Monday, February 15, 2016

किसान की टूटती उम्मीदों पर मुस्कुराती राजनीति

इस वर्ष देश के अधिकांश भागों में बारिश कम होने और सूखा पड़ने के कारण देश के अन्नदाता कहे जाने वाले भारतीय किसान पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, वह अपनी बेहताशा आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है | किसान के लिए उसके खेत खलिहान और उसकी फसल ही उसके लिए उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके उम्मीदें सबकुछ होती हैं, लेकिन जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारण वश किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है उसकी उम्मीदें बिखर जाती हैं, सपने चूर चूर हो जाते हैं | वर्तमान समय में भी सूखा पड़ने के कारण देश के अन्नदाता के यही हाल बने हुए हैं | देश के अधिकांश भागों में सूखा पड़ने के कारण किसान की फसलें नष्ट हो चुकी हैं और किसान आत्महत्या करने पर विवश है और हमारे देश की राजनैतिक दल एवं सरकार उसकी विवशता पर उसे सहयोग देने उसका हौसला बढ़ाने की बजाये उसकी इस दशा पर अपनी राजनैतिक सियासत की गोटियाँ खेल रहे हैं, अभी हाल ही में राहुल गाँधी ने किसानों से मिलने के लिए पद यात्रा किये  | बड़ी आस लगाकर किसान उनसे मिलने पहुंचे कि हमें हमारी समस्या से निपटने के लिए, सूखे की मार से उभरने के लिए, बारिश की चपेट से बचने के लिए सुझाव दिए जायेंगे हमारी कुछ मदद की जाएगी | लेकिन यात्रा में ऐसा कुछ नहीं हुआ, वहां हुआ तो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और अपनी वोट बैंक की राजनीति बस, जो 65 वर्षों से हो रहा है | ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस को अचानक से किसानों की याद आने लगी, क्या इसलिए कि कांग्रेस का अस्तित्व अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है ? क्या कारण है कि कांग्रेस किसानों की हितेषी बन गई, उसे देश में हो रही नित्य प्रति किसानों की आत्महत्याएं दिखाई देने लगी, उनकी छिनती हुई जमीन याद आने लगी, उन पर अपार सहानुभूति बरसने लगी | किसानों की आत्महत्याएं तो कांग्रेस के शासनकाल में भी हुई हैं, कांग्रेस के समय में भी जमीन हड़पी गई हैं, तब कहाँ थी कांग्रेस की किसानों के प्रति सहानुभूति | राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं की थी। 2009 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 1172 की वृद्धि हुई थी, अत: 2009 के दौरान 17368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई। राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार 1994 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की हैं। किसानों के बुरे हाल और उनकी दयनीय दशा सिर्फ कांग्रेस के ही शासन काल में नहीं रही बल्कि जितने भी राजनैतिक दलों की सरकारें बनी सभी के शासनकाल में यह स्थिति रही है | सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रूक नहीं रहा है, देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहीं केवल यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 500 पहुँच गई है, इस क्षेत्र एन पिछले 10 वर्षों में 5000 लोग आत्महत्या कर चुकें | बुंदेलखंड के लोग घास की रोटी और घास की ही चटनी खाने को मजबूर हैं |
