Sunday, May 1, 2016

तनाव सहने की घटती क्षमता से बढ़ती आत्महत्याएं

जमशेदपुर की रहने वाली प्रत्युषा बनर्जी का जन्म 10 अगस्त 1990 में हुआ था। प्रत्यूषा ने साल 2010 में कलर्स चैनल के हिट शो बालिका वधु में एंट्री ली थी । उनका चयन फेसबुक के माध्यम से हुआ था। इस धारावाहिक के चुनाव में प्रत्युषा ने 70 प्रतिभागियों को पछाड़कर अपनी जगह बनाई । इसके बाद आखिरी तीन प्रतिभागियों का चुनाव दर्शकों की वोटिंग के आधार पर किया गया , जिसमें प्रत्युषा को सबसे ज्यादा वोट मिले और उनका चुनाव बड़ी आनंदी के लिए किया गया। 16 साल की उम्र में ही प्रत्युषा ने टीवी सीरियल में काम करना शुरु कर दिया था। अभिनय  के साथ-साथ प्रत्युषा ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और डिस्टेंस एजुकेशन के द्वारा अपनी बाकी की पढ़ाई पूरी की। प्रत्युषा बनर्जी अपने एक्टिंग करियर की गाइडलाइंस भी खुद बनाया करती थीं। अगर काम उनके मुताबिक नहीं होता तो वो उसे छोड़ देती। जमशेदपुर जैसे छोटे शहर से आकर टीवी की दुनिया में शौहरत हासिल करने वाली बालिका बधु की आनंदी के किरदार में अपनी प्रसिद्धि बटोरने वाली प्रत्यूषा बनर्जी ने आनंदी के किरदार के बाद अभिनय की दुनिया में और भी कई किरदार निभाये, लेकिन इस किरदार ने उन्हें जो पहचान दिलाई वो किसी और से नहीं मिल पायी । छोटी उम्र में ही प्रत्युषा ने बड़ा मुकाम हासिल कर लिया था लेकिन एक समय ऐसा आया कि फर्स से अर्स तक पहुंचने वाली तथा संघर्ष के हर दौर से गुजरकर सफलता के शिखर तक पहुंचने वाली प्रत्युषा बनर्जी आखिर में हिम्मत हार गई और घर में पंखे से लटककर खुदकुशी कर ली। क्या वजह है, कि संघर्ष कर ऊंची उड़ान भरने वाली प्रत्युषा बनर्जी अपने सफलता के दिनों में जिंदगी की जंग हार गई । प्रत्यूषा बनर्जी की मौत से जहां उनका परिवार सदमे में है, तो वहीं उनके प्रशंसक भी इस गम से उभर नहीं पा रहे हैं। प्रत्युषा की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी मौत की खबर से आहत होकर रायपुर के गोकुलनगर गुढयारी इलाके की रहने वालीं मधु महानंद ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। आनंदी यानी प्रत्यूषा यानी सूर्य की अंतिम रश्मि का भरी दोपहर में ही सूर्यास्त हो गया। झारखंड की संकरी गलियों से निकलकर चांद छूने की तमन्ना लेकर कांक्रीट के जंगल में पहुंची एक होनहार लड़की प्रत्यूषा को चांद तो नहीं मिला किन्तु मौत जरूर मिल गई। उनकी कामयाबियों का जिक्र और क्या हुआ, कैसे हुआ आदि का तबसरा तो तमाम चैनल लगातार कर ही रहे हैं, पर यह कोई नहीं कह रहा कि संस्कारों से भटकर नकारात्मकता को गले लगाने का परिणाम कितना बुरा होता है। उसके साथ जाम टकराने वाले तो थे , चौंधियाती रातों के ढलने तक फरेबी कहकहे लगाने वाले भी थे, नहीं था तो कोई एक ऐसा अपना जो सचमुच अपना होता। जिससे मन की बात कही जा सकती। कस्बाई मानसिकता की एक लड़की को मुंबई ने बिंदास तो बना दिया, लेकिन इतना तन्हा भी कर दिया कि दर्द बांटने को एक कंधा भी न था। ऐसा एक भी कंधा होता तो चार कंधों की जरूरत इस उम्र में न पड़ती। आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ और पश्चिमी सभ्यता की दुहाई देने वाले भूल जाते हैं कि जड़ों से टूटकर जिंदगी से जुड़े रह पाना बिल्कुल सम्भव नही है । ऐसी कामयाबियां बेमानी हैं जिनमें जिंदा रहने का मकसद ही हवन हो जाए।
