Wednesday, February 24, 2016

समाज में व्याप्त कुरीतियों

पहले का समाज अत्यधिक कुरूतियों की जंजीरों सेजकड़ा हुआ था, उस समय समाज में काफी कुरुतियाँ प्रचलित थी, जैसे कन्या वध, औरतों एवं लड़कियों की क्रय-विक्रय की प्रथा, वेश्यावृत्ति, बाल-विवाह, पुत्री के जन्म को अशुभ मानना, पर्दा प्रथा, जौहर या सती प्रथा इत्यादि | बहुत से विद्वानों ने इन प्रथाओं को पाप तथा आत्महत्या की संज्ञा देते हुए इसका विरोध किया | दूसरी तरफ राजा राममोहन राय के प्रयासों से बैन्टिक ने एक कठोर कानून बनाकर सती प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर दिया, जिसके कारण साथ-साथ कई कुरुतियों का अन्त हुआ | उस समय समाज का दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण तथा अवैज्ञानिक था, उस समय समाज भाग्यवादिता एवं कुसंस्कारों के प्रभाव से ग्रसित था और उनमें तार्किक क्षमता की अत्यंत कमी थी | इसी कारण से समाज में भयानक गंभीर कुरुतियाँ फैली हुई थीं, कन्या बद्ध, औरतों एवं लड़कियों की क्रय-विक्रय की प्रथा, वेश्यावृत्ति, बाल-विवाह, पुत्री के जन्म को अशुभ मानना, पर्दा प्रथा, सती प्रथा जैस भयावह कुरूतियों के साथ-साथ समाज और भी अनेक कुरूतियों से जकड़ा हुआ था | उस समय समाज में छुआछूत की भावनाओं ने मजबूती से अपनी जड़ें जमाई हुई थी समाज का एक वर्ग दूसरे वर्ग का पूर्ण रूप से अनादर कर रहा था | जब कि यह प्रथा समाज के लिए अत्यंत गंभीर समस्या थी । लोग यह समझते थे कि जाति व्यवस्था ईश्वर की देन है। उन्हें यह नहीं पता था कि यह कुछ स्वार्थों का पोषण करने वाली एक सामाजिक व्यवस्था है। अब मनुष्य की महत्ता का आधार कर्म के स्थान पर जन्म बना हुआ था | ऊँच-नीच की एक गहरी खाई बनी हुई थी जो ऊँची जाति में जन्म लेता उसका समाज में आदर, सत्कार होता था, वह सम्मानीय व्यक्ति माना जाता था, भले ही उसके कर्म कितने ही बुरे क्यों न हों और जो व्यक्ति नीची जाति में जन्म लेता था, भले ही उसके कर्म आदर्शमय हों उसे हर जगह उलाहना ही मिलती थी | उस समय, वेश्यावृत्ति, अंधविश्वास, समाज के परम्परागत नियम-कायदे जैसी कई सामाजिक कुरुतियाँ समाज में फैली हुई थीं | स्त्री को सिर्फ उपभोग की वस्तु ही माना जाता था | ऐसी और भी अनेक कुप्रथाएं समाज में फैली हुई थीं लेकिन आधुनिक शिक्षा के सम्पर्क से लोगों के दृष्टिकोण का विकास हुआ और वे आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के नवीन प्रकाश की ओर तीव्र गति से बढ़े एवं जागरूक हुए। भारतीय समाज जैसे-जैसे शिक्षित होता गया इन कुप्रथाओं का विरोध करता गया और साथ ही इन कुप्रथाओं से समाज को मुक्त करता गया | जैसे-जैसे समाज शिक्षित हुआ आधुनिकता का जैसे ही समाज को ज्ञान हुआ वैसे ही समाज में छुआछूत की भावना कम हो गई। लोग यह समझ गये कि जाति व्यवस्था ईश्वर की देन नहीं है। अपितु कुछ स्वार्थों का पोषण करने वाली एक सामाजिक व्यवस्था है। अब मनुष्य की महत्ता का आधार जन्म के स्थान पर कर्म बन गया इस प्रकार शिक्षा एवं समाज की जागरूकता ने निम्न जातियों को अपनी सामाजिक स्थितियों को ऊँचा उठाने के लिए प्रेरित किया और जीवन के प्रति नवीन दृष्टिकोण प्रदान किया। अस्पृश्यता, बहुपत्नी प्रथा, देवदासी प्रथा एवं मृत्यु भोज आदि सामाजिक एवं धार्मिक कुरीतियों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित हुआ एवं इनके दुष्परिणाम से समाज अवगत हुआ । परिणामस्वरुप देश के विभिन्न भागों में अनेक धार्मिक एवं समाज सुधार आंदोलनों का प्रादुर्भाव हुआ। इन समाज सुधारकों