लेकिन किसानों की इस दुखदायी घड़ी में राजनैतिक दल उनका साथ देने और उनका सहयोग करने की बजाए, उनकी इस लाचारी एवं बेवसी पर राजनीति कर रहे हैं | वैसे ये कोई नयी बात नहीं है ये तो हमेशा से ही हो रहा है, देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों के साथ छल कपट कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हमेशा से ही होता चला आ रहा है, राजनैतिक पार्टियां सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति करती आयी हैं | हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह देश किसानों का देश है, इस देश के किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं | इन बातों को अख़बारों, किताबों में पढ़ते-पढ़ते और भाषणों, समाचार चेनलों में सुनते सुनते वर्षों बीत गये, कई पीढियां गुजर गई, फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है वह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है और राजनैतिक दल उसकी इस हालत पर राजनीति करने में लगे हुए हैं |
हमारे द्वारा ही चुनी गई सरकारें आज इतने संवेदनशून्य हो चुकी हैं कि उन्हें किसानों की मौत पर कोई फर्क नहीं पड़ता.| यही नहीं सरकारें किसानों की फसल खराब होने पर उन्हें मुआवजा राशि के रूप में 6₹, से लेकर 100₹ तक देती हैं. आख़िर ये जले पर नमक छिड़कना नहीं तो और क्या है ? किसान परिश्रम, बलिदान, त्याग और सेवा के आदर्श द्वारा देश का उपकार करता है,  प्रकृति का वह पुजारी तथा धरती मां का उपासक है। धन से गरीब होने पर भी वह मन का अमीर और उदार होता है। किसान अन्नदाता है, वह समाज का सच्चा हितैषी है। उसके सुख़ में ही देश का सुख़ है और उसकी समृद्धि में ही देश की समृद्धि है | लेकिन फिर भी देश राजनैतिक दल किसानों के साथ छल-कपट की राजनीति कर रहें है और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, बार-बार सिर्फ कोरे वादे करके अपना प्रचार प्रसार करते हैं बस और कुछ नहीं | आज हम देख रहे हैं किसानों की दशा क्या है यह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है और राजनैतिक दल उसकी इस हालत पर राजनीति करने में लगे हुए हैं |
किसी भी दल ने किसानों के लिए उचित कार्य जो करने चाहिए थे नहीं किया | तभी तो आज भी देश में कृषि शिक्षा के विश्वविध्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है। शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है। राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविध्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं। कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ | जिन फसलों को किसान बोना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक जलवायु, पानी, भूमि आदि कैसा होना चाहिए। इसका परीक्षण कर संबंधित किसानों को शिक्षित किये जाने की भी व्यवस्था कराई जानी चाहिए ताकि वह सुझावानुसार कार्य करने के लिए सहमत हो। इस हेतु अच्छी प्रजाति के बीजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, बीज की बुवाई के समय कृषि क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ अपनी देखरेख में बुवाई कराएं तथा उन पर होने वाली बीमारियों, आवश्यक उर्वरकों, सिंचाई, निकाई, निराई, गुड़ाई आदि का कार्य आवश्यकतानुसार समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों के निर्देशन में कराया जाना चाहिए, इससे उत्पादन बढ़ेगा एवं किसान समृद्ध होगा | किसान समृद्ध होगा तभी तो देश समृद्ध होगा |
स्वलिखित (कॉपी राइट)
लेखक - सत्यम सिंह बघेल

बच्चों को दें अच्छे संस्कार