हम किसी की आत्महत्या की खबर पढ़कर दुखी होते हैं या आश्चर्य जताकर भूल जाते हैं । लेकिन क्या किसी ने सोचा है ? आत्महत्या के आंकड़े दिन पर दिन क्यों बढ़ रहें है । इसकी मुख्य वजह क्या है ? यह जानना, समझना बेहद जरूरी है । प्रत्युषा बनर्जी की आत्महत्या केवल उनका मामला नही है बल्कि यह एक समाज का गंभीर विषय है । क्योंकि हमारे देश में किसी न किसी वजह से हर दिन न जाने कितने लोग आत्महत्या कर गुमनाम हो जाते हैं । आज समाज में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। परीक्षा के समय छात्र-छात्राओं द्वारा मौत को गले लगाने की घटनाएं आम बात हो गई है। हर वर्ष ऐसी घटनाएं सामने आ रही है। सिर्फ छात्र-छात्राएं ही नहीं आम लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं। छोटी-छोटी बातों व तनाव को लेकर लोग सीधे जीवन को ही समाप्त करने का मन बना रहे हैं। शहरी क्षेत्र हो या गांव ऐसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं।लोगों में तनाव सहने की क्षमता घट चुकी है, जो बेहद चिंताजनक विषय है । आत्महत्या करने वाले ज्यादातर किशोरावस्था के होते हैं। इस समय उनमें सोचने-समझने की दक्षता पर्याप्त नहीं होती। मानसिक रूप से वे पूरी तरह परिपक्व नहीं होते। छात्र-छात्राएं इसी अवस्था से पढ़ाई आदि को लेकर माता-पिता, समाज व दोस्तों का दबाव भी तनाव का कारण बनता है।कभी सिर्फ बड़ी उम्र के लोगों को होने वाला डिप्रेशन अब तेजी से स्कूल जाने वाले बच्चों को अपना आसान शिकार बना रहा है। एक शोध के नतीजे बताते हैं कि बच्चों में तेजी से बढ़ रही आत्महत्या की घटनाओं के पीछे सबसे बड़ी वजह यही डिप्रेशन है। अहम बात यह है कि बच्चों में डिप्रेशन के कारण बहुत ही छोटे-छोटे होते हैं, जिन्हें अभिभावक और समाज समझ नहीं पाते। विडम्बना यह है कि जो मां-बाप उन्हें दुनिया में लाते हैं प्राय: उन्हीं की महत्वाकांक्षाओं का दबाव उनकी जान ले लेता है। बच्चों में 80 प्रतिशत आत्महत्याएं पूर्व संकेत के बाद ही होती हैं। कुछ ही खुदखुशी क्षणिक आवेग में होती हैं। आत्महत्या करने वाले ज्यादातर बच्चे डिप्रेशन, खासकर सायकोटिक डिप्रेशन का शिकार होते हैं। उनके मन में हर समय एक तरह का अपराधबोध मौजूद होता है। सबसे ज्यादा वे इस बात से दुखी होते हैं कि अपने माता-पिता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। किसी भी गलत काम या दुखद घटना के लिए भी बच्चे कई बार खुद को दोषी मान लेते हैं और अवसादग्रस्त हो जाते हैं। निराशा और अवसाद की चरम सीमा होती है आत्महत्या, जिससे बचने के लिए जरूरी है कि बच्चों को डिप्रेशन से बचाया जाए। वैसे निराशा, अवसाद की यह प्रवत्ति सिर्फ बच्चों को ही नही बल्कि बुजुर्ग, युवा, जवान, महिला, अमीर, गरीब सभी ग्रसित हैं। आज हर वर्ग, हर उम्र के लोग आत्महत्या कर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर रहे हैं । आखिर क्यों आत्महत्या की घटनाएं दिन पर दिन बढ़ रहीं हैं, क्यों लोग अवसाद से ग्रसित हो रहे हैं ? क्यों लोगों में तनाव सहने की क्षमता कम हो रही है ? इसकी मुख्य वजह पर गौर किया जाये तथा हमारी शिक्षा व्यवस्था में उन बातों को प्रमुखता से बताया जाये, जिनकी जानकारी देना अतिआवश्यक है। जैसे जीवन से प्रेम करना, संघर्षशील लोगों का उदाहरण देना, दुख मे खुद को किस तरह संभाल कर रखें, संघर्ष में खुद को कैसे प्रेरित करें, खुश रहने के तरीके, नेगेटिव सोच से बचने की कोशिश करना, हमेशा सकारात्मक बने रहने और सकारात्मकता के फायदे के बारे में बताया जाये, किसी भी काम मे धैर्य रखने के बारे में एवं इस तरह से लोगों में सकारात्मक जीवन जीने की प्रेरणादायक बातें बताना बहुत आवश्यक है ।