एवं इनके आंदोलनों ने स्त्रियों की दशा सुधारने में महत्वपूर्ण योगदान दिया | साथ स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त करने तथा अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होने की प्रेरणा दी | समाज सुधारकों ने स्त्री-पुरुष समानता पर बल दिया और स्त्रियों को घर की चार दीवारी से बाहर निकल कर कार्य करने की स्वतंत्रता का समर्थन किया। यही नहीं, आर्थिक क्षेत्र में स्त्रियों के प्रवेश का भारतीय समाज को प्रोत्साहन दिया। यहीं से भारतीय समाज में आर्य समाज, ब्रह्मसमाज एवं रामकृष्ण मिशन आदि आन्दोलनों का उदय हुआ। साथ ही इन आंदोलनों एवं आधूनिक शिक्षा के कारण समाज जागरूक हुआ और समाज ने बाल-विवाह एवं बहु-विवाह पर प्रतिबन्ध लगाने पर बल दिया तथा विधवा विवाह एवं अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन दिया। लोगों के खान-पान, रहन-सहन, वेशभूषा एवं व्यवहार के अन्य प्रतिमान प्रभावित हुए | समाज में अछूतों की दशा बहुत दयनीय थी। समाज में रहने वाले लोग उनके साथ छुआछूत का व्यवहार करते थे। आधुनिक शिक्षा एवं समाज की जागरूकता ने समाज में समानता का स्थान दिलवाया। कुप्रथाएं मिटाने एवं समाज में जागरूकता लाने के लिए न जाने कितने आन्दोलन हुए और न जाने कितने आन्दोलनकारियों ने समाज सुधारकों ने इस कुप्रथा को मिटाने की लड़ाई लड़ी और वे बहुत हद तक सफल भी हुए | किन्तु आज भी समाज में किसी घातक बीमारी की तरह ये कुप्रथायें फैली हुई हैं और समाज को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं, समय बदल गया लेकिन कुछ कुरुतियां वैसी की वैसी ही बनी हुई हैं लेकिन अब समय आ गया है इन कुरूतियों को समाज से उखाड़ फेकने का । हम हर दिन इस ब्लॉग के माध्यम से समाज में फैली कुरुतियां उसके दुष्प्रभाव और उसे समाज से उखाड़ फेकने के बारे में चर्चा करेंगे ।
लेखक-सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश 

Tuesday, February 23, 2016

जीएसटी लागू होने से होगा आमजन को फायदा

आजकल एक शब्द कानों में खूब गूँज रहा है  GST बिल | GST अथार्त् गुड्स एन्ड सर्विसेस टैक्स जिसे हम वस्तु एवं सेवा कर बिल भी कह सकते हैं | यह बिल स्टेंडिंग कमेटी से पास हो गया और  लोकसभा से भी पास हो गया परंतु राज्यसभा में हंगामें के कारण अटका पड़ा है | वैसे यह बिल कांग्रेस के शासन काल में ही लागू होना था | 2006-07 के आम बजट में  वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सरकार 1 अप्रैल 2010 से जीएसटी लागू करेगी लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है, अभी भी रुका हुआ है | जो कांग्रेस सत्ता पक्ष में रहते हुये जीएसटी बिल लागू करना चाह रही थी और भाजपा उसका विरोध कर रही थी अब वही कांग्रेस विपक्ष में आने के बाद बिल का विरोध कर रही है और अब भाजपा बिल लाना चाहती है | यह देश का दुर्भाग्य है कि हमारे राजनेता भूल जाते हैं कि संसद काम करने के लिए है और वे जनता की समस्याओं के निवारण करने के लिए हैं, लेकिन हमारे देश के जन सेवक कुर्सी पर बैठकर सिर्फ अपनी निजी राजनैतिक रोटियां सेकने में लगे रहते हैं | बहुत दुःख होता राजनेताओं की इस तरह की अनैतिक कार्यशीलता देखकर |