भौतिक सुख-सुविधा पाने की होड़ और स्वालंबन बनने की ललक के कारण आज के समय में अक्सर परिवारों में बिखराव आ रहा है और इस कारण घरों में बच्चे उस प्यार से वंचित रह जाते हैं, जो प्यार उन्हें एक शांत वातावरण वाले परिवार में रहकर मिलना चाहिए, नही मिल पाता है । इसलिये बच्चे खुद को अकेला महसूस करने लगते हैं, उनमे तनाव एवम् अवसाद घर कर जाता है और फिर धीरे-धीरे उनके अंदर नकारात्मकता के भाव पैदा हो जाते हैं । अतः बचपन से ही तनाव एवम् अवसाद से ग्रसित बच्चों की आदत इस तरह नकारात्मकता से भर जाती है । ऐसे बच्चों का व्यवहार आगे चलकर इस तरह का बन जाता है कि उसे हर सही बात गलत लगने लगती हैं, ऐसे बच्चे हर बात पर अक्सर गलत फहमी के शिकार होते हैं । इसलिए यह आवश्यक है कि हम चाहे जैसे रहे जो भी करना चाहें लेकिन बच्चों को अनदेखा नही करना चाहिए । हमे बच्चों का ख्याल रखते हुए घर-परिवार का वातावरण शांत-सकारात्मक एवं संस्कारवान बनाकर रखना चाहिए ताकि बच्चे भी उसी वातावरण में ढल सकें, क्योंकि बच्चों को बचपन में जो संस्कार मिलते हैं, जिस वातावरण में वे रहते हैं वैसे ही उनके भाव होते हैं और आगे चलकर वही उनकी आदत होती है । क्योंकि बच्चों की बचपन में ही जो आदत बन जाती है उसे बाद में बदलना मुश्किल होता है , इसलिए बच्चों को अच्छे वातावरण में रखे, अच्छे संस्कार दें ।
स्वलिखित(कॉपी राइट)
लेखक - सत्यम सिंह बघेल

आत्महत्या पर जातिवाद अखंडता पर वार

भारतीय संस्कृति अपनी सभ्यता एवं एकता के दम पर 5000 वर्ष से अपना अस्तित्व बनाये हुये है, इसने सदैव असंतोष और मतभेद को स्वीकार किया है | हमारे देश में बहुत सी भाषाएं 1600 बोलियां और सात धर्म एक साथ अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। हमेशा से हमारे देश में सहिष्णुता होने के कारण ही अलग-अलग धर्म का जुड़ाव मजबूती से बना हुआ है । यही वजह है कि इतने वर्षों तक हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता का अस्तित्व बना हुआ है | यहाँ कोटि-कोटि जनता के मन में भारती की भौगोलिक एकता का गहरा संस्कार है। हमारी संस्कृति विविधताओं को स्वीकार करती है किन्तु एकत्व की प्राप्ति उसकी निजी विशेषता है। हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता इतनी मजबूत है कि यहाँ अनेक आक्रमण हुये व कई शासकों ने शासन किया इसके बाद भी हमारे देश ने विवधता में एकता की मिसाल कायम रखी | हमारा एक संविधान है जो अलग-अलग जाति-धर्म और भाषा-बोली को स्थान देता है | इसके बावजूद कुछ तथाकथित लोग अपने निजी स्वार्थ के चलते देश में विभिन्न जाति-धर्म को लेकर भेदभाव का कलंक थोपना चाहते हैं | भारत जैसा धर्मनिरपेक्ष देश दुनिया का कोई देश नही है, फिर भी आज अपने निजी स्वार्थ के चलते कुछ लोग अपनी निम्नस्तर की राजनीति को चमकाने के लिए एक युवा की आत्महत्या पर घडियाली आंसू बहा रहे हैं |
हैदराबाद विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की आत्महत्या पर जिस तरह देश के राजनैतिक दलों द्वारा स्वार्थहित की  राजनीति की जा रही है, बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और देश की एकता के लिए घातक है । दादरी कांड में जिस तरह से धर्मवाद की हवा देकर देश में अस्थिरता का माहौल पैदा किया गया था, उसी तरह इस मौत को भी जातिगत रंग देकर समाज के बीच द्वेष पैदा कर आपस में लड़वाने का काम किया जा रहा है । बिना पूरे मामले को जाने समझे तमाम राजनैतिक दलों द्वारा जिस तरह इस मौत पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने का प्रयास किया गया, उससे इन राजनैतिक दलों के बारे में यही बात स्पष्ट होती है कि इनको लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर सिर्फ अपनी राजनीति चमकानी ही आती है, भले ही किसी की लाश पर भी राजनीति करना पड़े तो भी पीछे नही हटेंगे | रोहित मामले में विरोध का झंडा थामे लोग केवल और केवल राजनीति ही कर रहे हैं | आत्महत्या करने वाले छात्र रोहित वेमुला ने अपने आखिरी पत्र में अपनी निजी जिन्दगी की थकावट और बिगड़ी मानसिक स्थिति को आत्महत्या का जिम्मेदार ठहराया है | पत्र में कहीं भी उसने न तो किसी सरकार का जिक्र किया, न ही किसी दल को जिम्मेदार ठहराया और न ही किसी व्यक्ति विशेष को | जातिवाद तथा स्वार्थ की राजनीति करने वाले राजनैतिक दलों को एक होनहार युवा की आत्महत्या में कहां से दलित उत्पीडऩ नजर आने लगा, यह तो वही बता सकते हैं लेकिन जिस तरह मौत को दलित अगड़े तथा पिछड़ो में बांटकर राजनीति की जा रही है वह देश की एकता के लिए खतरनाक है |