सत्यम सिंह बघेल ।

जल संकट : मदद करना हम सब की जिम्मेदारी

बारिश कम होंने की वजह से देश के अधिकांश राज्यों में जल संकट की स्थिति गहराई हुई है । सबसे अधिक सूखे की बदतर हालात महाराष्ट्र में बनी हुई है । लगातार चौथी बार महाराष्ट्र सूखे का सामना कर रहा है। सबसे ज्यादा असर औरंगाबाद, लातूर और विदर्भ के जिलों में देखने को मिल रहा है। कई तालाबों और नदियों में पानी 4% से भी कम बचा है । वहीं मराठवाड़ा में नदी और डैम पूरी तरह से सूख चुके हैं। भयंकर सूखे के कहर की वजह से किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।  यहाँ वर्ष 2016 में हर महीने करीब 90 किसानों ने आत्म हत्या की । पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई है । मौजूदा समय में महाराष्ट्र में करीब 15,000 गांव गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं, जिनमें से अधिकांश गांव लातूर, बीड और उस्मानाबाद जिले में आते हैं। इन गॉवों में करीब 2.45 करोड़ आबादी है। जिनमे पांच लाख से अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर खतरा पैदा हो गया है। जिले को पानी की सप्लाइ करने वाले मंजरा डैम और धानेगांव नदी के सूख जाने से पानी की भारी कमी हो गई है और मराठवाड़ा में केवल टैंकर के पानी के सहारे मरीजों का उपचार करने में डॉक्टरों को काफी मुश्किल हो रही है। स्थिति इतनी खराब है कि लातूर में लगभग 160 क्लिनिक्स और हॉस्पिटल्स ने पहले से तय सर्जरी में काफी कमी कर दी है और वे केवल इमरजेंसी ऑपरेशन ही कर रहे हैं। आज हालात यह बने हुए हैं कि मराठवाड़ा में लोगों को तीन-तीन दिन तक पानी नहीं मिल पा रहा है ।
पानी की किल्लत दूर करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें ट्रेन के जरिए पानी पहुंचा रही हैं। भारतीय रेलवे की 'जल रेलगाड़ी' करीब 5,50,000 लीटर पेयजल की सौगात लेकर मंगलवार को महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त जिले लातूर पहुंची। रेल मंत्री सुरेश प्रभु को मैं धन्यवाद कहना चाहूँगा, जिन्होंने पानी भेजने की यह पहल कई दिन पहले की थी। उनके गृह राज्य महाराष्ट्र के कई हिस्से विशेषकर लातूर जिले के गांव गंभीर जलसंकट से जूझ रहे हैं । प्रभु के दिशा-निर्देश के बाद पिछले दिनों 50 टैंक वैगन राजस्थान के कोटा वर्कशॉप भेजे गए थे, जहां उन्हें अच्छे से साफ किया गया और आगे की यात्रा के लिए सांगली भेज दिया गया। भारतीय रेलवे की लातूर के सूखाग्रस्त गांवों की प्यास बुझाने के लिए ऐसी और ट्रेनें भेजने की योजना है। इन्हें भेजे जाने का समय फिलहाल तय नहीं है।
वहीं सूखे से बेहाल महाराष्ट्र में आईपीएल मैच कराने को लेकर विवाद चरम पर है । बॉम्बे हाईकोर्ट में आईपीएल मैचों को दूसरे राज्य में शिफ्ट करने की पिटीशन पर सुनवाई चल रही है। उसमें कहा गया है कि आईपीएल के दौरान महाराष्ट्र के तीन स्टेडियम में करीब 60 लाख लीटर पानी यूज होगा। पीआईएल लगाने वाले के वकील का कहना है कि इंटरनेशनल मेंटेनेंस फॉर पिच गाइडलाइन्स के मुताबिक, एक मैच के लिए ग्राउंड मेंटेनेंस में करीब 3 लाख लीटर पानी लगता है। आईपीएल के 20 मैच महाराष्ट्र के तीन ग्राउंड पर होने हैं, जो कुल आईपीएल मैचों का एक-तिहाई है। इनमें 8 मैच मुंबई में, 9 मैच पुणे में और 3 मैच नागपुर में होंगे। इस तरह 20 मैचों के दौरान पिच मेंटेनेंस पर करीब 60 लाख लीटर पानी यूज किया जाएगा।
