइल फोन के पुर्जे बनाने तक के कई काम बच्चों से लिए जाते है | इसकी मुख्य वजह यही है कि मालिक सस्ता मजदूर चाहता है, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने बाल मजदूरी पर 130 ऐसी चीजों की सूची बनाई है, जिनके निर्माण में बच्चों से काम करवाया जाता है, इस सूची में सबसे ज्यादा बीस उत्पाद भारत में बनाए जाते हैं, इनमें बीड़ी, पटाखे, माचिस, ईट, जूते, कांच की चूड़ियां, ताले, इत्र, कालीन कढ़ाई, रेशम के कपड़े और  फुटबॉल बनाने जैसे काम शामिल हैं | आईएलओ का कहना है कि दुनिया में एक तिहाई देशों ने अब तक ऐसी सूची बनाई ही नहीं है जिस से वे तय कर सकें कि कौन से काम बच्चों के लिए हानिकारक हो सकते हैं | कई देशों में काम करने की कोई न्यूनतम उम्र तय नहीं की गई है और उन देशों में जहां बाल श्रम के खिलाफ कानून हैं वहां इनका ठीक तरह से पालन नहीं किया जाता, विकासशील देशों में बाल श्रमिकों की संख्या सब से ज्यादा है |
बाल मजदूरी की यह विकराल समस्या भारत में भी विशाल रूप धारण किये हुए है, यह देश में बहुत बड़े पैमाने में फैली हुई है | हमारे देश में तमाम सरकारी-गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद देश में बाल मजदूरी बड़ी चुनौती बनी हुई है, नगरों-महानगरों से लेकर गांव कस्बों तक घरों से लेकर छोटे-बड़े ढाबों, दुकानों और सार्वजनिक संस्थानों में बड़ी संख्या में बच्चों को काम करते देखना आम बात है | बीड़ी उद्योग जैसी जगह में बड़ी संख्या में बच्चे काम कर रहे हैं जो लगातार तंबाकू के संपर्क में रहने से ज्यादातर बच्चों को इसकी लत पड़ जाती है और इससे फेफड़े संबंधी रोगों का खतरा बना रहता है | ऐसे ही बड़े पैमाने पर अवैध रूप से चल रहे पटाखा और माचिस कारखानों में लगभग 50 प्रतिशत बच्चे होते हैं जिन्हें दुर्घटना के साथ-साथ सांस की बीमारी का भी खतरा बना रहता है, इसी तरह से चूड़ी निर्माण में भी बाल मजदूरों का ही पसीना होता है जहां 1000-1800 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाली भट्टियों के सामने बिना सुरक्षा इंतजामों के बच्चे काम करते हैं, देश के कालीन उद्योग में भी लाखों बच्चे काम करते हैं, आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कालीन उद्योग में जितने मजदूर काम करते हैं, उनमें से तकरीबन 40 प्रतिशत बाल श्रमिक होते हैं | वस्त्र और हथकरघा खिलौना उद्योग में भी, भारी संख्या में बच्चे खप रहे हैं, पश्चिम बंगाल और असम के चाय बागानों में लाखों की संख्या में बाल मजदूर काम करते हैं, इनमें से अधिसंख्या का तो कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता, कुछ बारीक काम जैसे रेशम के कपड़े बच्चों के नन्हें नाजुक हाथों से बनवाए जाते हैं | वहीँ हमे कचरे के ढेर से  पन्नी बीनना हो या बूट पालिस की दुकान, ढाबों में बर्तन धोने का काम हो या फिर बसों-ट्रेनों में अश्लील किताबें बेचने के लिए दिन भर बस स्टैण्ड में बोझा उठाने के काम में जुटे भूखे नंगे, अधनंगे बच्चे प्रदेश के प्राय: सभी शहरों और कस्बों में मिल जाएंगे, जिन्हें कानून और समाज ने बाल श्रमिक का नाम दिया है। ये लोग यह काम मजबूरी में करते हैं, भला पेट की आग तो उन्हें बुझाना ही पड़ेगा। भूखे पेट भला बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे और कैसे पढ़ाई करेंगे? सरकार गरीब बच्चों को स्कूलों तक लाने और साक्षरता प्रतिशत बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चला रही है। इसके तहत गरीब बच्चों को चिन्हित कर उनका स्कूलों में एडमिशन कराया जा रहा है, लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि ये बच्चे अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए ही इन कामों में जुटे हुए हैं। कोई पन्नी बीनकर अपने भोजन की व्यवस्था करता है, तो कोई ढाबे पर बर्तन मांझकर, तो कोई घरों में झाडू-पौछा करके।
सरकारें लाख बाल श्रम से जुड़े चाहे कितने भी कड़े कानून बना दिए जाएं, लेकिन बच्चों को उनके पेट की आग मजदूरी करने को विवश कर ही देती है। दौर चाहे सामंतों का रहा हो या फिर आज के आजाद देश का, बाल श्रमिक आज भी अमीरों के घरों से लेकर कचरे के ढेरों पर पन्नी बीनते, ढाबों पर काम करते नजर आ जाते हैं। मानवधिकार ही नहीं तमाम सरकारी-गैरसरकारी संगठन जो भी इन्हें अधिकार दिलाने की बात मंचों और समारोहों में करते हैं, उन्हे छोड़ भी दे तो सबसे अहम सवाल पेट के लिये दो वक्त की रोटी का है, जिसकी तलाश में बच्चें बोरी उठाये कचरें में रोजी और रोटी दोनों ही तलाशतें हैं। सार्वजनिक स्थलों पर बूट पलिस की बूट चमकाने में अपने बचपने की धार खो देते हैं । ढावे में साफ सफाई करने से लेकर सब्जी काटने और रोटी परोसने में यही बच्चे लगे रहते हैं । अपना बचपना बर्बाद करने के बाद उन्हें कुल दो जून का खाना भी नहीं मिल पाता है ।