कोई व्यक्ति जब अपनी निजी जिन्दगी से मायूस हो जाता है तब वह किसी न किसी कारण से आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाता है |  इसी कमी के चलते देशभर में न जानें कितने लोग अपनी निजी जिन्दगी से मायूस होकर अपने जीवन को समाप्त कर देते हैं | आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में एक साल में लगभग 1 लाख से अधिक लोग आत्महत्या करते हैं, एक सरकारी रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले एक दशक में आत्महत्या की घटनाओं में 21.6 फीसदी का इजाफा हुआ है | वर्ष 2003 में जहां एक लाख 10 हजार 851 लोगों ने आत्महत्या की थी, वहीं 2013 में आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़कर एक लाख 34 हजार 799 पहुंच गई और फिर वर्ष 2014 में यह संख्या बढ़कर 1 लाख 36 हजार 666 से अधिक हो गई, इस वर्ष इनमें 2403 छात्र थे, यानी हर महीने 200 से अधिक छात्र आत्महत्या करते हैं। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार इस एक साल में 5650 किसानों और 20 हजार से ज्यादा घरेलू महिलाओं ने खुदकुशी की है, वहीं 1995 और 2014 के बीच भारत में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या ने तीन लाख का आंकड़ा पार कर लिया। देश में हर 4 मिनट में कोई एक व्यक्ति अपनी जान दे देता है और ऐसा करने वाले तीन लोगों में से एक युवा होता है यानी देश में हर 12 मिनट में 30 वर्ष से कम आयु का एक युवा अपनी जान ले लेता है। एक युवा ने अपनी जिन्दगी से थककर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली तो दिशाहीन एवं स्वार्थ की राजनीति करने वाले नेता उसकी आत्महत्या पर राजनीति कर छाती पीटने लगे, देशभर की मीडिया सवाल खड़े करने लगी | लेकिन उनका क्या जो लाखों लोग आत्महत्या करते हैं, क्या वे इंसान नही है, क्या वे नागरिक नहीं है | जरा गौर करें आत्महत्या की इन तमाम खबरों को अगर रोहित जितना ही कवरेज मिलता तो भारत आज एक आत्महत्या प्रधान देश बन जाता। ये सभी आत्महत्याएं क्या कम हैं या सिर्फ छोटी-मोटी घटनायें हैं, जो कि इन जातिवाद के नाम पर देश को बाटने वाले नेताओं को यह सब होते हुये भी इतने वर्षों से नजर नहीं आया, और अब क्या हुआ कि अचानक देश में रोहित की खुदकुशी पर जातिवाद नजर आने लगा | देश में हर वर्ष लाखों लोग आत्महत्या कर रहें हैं, तो फिर जातिवाद और अगड़े-पिछड़े के नाम आवाज बुलंद करने वाले तथाकथित नेता इतने वर्षों से खामोश क्यों थे, उनकी संवेदनशीलता कहाँ थी, अचानक क्यों इनकी चेतना जागी | जातिवाद का हवाला देकर सरकार का विरोध करने वाले लोग खुद ही देश का माहौल ख़राब कर रहे हैं और देश का अपमान कर रहे हैं | जो लोग रोहित के मामले में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें केवल देश की सरकार को नीचा दिखाने की राजनीति करने में ही मजा आ रहा है | हमारा देश सर्व धर्म समभाव के सिद्धांत को अपनाता है और इसी पर आधारित है, लेकिन इस तरह के जातिवाद विरोध प्रदर्शन के चलते क्या हमारे देश में समभाव की कल्पना की जा सकती है। बिलकुल नहीं। जो लोग इस आत्महत्या पर जातिवाद को हवा दे रहे हैं, वे स्पष्ट रूप से  देश की अखंडता व एकता के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। जातिवाद के आधार पर देश विरोध बढ़ रहा है समाज जातिवाद के नाम पर बट रहा है, ऐसे मामले आग में घी डालने के समान हैं। यह देश के सुनहरे भविष्य और उन्नति के लिए घातक है ।