लेकिन मेरा मानना है कि कुछ टैंक भेजने से या आईपीएल मैचों को शिफ्ट करने से प्रॉब्लम खत्म नहीं होगी। यह एक बेहद गंभीर मुद्दा है, इस पर संवेदनशील होकर विचारने की आवश्यकता है । इसके बारे में दूसरे तरीके से सोचने की जरूरत है। आईपीएल शिफ्ट करने से मामला सुलझ जायेगा या समस्या खत्म हो जायेगी यह सब बातें सिर्फ सुनने-कहने में अच्छी लगती हैं । जबकि वास्तविकता यह है कि समस्या से निपटने के लिए बड़े रूप से योजना बनाने की आवश्यकता है।
सोचना होगा कि जिन इलाकों में सूखा है वहां स्थाई रूप से हमेशा के लिए किस तरह पानी भेजा जाएं । क्योंकि महाराष्ट्र में सूखे की समस्या आजकल या एक-दो सप्ताह की नही है बल्कि यह लगातार चार वर्षों से बनी हुई है । इसलिए बृहद रूप से पानी उपलब्ध कराने की योजना तैयार की जानी चाहिए । अगर हमारी सरकार पूर्व में ही सूखे को लेकर संवेदनशील होकर कार्य करती तो हो सकता है, यह नौबत नही आती ।
वैसे जल संकट की स्थिति से महाराष्ट्र ही नही बल्कि मध्यप्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना समेत 10 राज्य सूखे की चपेट में हैं । इन राज्यों में भी सूखे से हालात इतने बदतर हो गए हैं कि लोग पीने के पानी तक को तरस गए हैं और अब पलायन करने को मजबूर हैं । यूपी और मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड में बंदूकों के सहारे पानी की निगरानी की जा रही है। जिन क्षेत्रों में जल संकट गहराया हुआ है, वहां के लोगों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है,  जीना मुश्किल हो गया है । इसलिए केंद्र तथा सभी राज्य सरकारें राज्यों के उन क्षेत्रों को चिन्हित करें जहां जल संकट गहराया हुआ है और वहां के रहवासियों को पानी उपलब्ध कराकर हर सम्भव मदद करें । सिर्फ सरकार ही नही बल्कि प्रशासन तन्त्र, सभी राजनैतिक दल तथा सभी तरह के संगठन और समाज के हर व्यक्ति को आज इस दिशा में सहयोग करने की जरूरत है । जिस क्षेत्र में पानी की उपलब्धता है उस क्षेत्र से पानी एकत्रित कर पानी पहुंचाया जाये और इसके लिए शासन, प्रशासन, समाज तथा सामाजिक संगठन सभी मिलकर गंभीरता से संवेदनशील होकर काम करें, जल संकट से जूझ रहे लोगों की मदद करना सभी देशवासियों की जिम्मेदारी है । क्योंकि जल बिना जीवन सम्भव नही है । जल ही तो जीवन है । इंसान बिना भोजन के रह सकता है लेकिन बिना पानी के जीवित रह पाना मुश्किल है । इसलिए हर व्यक्ति, जल संकट से जूझ रहे लोगों तक पानी पहुंचाने में अपना योगदान अवश्य दें, यह सिर्फ सरकार का काम नही है, बल्कि यह हम सब का कार्य है, यह संवेदना से जुड़ा कार्य है, इंसानियत से जुड़ा कार्य है, मानवता से जुड़ा कार्य है ।