मानसून सत्र के दौरान सदन में वित्त मंत्री ने जैसे ही बिल पेश किया पेश किया तृणमूल, वाम मोर्चा, और एनसीपी ने वाकआउट कर दिया वहीं अन्नाद्रमुक ने अपना विरोध जताया और यही नजारा पिछले मानसून सत्र में देखने को मिला | इस तरह हंगामें के चलते मोदी सरकार ने बिल को लोकसभा से तो पारित करा लिया लेकिन राज्यसभा में अटक गया | सरकार इस बिल को अब तक का सबसे बड़ा टेक्स रिफार्मर बता रही है | भारत में सरकार के संघीय ढांचे होने के कारण जीएसटी बिल का स्वरूप दोहरा होगा, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्य के जीएसटी शामिल होंगे। यह बिल देश भर में अलग-अलग टेक्स प्रणाली को ख़त्म कर एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए है |
सरकार ने इस टैक्स पर अप्रैल 2016 से अमल करने का लक्ष्य रखा है । कई अर्थशास्त्रियों ने इसके लागू होने के बाद GDP ग्रोथ एक साल में 2-3 प्रतिशत बढ़ने की पूरी-पूरी उम्मीद जताई है | यह बिल देश की अर्थव्यवस्था की दिशा में क्रान्तिकारी कदम साबित हो सकता है | अगर वस्तु एवं सेवा कर लागू हो गया तो, सेंट्रल सेल्स टैक्स, एक्साइज़, लग्जरी टैक्स, एंटरटेनमेंट टैक्स, चुंगी, वैट जैसे सभी कर समाप्त  हो जाएंगे । इससे पूरे देश में एक उत्पाद लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा |अभी तक कोई भी सामान खरीदने पर 30-35 टैक्स के रूप में दिया जाता है । जीएसटी लागू होने के बाद  टैक्स घटकर 20% तक आ जायेंगे। कुछ विरोध करने वाले राज्यों का कहना है कि हमें 27% से अधिक जीएसटी दिया जाये | लेकिन केंद्र का कहना है कि 20% से अधिक दर तय की गई तो उत्पाद और सेवायें महंगी हो जाएंगी । लेकिन अब केंद्र के मनाने पर 20% तक के लिए सभी राज्य राजी हो गए हैं । जैसे यदि जीएसटी 20% तय होता है तो केंद्र और राज्य को Tax Revanue(टेक्स रेवेन्यु) का 10-10% हिस्सा मिलेगा और बाकी के टैक्स से जनता को छूट मिलेगी |
कुछ राज्य पैट्रो उत्पाद को जीएसटी के अंतर्गत नहीं रखना चाहते, इसलिए वे बिल का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनको एक-तिहाई टैक्स प्राप्ति केवल पेट्रोल-डीजल से होती है | परंतु मोदी सरकार ने GST के अंतर्गत टैक्स प्राप्ति में हानि होने वाले राज्यों को केंद्र की ओर से पाँच वर्ष तक, पहले वर्ष में 100%, दूसरे वर्ष में 75% और तीसरे से पांचवें वर्ष तक 50% की क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया है । इसके बाद अब तमिलनाडु और एक दो राज्यों को छोड़कर शेष सभी राज्यों से सहमति भी हो गई है |
अलग-अलग प्रणाली को बंद कर देश भर में एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए ही जीएसटी बिल का प्रारूप तैयार किया गया है | अभी तक सभी राज्यों में अलग-अलग स्थानीय  टैक्स लगाया जाता है, जिससे विभिन्न राज्य में एक ही वस्तु का अलग-अलग मूल्य होता है,  जैसे मोटर वाहन और डीजल  का मूल्य हर राज्य में अलग-अलग होता है । कई सामानों की कीमत सभी राज्यों में अलग अलग होती है । परंतु जीएसटी लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा । प्रत्येक उत्पाद पर लगने वाले टैक्स में केंद्र और राज्यों को बराबर भाग मिलेगा । इससे पूरे देश में एक प्रोडक्ट लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा और पहले से कम कीमत पर मिलेगा | इस तरह जीएसटी बिल के पास हो जाने से आमजनता का भला होगा और देश की आर्थिक दिशा में क्रांतिकारी कदम होंगे, परन्तु यह बिल निजी सिआसी जंग की भेंट चढ़ा है |
लेकिन अब सरकार द्वारा जीएसटी बिल को प्रमुखता से लागू करना चाहिये और सभी राजनैतिक दलों को भी अपनी निजी राजनैतिक सिआसत छोड़कर देश के लिए और आमजन की भलाई के लिए बिल का समर्थन करना चाहिए | जिससे जानता की भलाई हो सके, देश की आर्थिक गति तेजी से बड़े, अर्थव्यवस्था मजबूत हो, जनता की जेब में पैसा बचे, अधिक आय हो सके और जो राज्य वस्तु एवं सेवा में अधिक कर वसूलते हैं उन पर भी अंकुश लग सके | इसलिए मैं देश के सभी दलों और जनसेवकों से निवेदन करता हूँ कि वे अपनी सिआसी रोटियां सेकना छोड़े और देश के प्रति ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें |
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश

नारी शक्ति की लुटती अस्मिता : सभ्य समाज मौन

वर्तमान समय में हमारे देश में निरंतर बढ़ती बलात्कार की घटनायें आज समाज के लिए मुख्य रूप से चुनौती का विषय बन चुकी हैं, बलात्कार की निंदनीय घटनाओं पर पिछले कुछ बर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो आंकड़ों में बहुत ही निराशाजनक वृद्धि हुई है, जिसने ना सिर्फ हमारी सुरक्षा व्यवस्था बल्कि तमाम सामाजिक पहलुओं को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है | जिस नारी शक्ति को हमारे देश में देवी मानकर उसकी उपासना की जाती है, राक्षशी क्रूरता से भरे दरिन्दे उसी नारी शक्ति की अस्मिता को तार तार कर रहें हैं और हमारा सभ्य समाज सबकुछ मौन होकर देख रहा है | वर्तमान माहौल में मीडिया द्वारा इन घटनाओं को अपेक्षाकृत अधिक कवरेज तो मिलता है किन्तु फिर भी इन घटनाओं की मृत अथवा जीवित पीड़ितायेँ किसी भी सहायता व सहानुभूति से वंचित ही रह जाती हैं, देश के किसी भी शहरों में  हो या जहां भी घटनाएँ हुईं, पीड़ित लड़कियों की मदद के लिए हाथ आगे बढ़ते नहीं दिखते | सभ्य कहे जाने वाले इस संस्कारित समाज में कुकृत्यता के खिलाफ आवाज उठना तो दूर की बात है यहाँ तो पड़ोसी भी पीड़ित परिवार के साथ पुलिस स्टेशन तक जाने की सहानुभूति नहीं दिखाता, क्या यह स्वार्थ के दीमक से संक्रमित हमारी कमजोर मानवता के खोखलेपन को नहीं उघेड़ता? क्या ऐसे में भारत को सभ्य कहा जा सकता है? आदर्शों व महान नैतिक मूल्यों की संस्कृति की नींव पर विकसित हुए इस राष्ट्र में आज प्रत्येक 22वें मिनट किसी भेड़िये द्वारा एक विवश नारी की अस्मिता को तार तार किया जाता है | भारत में प्रतिदिन 60 महिलाओं के साथ बलात्कार की घटानाओं को अंजाम दिये जाने की बात सामने आती है | हम देखें तो आज नैतिक मूल्यों को खोते हुए भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें आकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहाँ 1971 में 2487 बलात्कार की घटनायें घटी वहीं 2011 में ये अमानवीय  घटनायें बढ़कर 24206 हुई इस तरह 873.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वही एक अन्य आंकड़े में ऐसा बताया गया है कि भारत में बलात्कार के ग्राफ में 30 प्रतिशत की रफ़्तार से प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है जो कि देश की अस्मिता को शर्मसार करने वाला आंकड़ा है | सन 2010 की अपेक्षा सन 2011 में लगभग बलात्कार के दो हजार मामले ज्यादा सामने आये और उसके बाद एक अनुमान के मुताबिक़ सन 2012, 2013, 2014 में भी इसी अनुपात में बलात्कार की अमानवीय दुर्घटनाओं में इजाफा हुआ है |ये तो वो आकडे हैं जो पीड़ित द्वारा पुलिस में शिकायत की जाती है, सोचिए ये आंकड़े इससे भी कही ज्यादा होंगे क्योंकि अभी भी 80% स्त्रियाँ लोकलाज, गरीब, असहाय या अशिक्षित होने के कारण थाने तक पहुँच ही नहीं पाती हैं। हम देखें तो आज नैतिक मूल्यों को खोते हुए भारत में बलात्कार सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है जिसमें आकड़ों से स्पष्ट होता है कि जहाँ 1971 में 2487 बलात्कार की घटनायें घटी वहीं 2011 में ये अमानवीय घटनायें बढ़कर 24206 हुई इस तरह 873.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