स्वलिखित (कॉपी राइट)
सत्यम सिंह बघेल

यूपी में यह कैसा समाजवाद

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरस्वती डेंटल कॉलेज से बीडीएस कर रही सेकेंड इयर की होनहार छात्रा ने अभी हाल ही में आत्महत्या कर ली | ख़बरों के अनुसार मेडिकल की होनहार छात्रा कई दिनों से एक मनचले की हरकतों से परेशान हो गई थी | उस मनचले ने छात्रा का जीना दूभर कर रखा था, आते जाते छात्रा को परेशान करना, उसकी कॉलेज वैन में धक्के मारना और लगातार धमकियों से परेशान करना सिरफिरे की दिनचर्या में शुमार हो चुका था, लेकिन हद तो तब हो गई जब छात्रा को तेजाब फेंककर जला देने की धमकी मिली। छात्रा इस धमकी से इतनी परेशान हो चुकी थी कि उसने खुदकुशी कर ली। लेकिन सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह यह कि छात्रा ने पुलिस और वूमेन पावर लाइन में अपनी शिकायत दर्ज की कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अगर उसकी इस शिकायत पर जरा भी सुनवाई हुई होती तो आज एक होनहार छात्रा ने सुसाइड ना किया होता। छात्रा ने लिखित शिकायत विकासनगर थाने में की थी, लेकिन एसओ विकासनगर ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके बाद करोड़ों रूपया खर्च कर बनी 1090 पर भी काल किया, लेकिन वहां से भी कोई मदद नहीं मिली। लखनऊ में डॉक्टर बेटी की आत्महत्या ने इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। अपने दो साल के प्रयोग के बाद 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया, ऐसा लगता है, मानो यह वूमेन पवार लाइन महिलाओं में विश्वास जगाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। राज्य में अधिकतर बढ़ रहीं एसी घटनायें उत्तर प्रदेश में महिला तथा छात्राओं को सुरक्षा देने का उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार के दावे को तार-तार कर रहीं हैं । लखनऊ में वूमेन पावरलाइन की कार्यप्रणाली को देखने के लिए भले ही देश के शीर्ष अभिनेता व अभिनेत्री आते हों और महिला सशक्तिकरण का सरकार लाख दावा करे, लेकिन यूपी में महिलाओं से रेप और छेड़छाड़ के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कुछ दिन पहले तीन लड़कियों का अपहरण कर फिरोती मांगना और अब ये मामला कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में महिलाएं पूर्ण रूप से सुरक्षित नही हैं ।
उत्तर प्रदेश में मायावती की बीएसपी के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाली एक युवा नेता, यानी अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार आई, तो लोगों को उनसे खासी उम्मीदें थी कि अब उत्तर प्रदेश की दिशा-दशा बदलेगी और प्रदेश शांति के रास्ते आगे बढ़ते हुए उन्नति के शिखर तक पहुंचेगा, लग रहा था कि अब उत्तर प्रदेश का माहौल बदलेगा, अब प्रदेश में शांति का वातारण बनेगा महिलाएं-छात्राएं सुरक्षित होंगी | लेकिन 'युवा' सीएम आम जन की उम्मीदों पर कितने खरे उतरे हैं, ये तो आम नागरिकों और महिलाओं के प्रति बढ़ते आकड़े अच्छी तरह बताते हैं। प्रदेश की दिशा-दशा सुधरने की बजाये और अधिक बद से बदतर होती जा रही है | देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इन दिनों अपराध का अड्डा बन गया है। एक नहीं सात प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में परिस्थितियां बेहद बदल गई हैं एवं बहुत ही नाजुक स्थिति बनी हुई है। यहां