सत्यम सिंह बघेल

Wednesday, March 30, 2016

मुझे चलते ही जाना है


मुश्किलों का पड़ाव है,
उमंगों का ठहराव है,
मैं चलूँ कैसे,
रुका हुआ हूँ,
ठहरा हुआ हूँ ।

मैं ठहर भी नहीं सकता,
पैरों में छाले हैं,
रास्ते पथरीले हैं,
कहीं काटें तो
कहीं दल-दल है ।

कहीं गहरी खाई तो
कहीं रपटीली चढ़ाई है,
पथ से होकर गुजरना है,
लक्ष्य के शिखर तक
पहुंचना है ।

हाथों में दीया है,
तूफानों का डेरा है,
मंजिल करीब है,
रात ढलने को है,
सूरज निकलने को है ।

इसलिए अब मैं,
टूट नहीं सकता,
झुक नहीं सकता,
कामयाबी के अंबर
चुमते जाना है,
कितनी ही तपती
रेत मिले
मुझे चलना है,
चलते ही जाना है ।

लेखक - सत्यम सिंह बघेल

Tuesday, March 8, 2016

महिला शक्ति खुद को पहचानो

 वर्ष की तरह इस वर्ष भी विश्व महिला दिवस पर शुभकामनाएं, जगह-जगह समारोह, बयानबाजी, बड़े-बड़े संकल्प व वादे और फिर स्थिति जस की तस। शक्ति स्वरूपा नारी शक्ति आखिर कब तक महज विचार-विमर्श की विषय-वस्तु बनकर रहेंगी, कब उपेक्षित होती रहेंगी, कब तक अपनी प्रतिभा की तिलांजलि देती रहेंगी, कब तक अपने हुनर के पर काटती रहेंगी, कब तक अपनी बौद्धिकता का हनन होते हुए देखेंगी, आखिर कब तक । क्यों खुद महिलाओं का ध्यान इस ओर क्यों नहीं जाता कि समस्याएं उनकी हैं, चुनौतियां उनकी हैं, बात उनके अस्तित्व की है तो फिर पुरुष वर्ग कौन होते हैं उनको सशक्त बनाने वाले? आखिर महिलाएं क्यों खुद को कमजोर मानकर चार दीवारी के अंदर कैद होकर रह जाती हैं? क्यों अपने अधिकारों का हनन होने देती हैं? क्यों खुद अपनी दिशा-दशा तय नही कर पाती आखिर क्यों ? नारी शक्ति शक्तिशाली होते हुए क्यो खुद को असहाय महसूस करती हैं, क्यों अपनी प्रतिभा की पहचान नही पाती है ? आखिर क्यों ?  वाकई में यह विषय विचार-मंथन का विषय है मुख्यरूप से महिलाओं के लिए। 'मेरे हिसाब से महिला सशक्तिकरण को लेकर सोच बदलने की जरूरत है। आप उसे सशक्त बनाते हैं, जो कमजोर है। जिनके पास क्षमता है शक्ति है, उसे सशक्तिकरण की जरूरत नहीं। दुनिया की आधी आबादी के रूप मे मानी जाने वाली नारी शक्ति के प्रति सहयोगात्मक व्यवहार न अपनाते हुए उसे अधिकारों से वंचित रखने, उसे शोषित करने उसकी प्रतिभा को चार दिवारी के अंदर कैद करने, उसे खुद को कमजोर महसूस कराने में, हमेशा कम आंकने में कहीं ना कहीं पुरुष वर्ग ही जिम्मेदार है।
समाज में दोनों वर्गों का समान स्थान है, किन्तु
पुरुष वर्ग अब तक  महिलाओं के साथ असमानता का व्यवहार करता रहा और उनके अस्तित्व को कुचलता रहा है । उसे हमेशा कमजोर बनाता रहा और असहाय बताता रहा ।
ऐसा भी नहीं है कि स्थितियों में सुधार नहीं हुआ है, लेकिन समाज में एक तबके की महिलाओं की स्थिति अभी भी वैसी की वैसी ही बनी हुई है, आज हम देखते हैं कि शहर रहने वाली और गावों में रहने वाली महिलाओं के बीच, उनके अधिकारों, उनके कर्तव्यों को लेकर व्यापक अंतर है । समय आ गया है इस अंतर को समाप्त करने के लिए पुरुष, परिवार, समाज, सरकार के साथ-साथ खुद महिलाओं को निडर होकर आगे आने कि और साथ ही नारी शक्ति को अपनी प्रतिभा का परिचय देने की आवश्यकता है ।
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्यप्रदेश