हर दिन अखबार, समाचार चैनल के माध्यम से सुनने-देखने को मिल रहा है कि आज यहाँ दरिन्दों ने नाबालिग की अस्मत लूटी कल वहां हैवानियत हुई, नित्य प्रति दिन दिल को दहला देनी वाली बलात्कार की घटनायें एवं निडर घूम रहे इन बदन पिपाशुओं पर नियंत्रण कैसे पाया जाये, ये सवाल आज भी ना सिर्फ प्रशासन बल्कि समूचे समाज के लिए चुनौती बना हुआ है | फिर हमारा समाज बलात्कार के खिलाफ आवाज उठाने की बजाए उस विवश पीड़िता को तमाशा बनाकर रख देता है, बड़े दुर्भाग्य की बात है कि वे दरिन्दे जो हैवानियत की सारी सीमा को पार कर जाते हैं, वे हमारे समाज में सिर उठाकर शान से जीते हैं और उसी सभ्यता से भरे संस्कारित समाज में एक विवश पीड़िता अपनी जिन्दगी ख़त्म करने पर मजबूर हो जाती है, दोयम दर्जे का व्यवहार करने वाला हमारा समाज उसे घ्रणा भरी निगाहों से देखने लगता है, उसे सामाजिक रूप से नकारा जाता है, उसे कदम-कदम पर ताना दिया जाता है, उसे जीने लायक नहीं छोड़ा जाता, कितनी शर्मिंदगी भरी बात है, बहुत दुःख होता है ये सब देखकर-सुनकर | कुछ माह पूर्व एक प्रमुख दल के मुखिया ने अपने बयान में कहा था चार लोग मिलकर एक लड़की का बलात्कार नहीं कर सकते, आखिर कैसे हमारे एक जन प्रतिनिधि इतना घटिया बयान दे सकते हैं, क्या उन्होंने नहीं सुना है, देश में कितने निंदनीय और दर्दनाक बलात्कार की दुर्घटनाएं हो रही हैं, एक उच्चपद में आसीन व्यक्ति जब ऐसे घटिया बयान देगा तो स्वाभाविक है समाज में बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं पर अंकुश लगने की बजाए विकृत मानसिकता को और ज्यादा बल मिलेगा | वहीँ समाज बलात्कार की घटनाओं को लेकर प्रायः दो प्रकार के वैचारिक वर्ग सक्रिय हो जाते हैं- एक तो वे जो महिलाओं पर ही अंकुश लगाने की बात करते हैं और दूसरे वे जो आधुनिकता की आड़ में हर घटना का ठीकरा भारतीय सामाजिक संरचना पर फोड़ने का प्रयास करते हुए पश्चिम के और अधिक उन्मुक्त अनुसरण की वकालत शुरू कर देते हैं । कुछ लोग महिलाओं के छोटे कपड़े पहने को बलात्कार की वजह बताने लगते हैं तो कुछ लोग देर रात तक लड़की के बाहर रहने की वजह बताने लगते हैं और ऐसे ही कई तरह से अपने अपने वक्तव्य देने लगते हैं, लेकिन उस घटना को हम किस तरह परिभाषित करेंगे जब एक पिता द्वारा अपनी ही बेटी का शोषण किया जाता है या फिर एक 4 वर्ष 5 वर्ष की नाबालिक को इस दरिंदगी का शिकार बनाया जाता है | बलात्कार छोटे कपड़ों या महिलाओं की आजादी के कारण नहीं बल्कि विकृत मानसिकता का परिणाम है |
आज तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं को समाज के मुख्य धारा का विषय मानकर इसे पूर्ण रूप से रोकने के लिए  हर संभव प्रयास किये जाने की आवश्यकता है, इसके लिए भारतीय समाज के हर घटक को एक साथ संगठित होकर इसके खिलाफ मजबूती से खड़े होने की आवश्यकता है, महिलाओं की अस्मिता एवं समाज के लिए कलंक बन चुकी इस हैवानियत के विरुद्ध शासन, प्रशासन, समाज, कानून सबको एक साथ सजग होने की जरुरत है ना कि सब अपनी ढपली अपना राग बजाएं | साथ ही तेजी से बढ़ रही बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ कठोर से कठोर कानून बनाने की आवश्यकता है, आरोपी को जेल तक की सजा देने से मामला बनता नहीं दिख रहा तो उन दंड नीतियों पर भी अमल किया जाना चाहिए जिससे बलात्कारी के अंदर सामाजिक प्रायश्चित एवं ग्लानि का भाव उत्पन्न हो और वो समाज के सामने अपने किये पर प्रायश्चित करे, साथ ही रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से बलात्कारी को नपुंसकता की स्थिति में लाने की प्रक्रिया को दंड प्रावधान में शामिल किया जाना चाहिए |