अपराध बेखौफ फल-फूल रहा है। बलात्कार, हत्या, लूट, सांप्रदायिक दंगे और महिलाओं के साथ होती अपराधिक वारदातें, उत्तर प्रदेश का एक दहशत से भर देने वाला चेहरा है। खास बात यह है कि नागरिकों के खिलाफ हो रहे अपराधों में न ही पुलिस का ध्यान जा रहा है न ही सरकार ध्यान दे रही है। प्रदेश में अखिलेश सरकार को तकरीबन चार साल होने जा रहे हैं, लेकिन लॉ एंड ऑर्डर की स्थित वही ढाक के तीन पात ही बनी हुई है। कमाल की बात यह है कि दिन व दिन बढ़ते अपराध पर भी, अपराध और भयमुक्त प्रदेश का दावा करने वाले प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव बड़ी शान से कहते हैं कि समाजवादी किसी के भी साथ अत्याचार होते हुए नहीं देख सकते हैं। अखिलेश के इस रुख से ऐसा लगता है कि मानों उन्होंने जमीन पर देखना ही छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश में नित्यप्रति बढ़ रहे आपराधिक मामलों में हत्या, बलात्कार, किडनैप जैसे संगीन अपराध शामिल हैं। यदि प्रदेश में अपराध की स्थिति पर एक नजर डालें तो, प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाएं सुरक्षित नहीं है।
आकड़ों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश की सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश महिलाओं के प्रति अपराध में अव्वल है। ब्यूरो के अनुसार साल 2014 में यूपी में महिलाओं पर अपराध में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है, महिलाओं के प्रति अपराध के 38 हजार 467 मामले दर्ज किये गये जो 2013 के मुकाबले 18 प्रतिशत ज्यादा थे। अपराध का यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की दयनीय हालात को भी दिखाता है। साल 2013 में महिलाओं के प्रति 32 हजार 546 मामले दर्ज किये गये थे जिसकी संख्या 2014 में 5921 ज्यादा थी। साथ ही सामूहिक दुष्कर्म मामले में भी उत्तर प्रदेश आगे है, साल 2014 में देशभर में 2300 गैंग रेप के मामले सामने आए, जिनमें से अकेले 570 मामले उत्तर प्रदेश के हैं तथा  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स बोर्ड (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में साल 2014 में 3,467 दुष्कर्म की घटनायें हुई | वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स बोर्ड (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक अपहरण जैसे अपराध में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, देश में होने वाले अपहरण की 60 प्रतिशत वारदात सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुई |
हालां‍कि विडंबना यह है कि यूपी की जनता के पास सपा का विकल्प बसपा के रूप में और बसपा का विकल्प सपा के रूप में ही रहा है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन का विकल्प उसके पास कभी नहीं रहा क्योंकि दोनों ही दलों ने कभी विकास-उन्नति पर ध्यान ही नही दिया सिर्फ जातिवाद-धर्मवाद के नाम पर ही राजनीति करते रहे हैं। हालां‍कि कुछ लोगों का मानना है कि सपा की तुलना में बीएसपी सरकार में लॉ एंड ऑर्डर बेहतर था, लेकिन मायावती सरकार भी पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी, इसलिए जनता ने उसे दोबारा मौका ही नहीं दिया। वहीं पिछले वर्ष पत्रकार की हत्या, एक महिला को जलाकर मार देने की घटना और सपा प्रमुख मुलायम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता पर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के धमकी के आरोप और उसका ऑडियो क्लिप सामने आने की घटना तथा अपराध में खुद किसी प्रदेश की सरकार का शामिल हो जाने की खबरें सामने आना किसी भी राज्य के लिए बेहद शर्मिंदगी की बात है।