Wednesday, February 24, 2016

समाज में व्याप्त कुरीतियों

पहले का समाज अत्यधिक कुरूतियों की जंजीरों सेजकड़ा हुआ था, उस समय समाज में काफी कुरुतियाँ प्रचलित थी, जैसे कन्या वध, औरतों एवं लड़कियों की क्रय-विक्रय की प्रथा, वेश्यावृत्ति, बाल-विवाह, पुत्री के जन्म को अशुभ मानना, पर्दा प्रथा, जौहर या सती प्रथा इत्यादि | बहुत से विद्वानों ने इन प्रथाओं को पाप तथा आत्महत्या की संज्ञा देते हुए इसका विरोध किया | दूसरी तरफ राजा राममोहन राय के प्रयासों से बैन्टिक ने एक कठोर कानून बनाकर सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया, जिसके कारण साथ-साथ कई कुरुतियों का अन्त हुआ | उस समय समाज का दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण तथा अवैज्ञानिक था, उस समय समाज भाग्यवादिता एवं कुसंस्कारों के प्रभाव से ग्रसित था और उनमें तार्किक क्षमता की अत्यंत कमी थी | इसी कारण से समाज में भयानक गंभीर कुरुतियाँ फैली हुई थीं, कन्या बद्ध, औरतों एवं लड़कियों की क्रय-विक्रय की प्रथा, वेश्यावृत्ति, बाल-विवाह, पुत्री के जन्म को अशुभ मानना, पर्दा प्रथा, सती प्रथा जैस भयावह कुरूतियों के साथ-साथ समाज और भी अनेक कुरूतियों से जकड़ा हुआ था | उस समय समाज में छुआछूत की भावनाओं ने मजबूती से अपनी जड़ें जमाई हुई थी समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग का पूर्ण रूप से अनादर कर रहा था | जब कि यह प्रथा समाज के लिए अत्यंत गंभीर समस्या थी । लोग यह समझते थे कि जाति व्यवस्था ईश्वर की देन है। उन्हें यह नहीं पता था कि यह कुछ स्वार्थों का पोषण करने वाली एक सामाजिक व्यवस्था है। अब मनुष्य की महत्ता का आधार कर्म के स्थान पर जन्म बना हुआ था | ऊँच-नीच की एक गहरी खाई बनी हुई थी जो ऊँची जाति में जन्म लेता उसका समाज में आदर, सत्कार होता था, वह सम्मानीय व्यक्ति माना जाता था, भले ही उसके कर्म कितने ही बुरे क्यों न हों और जो व्यक्ति नीची जाति में जन्म लेता था, भले ही उसके कर्म आदर्शमय हों उसे हर जगह उलाहना ही मिलती थी | उस समय, वेश्यावृत्ति, अंधविश्वास, समाज के परम्परागत नियम-कायदे जैसी कई सामाजिक कुरुतियाँ समाज में फैली हुई थीं | स्त्री को सिर्फ उपभोग की वस्तु ही माना जाता था | ऐसी और भी अनेक कुप्रथाएं समाज में फैली हुई थीं लेकिन आधुनिक शिक्षा के सम्पर्क से लोगों के दृष्टिकोण का विकास हुआ और वे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के नवीन प्रकाश की ओर तीव्र गति से बढ़े एवं जागरूक हुए। भारतीय समाज जैसे-जैसे शिक्षित होता गया इन कुप्रथाओं का विरोध करता गया और साथ ही इन कुप्रथाओं से समाज को मुक्त करता गया | जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ आधुनिकता का जैसे ही समाज को ज्ञान हुआ वैसे ही समाज में छुआछूत की भावना कम हो गई। लोग यह समझ गये कि जाति व्यवस्था ईश्वर की देन नहीं है। अपितु कुछ स्वार्थों का पोषण करने वाली एक सामाजिक व्यवस्था है। अब मनुष्य की महत्ता का आधार जन्म के स्थान पर कर्म बन गया इस प्रकार शिक्षा एवं समाज की जागरूकता ने निम्न जातियों को अपनी सामाजिक स्थितियों को ऊँचा उठाने के लिए प्रेरित किया और जीवन के प्रति नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया। अस्पृश्यता, बहुपत्नी प्रथा, देवदासी प्रथा एवं मृत्यु भोज आदि सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित हुआ एवं इनके दुष्परिणाम से समाज अवगत हुआ । परिणामस्वरुप देश के विभिन्न भागों में अनेक धार्मिक एवं समाज सुधार आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ। इन समाज सुधारकों एवं इनके आंदोलनों ने स्त्रियों की दशा सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया | साथ स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होने की प्रेरणा दी | समाज सुधारकों ने स्त्री-पुरुष समानता पर बल दिया और स्त्रियों को घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर कार्य करने की स्वतंत्रता का समर्थन किया। यही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश का भारतीय समाज को प्रोत्साहन दिया। यहीं से भारतीय समाज में आर्य समाज, ब्रह्मसमाज एवं रामकृष्ण मिशन आदि आन्दोलनों का उदय हुआ। साथ ही इन आंदोलनों एवं आधूनिक शिक्षा के कारण समाज जागरूक हुआ और समाज ने बाल-विवाह एवं बहु-विवाह पर प्रतिबन्ध लगाने पर बल दिया तथा विधवा विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया। लोगों के खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं व्यवहार के अन्य प्रतिमान प्रभावित हुए | समाज में अछूतों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में रहने वाले लोग उनके साथ छुआछूत का व्यवहार करते थे। आधुनिक शिक्षा एवं समाज की जागरूकता ने समाज में समानता का स्थान दिलवाया। कुप्रथाएं मिटाने एवं समाज में जागरूकता लाने के लिए न जाने कितने आन्दोलन हुए और न जाने कितने आन्दोलनकारियों ने समाज सुधारकों ने इस कुप्रथा को मिटाने की लड़ाई लड़ी और वे बहुत हद तक सफल भी हुए | किन्तु आज भी समाज में किसी घातक बीमारी की तरह ये कुप्रथायें फैली हुई हैं और समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं, समय बदल गया लेकिन कुछ कुरुतियां वैसी की वैसी ही बनी हुई हैं लेकिन अब समय आ गया है इन कुरूतियों को समाज से उखाड़ फेकने का । हम हर दिन इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में फैली कुरुतियां उसके दुष्प्रभाव और उसे समाज से उखाड़ फेकने के बारे में चर्चा करेंगे ।
लेखक-सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश 