यह स्थिति समाज में बालश्रम की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाती है और यह भी कि समाज में कानून का कोई खौफ नहीं है, सरकारी मशीनरी इसे नजरअंदाज करती नजर आती है,  2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 साल के बच्चों की आबादी 25.96 करोड़ है |  इनमें से करीब एक करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं, इनमें 5 से 9 साल की उम्र के करीब 25 लाख और 10 से 14 वर्ष की उम्र के 75 लाख बच्चे शामिल हैं | राज्यों की बात करें तो सबसे ज्यादा बाल मजदूर उत्तर प्रदेश (21.76 लाख) में हैं, जबकि दूसरे नम्बर पर बिहार है जहां 10.88 लाख बाल मजदूर हैं, राजस्थान में 8.48 लाख, महाराष्ट्र में 7.28 लाख तथा, मध्यप्रदेश में 7 लाख बाल मजदूर हैं |  यह सरकारी आंकड़े हैं और यह स्थिति तब है जब 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे बाल श्रम की परिभाषा के दायरे में शामिल हैं |
1992 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह कहा था कि अपनी आर्थिक व्यवस्था देखते हुए हम बाल मजदूरी को खत्म करने का काम रुक-रुककर करेंगे क्योंकि इसे एकदम से नहीं रोका जा सकता है, लेकिन भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा 32 पर सहमति नहीं दी है जिसमें बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने की बाध्यता है, 22 साल बीत जाने के बाद हम बाल मजदूरी तो खत्म नहीं कर पाए हैं | साथ ही इसके विपरीत केंद्रीय कैबिनेट ने बाल श्रम पर रोक लगाने वाले कानून को कुछ नरम बनाने की मंजूरी दे दी है | इसमें सबसे विवादास्पद संशोधन पारिवारिक कारोबार या उद्यमों, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और स्पोर्ट्स एक्टिविटी में संलग्न 14 साल से कम उम्र के बच्चों को बाल श्रम के दायरे से बाहर रखने का है |
बिडम्बना देखिये कि पिछले साल ही बाल मजदूरी के खिलाफ उल्लेखनीय काम करने के लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणोता कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिनका कहना है कि बच्चों से उनके सपने छीन लेने से ज्यादा गम्भीर अपराध और क्या हो सकता है, जब बच्चों को उनके माता-पिता से जुदा कर दिया जाता है, उन्हें स्कूल से हटा दिया जाता है या उन्हें तालीम हासिल करने के लिए स्कूल जाने की इजाजत न देकर कहीं मज़दूरी के लिए मजबूर किया जाता है या सड़कों पर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है, ये सब तो इंसानियत के माथे पर धब्बा है | लेकिन लगता है कैलाश सत्यार्थी की यह आवाज अभी हमारे नीति निर्माताओं के कानों तक नहीं पहुची है, तभी तो कहा जा रहा है कि बच्चों की सेहत और शिक्षा बाधित किये बिना वे घरेलू श्रम में हाथ बंटा सकते हैं, बालश्रम के विरुद्ध लागू कानून में यह संसोधन बाल श्रम और शोषण को सीमित करने के बजाय उसे बढ़ावा ही देगा | अगर चाइल्ड लेबर एक्ट को भी अच्छी तरह से लागू कर दे तो भी बहुत कुछ हो जाएगा लेकिन वो भी नहीं होता, मजदूरी कराने वालों के हिसाब से काम होता है, बच्चों से मजदूरी करवाने की जो सजा है वो बिलकुल सख्त नहीं है, या तो तीन महीने की सजा होगी या फिर 20 हजार का जुर्माना, दोनों में से एक ही सजा मिलती है तो अधिकतर लोग जुर्माना दे कर छूट जाते हैं | फिर ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई भी नहीं होती, बच्चे पुनर्वास केंद्रों में फंसे रहते हैं, वहां की हालत कैसी है ये सभी जानते हैं | भारत में बाल मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या होने का सबसे बड़ा कारण गरीबी-लाचारी है अगर गरीबी हट जाये तो बाल मजदूरी का अंत संभव है | यदि बाल मजदूरी का अंत किया जाता है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी लेकिन इस दिशा में पहला कदम तो उठाया ही जाना चाहिए, मतलब गरीबी दूर की जानी चाहिए । देश में व्याप्त बाल मजदूरी को सामूहिक रूप से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है, क्योंकि यह संतुलित समाज के लिए कलंक है इसे समाप्त करना ही होगा | यदि हमें बेहतर भारत का निर्माण करना है और बच्चों के भविष्य को सुधारना है तो फिर इंतजार मत कीजिए, इस महत्वपूर्ण कार्य को तत्काल शुरू कर दीजिए। बाल मजदूरी की समस्या विकराल है लेकिन कुछ अच्छी कोशिशें भी नजर आ रही हैं, कर्मचारी संघों और नियोक्ता संगठनों के बाल मजदूरी के खिलाफ कदम उठाने के कुछ उदाहरण सामने आ रहे हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में, संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर लिखा है, "तमिलनाडु और मध्यप्रदेश के कर्मचारी संघों में ग्रामीण सदस्य कोशिश कर रहे हैं कि उनका गांव बाल श्रमिकहीन गांव बने, कई लोग बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए एक साथ काम कर रहे हैं", इसी मुहिम में हमें सभी को जुड़कर एवं आन्दोलन का रूप देकर बाल मजदूरी को जड़ से समाप्त करना होगा ।

सत्यम सिंह बघेल