वहीं राज्य में तीन लड़कियों का अपहरण और अब ये आत्महत्या की घटना प्रदेश की सपा सरकार पर कई सारे सवाल खड़े करती है ।

स्वलिखित (कॉपी राइट)
लेखक- सत्यम सिंह बघेल

यूपी मे यह कैसा समाजवाद

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के सरस्वती डेंटल कॉलेज से बीडीएस कर रही सेकेंड इयर की होनहार छात्रा ने अभी हाल ही में आत्महत्या कर ली | ख़बरों के अनुसार मेडिकल की होनहार छात्रा कई दिनों से एक मनचले की हरकतों से परेशान हो गई थी | उस मनचले ने छात्रा का जीना दूभर कर रखा था, आते जाते छात्रा को परेशान करना, उसकी कॉलेज वैन में धक्के मारना और लगातार धमकियों से परेशान करना सिरफिरे की दिनचर्या में शुमार हो चुका था, लेकिन हद तो तब हो गई जब छात्रा को तेजाब फेंककर जला देने की धमकी मिली। छात्रा इस धमकी से इतनी परेशान हो चुकी थी कि उसने खुदकुशी कर ली। लेकिन सबसे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह यह कि छात्रा ने पुलिस और वूमेन पावर लाइन में अपनी शिकायत दर्ज की कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। अगर उसकी इस शिकायत पर जरा भी सुनवाई हुई होती तो आज एक होनहार छात्रा ने सुसाइड ना किया होता। छात्रा ने लिखित शिकायत विकासनगर थाने में की थी, लेकिन एसओ विकासनगर ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसके बाद करोड़ों रूपया खर्च कर बनी 1090 पर भी काल किया, लेकिन वहां से भी कोई मदद नहीं मिली। लखनऊ में डॉक्टर बेटी की आत्महत्या ने इस पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है। अपने दो साल के प्रयोग के बाद 1090 का प्रयोग पूरी तरह असफल हो गया, ऐसा लगता है, मानो यह वूमेन पवार लाइन महिलाओं में विश्वास जगाने के बजाय अब किशोरियां-महिलाओं के सपनों में 1090 के दारुण-डरावने सपने दिखने लगे हैं। राज्य में अधिकतर बढ़ रहीं एसी घटनायें उत्तर प्रदेश में महिला तथा छात्राओं को सुरक्षा देने का उत्तर प्रदेश की राज्य सरकार के दावे को तार-तार कर रहीं हैं । लखनऊ में वूमेन पावरलाइन की कार्यप्रणाली को देखने के लिए भले ही देश के शीर्ष अभिनेता व अभिनेत्री आते हों और महिला सशक्तिकरण का सरकार लाख दावा करे, लेकिन यूपी में महिलाओं से रेप और छेड़छाड़ के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। कुछ दिन पहले तीन लड़कियों का अपहरण कर फिरोती मांगना और अब ये मामला कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में महिलाएं पूर्ण रूप से सुरक्षित नही हैं ।
उत्तर प्रदेश में मायावती की बीएसपी के नेतृत्व वाली सरकार के पतन के बाद समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाली एक युवा नेता, यानी अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा सरकार आई, तो लोगों को उनसे खासी उम्मीदें थी कि अब उत्तर प्रदेश की दिशा-दशा बदलेगी और प्रदेश शांति के रास्ते आगे बढ़ते हुए उन्नति के शिखर तक पहुंचेगा, लग रहा था कि अब उत्तर प्रदेश का माहौल बदलेगा, अब प्रदेश में शांति का वातारण बनेगा महिलाएं-छात्राएं सुरक्षित होंगी | लेकिन 'युवा' सीएम आम जन की उम्मीदों पर कितने खरे उतरे हैं, ये तो आम नागरिकों और महिलाओं के प्रति बढ़ते आकड़े अच्छी तरह बताते हैं। प्रदेश की दिशा-दशा सुधरने की बजाये और अधिक बद से बदतर होती जा रही है | देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश इन दिनों अपराध का अड्डा बन गया है। एक नहीं सात प्रधानमंत्री देने वाले उत्तर प्रदेश में परिस्थितियां बेहद बदल गई हैं एवं बहुत ही नाजुक स्थिति बनी हुई है। यहां अपराध बेखौफ फल-फूल रहा है। बलात्कार, हत्या, लूट, सांप्रदायिक