Tuesday, February 23, 2016

जीएसटी लागू होने से होगा आमजन को फायदा

आजकल एक शब्द कानों में खूब गूँज रहा है  GST बिल | GST अथार्त् गुड्स एन्ड सर्विसेस टैक्स जिसे हम वस्तु एवं सेवा कर बिल भी कह सकते हैं | यह बिल स्टेंडिंग कमेटी से पास हो गया और  लोकसभा से भी पास हो गया परंतु राज्यसभा में हंगामें के कारण अटका पड़ा है | वैसे यह बिल कांग्रेस के शासन काल में ही लागू होना था | 2006-07 के आम बजट में  वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सरकार 1 अप्रैल 2010 से जीएसटी लागू करेगी लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है, अभी भी रुका हुआ है | जो कांग्रेस सत्ता पक्ष में रहते हुये जीएसटी बिल लागू करना चाह रही थी और भाजपा उसका विरोध कर रही थी अब वही कांग्रेस विपक्ष में आने के बाद बिल का विरोध कर रही है और अब भाजपा बिल लाना चाहती है | यह देश का दुर्भाग्य है कि हमारे राजनेता भूल जाते हैं कि संसद काम करने के लिए है और वे जनता की समस्याओं के निवारण करने के लिए हैं, लेकिन हमारे देश के जन सेवक कुर्सी पर बैठकर सिर्फ अपनी निजी राजनैतिक रोटियां सेकने में लगे रहते हैं | बहुत दुःख होता राजनेताओं की इस तरह की अनैतिक कार्यशीलता देखकर |
मानसून सत्र के दौरान सदन में वित्त मंत्री ने जैसे ही बिल पेश किया पेश किया तृणमूल, वाम मोर्चा, और एनसीपी ने वाकआउट कर दिया वहीं अन्नाद्रमुक ने अपना विरोध जताया और यही नजारा पिछले मानसून सत्र में देखने को मिला | इस तरह हंगामें के चलते मोदी सरकार ने बिल को लोकसभा से तो पारित करा लिया लेकिन राज्यसभा में अटक गया | सरकार इस बिल को अब तक का सबसे बड़ा टेक्स रिफार्मर बता रही है | भारत में सरकार के संघीय ढांचे होने के कारण जीएसटी बिल का स्वरूप दोहरा होगा, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्य के जीएसटी शामिल होंगे। यह बिल देश भर में अलग-अलग टेक्स प्रणाली को ख़त्म कर एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए है |
सरकार ने इस टैक्स पर अप्रैल 2016 से अमल करने का लक्ष्य रखा है । कई अर्थशास्त्रियों ने इसके लागू होने के बाद GDP ग्रोथ एक साल में 2-3 प्रतिशत बढ़ने की पूरी-पूरी उम्मीद जताई है | यह बिल देश की अर्थव्यवस्था की दिशा में क्रान्तिकारी कदम साबित हो सकता है | अगर वस्तु एवं सेवा कर लागू हो गया तो, सेंट्रल सेल्स टैक्स, एक्साइज़, लग्जरी टैक्स, एंटरटेनमेंट टैक्स, चुंगी, वैट जैसे सभी कर समाप्त  हो जाएंगे । इससे पूरे देश में एक उत्पाद लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा |अभी तक कोई भी सामान खरीदने पर 30-35 टैक्स के रूप में दिया जाता है । जीएसटी लागू होने के बाद  टैक्स घटकर 20% तक आ जायेंगे। कुछ विरोध करने वाले राज्यों का कहना है कि हमें 27% से अधिक जीएसटी दिया जाये | लेकिन केंद्र का कहना है कि 20% से अधिक दर तय की गई तो उत्पाद और सेवायें महंगी हो जाएंगी । लेकिन अब केंद्र के मनाने पर 20% तक के लिए सभी राज्य राजी हो गए हैं । जैसे यदि जीएसटी 20% तय होता है तो केंद्र और राज्य को Tax Revanue(टेक्स रेवेन्यु) का 10-10% हिस्सा मिलेगा और बाकी के टैक्स से जनता को छूट मिलेगी |
कुछ राज्य पैट्रो उत्पाद को जीएसटी के अंतर्गत नहीं रखना चाहते, इसलिए वे बिल का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनको एक-तिहाई टैक्स प्राप्ति केवल पेट्रोल-डीजल से होती है | परंतु मोदी सरकार ने GST के अंतर्गत टैक्स प्राप्ति में हानि होने वाले राज्यों को केंद्र की ओर से पाँच वर्ष तक, पहले वर्ष में 100%, दूसरे वर्ष में 75% और तीसरे से पांचवें वर्ष तक 50% की क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया है । इसके बाद अब तमिलनाडु और एक दो राज्यों को छोड़कर शेष सभी राज्यों से सहमति भी हो गई है |
अलग-अलग प्रणाली को बंद कर देश भर में एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए ही जीएसटी बिल का प्रारूप तैयार किया गया है | अभी तक सभी राज्यों में अलग-अलग स्थानीय  टैक्स लगाया जाता है, जिससे विभिन्न राज्य में एक ही वस्तु का अलग-अलग मूल्य होता है,  जैसे मोटर वाहन और डीजल  का मूल्य हर राज्य में अलग-अलग होता है । कई सामानों की कीमत सभी राज्यों में अलग अलग होती है । परंतु जीएसटी लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा । प्रत्येक उत्पाद पर लगने वाले टैक्स में केंद्र और राज्यों को बराबर भाग मिलेगा । इससे पूरे देश में एक प्रोडक्ट लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा और पहले से कम कीमत पर मिलेगा | इस तरह जीएसटी बिल के पास हो जाने से आमजनता का भला होगा और देश की आर्थिक दिशा में क्रांतिकारी कदम होंगे, परन्तु यह बिल निजी सिआसी जंग की भेंट चढ़ा है |
लेकिन अब सरकार द्वारा जीएसटी बिल को प्रमुखता से लागू करना चाहिये और सभी राजनैतिक दलों को भी अपनी निजी राजनैतिक सिआसत छोड़कर देश के लिए और आमजन की भलाई के लिए बिल का समर्थन करना चाहिए | जिससे जानता की भलाई हो सके, देश की आर्थिक गति तेजी से बड़े, अर्थव्यवस्था मजबूत हो, जनता की जेब में पैसा बचे, अधिक आय हो सके और जो राज्य वस्तु एवं सेवा में अधिक कर वसूलते हैं उन पर भी अंकुश लग सके | इसलिए मैं देश के सभी दलों और जनसेवकों से निवेदन करता हूँ कि वे अपनी सिआसी रोटियां सेकना छोड़े और देश के प्रति ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें |
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश

नारी शक्ति की लुटती अस्मिता : सभ्य समाज मौन

वर्तमान समय में हमारे देश में निरंतर बढ़ती बलात्कार की घटनायें आज समाज के लिए मुख्य रूप से चुनौती का विषय बन चुकी हैं, बलात्कार की निंदनीय घटनाओं पर पिछले कुछ बर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो आंकड़ों में बहुत ही निराशाजनक वृद्धि हुई है, जिसने ना सिर्फ हमारी सुरक्षा व्यवस्था बल्कि तमाम सामाजिक पहलुओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है | जिस नारी शक्ति को हमारे देश में देवी मानकर उसकी उपासना की जाती है, राक्षशी क्रूरता से भरे दरिन्दे उसी नारी शक्ति की अस्मिता को तार तार कर रहें हैं और हमारा सभ्य समाज सबकुछ मौन होकर देख रहा है | वर्तमान माहौल में मीडिया द्वारा इन घटनाओं को अपेक्षाकृत अधिक कवरेज तो मिलता है किन्तु फिर भी इन घटनाओं की मृत अथवा जीवित पीड़ितायेँ किसी भी सहायता व सहानुभूति से वंचित ही रह जाती हैं, देश के किसी भी शहरों में  हो या जहां भी घटनाएँ हुईं, पीड़ित लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ते नहीं दिखते | सभ्य कहे जाने वाले इस संस्कारित समाज में कुकृत्यता के खिलाफ आवाज उठना तो दूर की बात है यहाँ तो पड़ोसी भी पीड़ित परिवार के साथ पुलिस स्टेशन तक जाने की सहानुभूति नहीं दिखाता, क्या यह स्वार्थ के दीमक से संक्रमित हमारी कमजोर मानवता के खोखलेपन को नहीं उघेड़ता? क्या ऐसे में भारत को सभ्य कहा जा सकता है? आदर्शों व महान नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नींव पर विकसित हुए इस राष्ट्र में आज प्रत्येक 22वें मिनट किसी भेड़िये द्वारा एक विवश नारी की अस्मिता को तार तार किया जाता है | भारत में प्रतिदिन 60 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटानाओं को अंजाम दिये जाने की बात सामने आती है | हम देखें तो आज नैतिक मूल्यों को खोते हुए भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें आकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहाँ 1971 में 2487 बलात्कार की घटनायें घटी वहीं 2011 में ये अमानवीय  घटनायें बढ़कर 24206 हुई इस तरह 873.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वही एक अन्य आंकड़े में ऐसा बताया गया है कि भारत में बलात्कार के ग्राफ में 30 प्रतिशत की रफ़्तार से प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है जो कि देश की अस्मिता को शर्मसार करने वाला आंकड़ा है | सन 2010 की अपेक्षा सन 2011 में लगभग बलात्कार के दो हजार मामले ज्यादा सामने आये और उसके बाद एक अनुमान के मुताबिक़ सन 2012, 2013, 2014 में भी इसी अनुपात में बलात्कार की अमानवीय दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ है |ये तो वो आकडे हैं जो पीड़ित द्वारा पुलिस में शिकायत की जाती है, सोचिए ये आंकड़े इससे भी कही ज्यादा होंगे क्योंकि अभी भी 80% स्त्रियाँ लोकलाज, गरीब, असहाय या अशिक्षित होने के कारण थाने तक पहुँच ही नहीं पाती हैं। हम देखें तो आज नैतिक मूल्यों को खोते हुए भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें आकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहाँ 1971 में 2487 बलात्कार की घटनायें घटी वहीं 2011 में ये अमानवीय घटनायें बढ़कर 24206 हुई इस तरह 873.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
हर दिन अखबार, समाचार चैनल के माध्यम से सुनने-देखने को मिल रहा है कि आज यहाँ दरिन्दों ने नाबालिग की अस्मत लूटी कल वहां हैवानियत हुई, नित्य प्रति दिन दिल को दहला देनी वाली बलात्कार की घटनायें एवं निडर घूम रहे इन बदन पिपाशुओं पर नियंत्रण कैसे पाया जाये, ये सवाल आज भी ना सिर्फ प्रशासन बल्कि समूचे समाज के लिए चुनौती बना हुआ है | फिर हमारा समाज बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने की बजाए उस विवश पीड़िता को तमाशा बनाकर रख देता है, बड़े दुर्भाग्य की बात है कि वे दरिन्दे जो हैवानियत की सारी सीमा को पार कर जाते हैं, वे हमारे समाज में सिर उठाकर शान से जीते हैं और उसी सभ्यता से भरे संस्कारित समाज में एक विवश पीड़िता अपनी जिन्दगी ख़त्म करने पर मजबूर हो जाती है, दोयम दर्जे का व्यवहार करने वाला हमारा समाज उसे घ्रणा भरी निगाहों से देखने लगता है, उसे सामाजिक रूप से नकारा जाता है, उसे कदम-कदम पर ताना दिया जाता है, उसे जीने लायक नहीं छोड़ा जाता, कितनी शर्मिंदगी भरी बात है, बहुत दुःख होता है ये सब देखकर-सुनकर | कुछ माह पूर्व एक प्रमुख दल के मुखिया ने अपने बयान में कहा था चार लोग मिलकर एक लड़की का बलात्कार नहीं कर सकते, आखिर कैसे हमारे एक जन प्रतिनिधि इतना घटिया बयान दे सकते हैं, क्या उन्होंने नहीं सुना है, देश में कितने निंदनीय और दर्दनाक बलात्कार की दुर्घटनाएं हो रही हैं, एक उच्चपद में आसीन व्यक्ति जब ऐसे घटिया बयान देगा तो स्वाभाविक है समाज में बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगने की बजाए विकृत मानसिकता को और ज्यादा बल मिलेगा | वहीँ समाज बलात्कार की घटनाओं को लेकर प्रायः दो प्रकार के वैचारिक वर्ग सक्रिय हो जाते हैं- एक तो वे जो महिलाओं पर ही अंकुश लगाने की बात करते हैं और दूसरे वे जो आधुनिकता की आड़ में हर घटना का ठीकरा भारतीय सामाजिक संरचना पर फोड़ने का प्रयास करते हुए पश्चिम के और अधिक उन्मुक्त अनुसरण की वकालत शुरू कर देते हैं । कुछ लोग महिलाओं के छोटे कपड़े पहने को बलात्कार की वजह बताने लगते हैं तो कुछ लोग देर रात तक लड़की के बाहर रहने की वजह बताने लगते हैं और ऐसे ही कई तरह से अपने अपने वक्तव्य देने लगते हैं, लेकिन उस घटना को हम किस तरह परिभाषित करेंगे जब एक पिता द्वारा अपनी ही बेटी का शोषण किया जाता है या फिर एक 4 वर्ष 5 वर्ष की नाबालिक को इस दरिंदगी का शिकार बनाया जाता है | बलात्कार छोटे कपड़ों या महिलाओं की आजादी के कारण नहीं बल्कि विकृत मानसिकता का परिणाम है |
आज तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानकर इसे पूर्ण रूप से रोकने के लिए  हर संभव प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, इसके लिए भारतीय समाज के हर घटक को एक साथ संगठित होकर इसके खिलाफ मजबूती से खड़े होने की आवश्यकता है, महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुकी इस हैवानियत के विरुद्ध शासन, प्रशासन, समाज, कानून सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं | साथ ही तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ कठोर से कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है, आरोपी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे, साथ ही रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से बलात्कारी को नपुंसकता की स्थिति में लाने की प्रक्रिया को दंड प्रावधान में शामिल किया जाना चाहिए |
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्यप्रदेश