दंगे और महिलाओं के साथ होती अपराधिक वारदातें, उत्तर प्रदेश का एक दहशत से भर देने वाला चेहरा है। खास बात यह है कि नागरिकों के खिलाफ हो रहे अपराधों में न ही पुलिस का ध्यान जा रहा है न ही सरकार ध्यान दे रही है। प्रदेश में अखिलेश सरकार को तकरीबन चार साल होने जा रहे हैं, लेकिन लॉ एंड ऑर्डर की स्थित वही ढाक के तीन पात ही बनी हुई है। कमाल की बात यह है कि दिन व दिन बढ़ते अपराध पर भी, अपराध और भयमुक्त प्रदेश का दावा करने वाले प्रदेश के मुखिया अखिलेश यादव बड़ी शान से कहते हैं कि समाजवादी किसी के भी साथ अत्याचार होते हुए नहीं देख सकते हैं। अखिलेश के इस रुख से ऐसा लगता है कि मानों उन्होंने जमीन पर देखना ही छोड़ दिया है। उत्तर प्रदेश में नित्यप्रति बढ़ रहे आपराधिक मामलों में हत्या, बलात्कार, किडनैप जैसे संगीन अपराध शामिल हैं। यदि प्रदेश में अपराध की स्थिति पर एक नजर डालें तो, प्रदेश में सबसे ज्यादा महिलाएं सुरक्षित नहीं है।
आकड़ों पर नजर डालें तो राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश की सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य उत्तर प्रदेश महिलाओं के प्रति अपराध में अव्वल है। ब्यूरो के अनुसार साल 2014 में यूपी में महिलाओं पर अपराध में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई है, महिलाओं के प्रति अपराध के 38 हजार 467 मामले दर्ज किये गये जो 2013 के मुकाबले 18 प्रतिशत ज्यादा थे। अपराध का यह आंकड़ा उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था की दयनीय हालात को भी दिखाता है। साल 2013 में महिलाओं के प्रति 32 हजार 546 मामले दर्ज किये गये थे जिसकी संख्या 2014 में 5921 ज्यादा थी। साथ ही सामूहिक दुष्कर्म मामले में भी उत्तर प्रदेश आगे है, साल 2014 में देशभर में 2300 गैंग रेप के मामले सामने आए, जिनमें से अकेले 570 मामले उत्तर प्रदेश के हैं तथा  नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स बोर्ड (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश में साल 2014 में 3,467 दुष्कर्म की घटनायें हुई | वहीं नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स बोर्ड (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक अपहरण जैसे अपराध में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है, देश में होने वाले अपहरण की 60 प्रतिशत वारदात सिर्फ उत्तर प्रदेश में हुई |
हालां‍कि विडंबना यह है कि यूपी की जनता के पास सपा का विकल्प बसपा के रूप में और बसपा का विकल्प सपा के रूप में ही रहा है, लेकिन व्यवस्था परिवर्तन का विकल्प उसके पास कभी नहीं रहा क्योंकि दोनों ही दलों ने कभी विकास-उन्नति पर ध्यान ही नही दिया सिर्फ जातिवाद-धर्मवाद के नाम पर ही राजनीति करते रहे हैं। हालां‍कि कुछ लोगों का मानना है कि सपा की तुलना में बीएसपी सरकार में लॉ एंड ऑर्डर बेहतर था, लेकिन मायावती सरकार भी पूरी तरह भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी, इसलिए जनता ने उसे दोबारा मौका ही नहीं दिया। वहीं पिछले वर्ष पत्रकार की हत्या, एक महिला को जलाकर मार देने की घटना और सपा प्रमुख मुलायम सिंह जैसे वरिष्ठ नेता पर आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के धमकी के आरोप और उसका ऑडियो क्लिप सामने आने की घटना तथा अपराध में खुद किसी प्रदेश की सरकार का शामिल हो जाने की खबरें सामने आना किसी भी राज्य के लिए बेहद शर्मिंदगी की बात है।
वहीं राज्य में तीन लड़कियों का अपहरण और अब ये आत्महत्या की घटना प्रदेश की सपा सरकार पर कई सारे सवाल खड़े करती है ।
स्वलिखित(कॉपी राइट)
लेखक - सत्यम सिंह बघेल