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्यप्रदेश 

Monday, February 22, 2016

व्यक्ति के जीवन में समाज का महत्व

आदिकाल का मानव ही हमारे समाज का जन्मदाता है । समाज शब्द "सभ्य मानव जगत" का सूक्ष्म स्वरुप एवं सार है । सभ्य का प्रथम अक्षर 'स' मानव का प्रथम अक्षर 'मा' जगत का प्रथम अक्षर 'ज' इन तीनों प्रथम अक्षरों के सम्मिश्रण से समाज शब्द की उत्पत्ति हुई, जो सभ्य मानव जगत का प्रतिनिधित्व एवं प्रतीकात्मक शब्द है । मानव ही समाज का सच्चा निर्माता उसका स्तम्भ एवं अभिन्न अंग है । एक व्यक्ति ही समाज का सूक्ष्म स्वरुप है और समाज व्यक्तियों का विशाल स्वरुप है, इसी कारण से हम कह सकते हैं कि व्यक्ति और समाज एक-दूसरे के पूरक तथा विशेष महत्वकांक्षी हैं ।
दो या दो से अधिक व्यक्तियों से मिलकर एक समुदाय बनता है एवं समुदाय से ही समाज का निर्माण होता है, समाज में रहकर ही व्यक्ति अपने विभिन्न तरह के मानवीय क्रिया-कलापों का निर्वाहन करता है | जिनमे सामाजिक सुरक्षा, अनुशासन, आचरण, निर्वाह, सदभाव आदि क्रियाएं होती हैं | समाज व्यक्ति के व्यवहारों एवं कार्यों के प्रक्रम की एक प्रणाली है। किसी भी व्यक्ति की क्रियाएँ चेतन और अवचेतन दोनों स्थितियों में संचालित होती हैं। व्यक्ति का व्यवहार एवं उसके द्वारा किये जाने वाले कार्य, जीवन के कुछ निश्चित लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास हेतु किये जाते हैं । उसकी कुछ अनंत एवं असीमित आवश्यकताएँ होती हैं- काम, शिक्षा, सुरक्षा, रोजगार, निवास आदि, इनकी पूर्ति के अभाव में व्यक्ति में कुंठा और मानसिक तनाव उत्पन्न हो जाता है और वह खुद को दीन-हीन अतिपिछड़ा, शोषितवर्ग समझने लगता है। वह अकेला बिना समाज के स्वयं इनकी पूर्ति करने में सक्षम नहीं होता अत: इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपने विस्तारित विकासक्रम में मनुष्य ने एक अनुशासित व्यवस्था का निर्माण कर लिया है। इस व्यवस्था को ही हम समाज के नाम से सम्बोधित करते हैं। यह व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध का एक ऐसा संकलन है जिसमें वे निश्चित संबंध और आदर्श व्यवहार द्वारा एक दूसरे से बँधे होते हैं। व्यक्तियों का यह संगठित संकलन उनके कार्यों एवं जरूरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न कार्यप्रणाली को विकसित करता है, जिनके कुछ व्यवहार अनुमत और कुछ निषिद्ध होते हैं।
एक समाज के अन्दर भी व्यक्ति अलग-अलग समुदाय में बटे होते हैं जो एक-दूसरे के समुदाय से कम मेल-जोल रखते हैं, एक समुदाय का व्यक्ति दूसरे समुदाय के व्यक्ति से बहुत ही कम अवसर पर संपर्क में रहता हैं, लेकिन इसके बावजूद भी समाज के व्यक्ति एक-दूसरे से अपार स्नेह एवं व्यवहार रखते हुए अलग-अलग रस्मों-रिवाज का निर्वाहन करते हैं | व्यक्ति के जीवन में एक संगठित सभ्य समाज का होना अतिआवश्यक होता है क्योंकि जीवन में स्वस्थ रीतियों-नीतियों को रेखांकित कर उनको संचालन करने तथा हमारी बहुत सी सामूहिक जटिल समस्याओं को सुलझाने एवं उन्हें सरल-सुगम बनाने हेतु एक समाज की आवश्यकता महसूस होती ही है । आपसी-सदभाव, प्रेम एवं सामूहिक एकता बनाये रखने, भाईचारा, शिष्टाचार, एवं अनुशासन कायम करने, आपसी मतभेद मिटाने, अपने उत्तम विचारों के आदान-प्रदान, सार्वजानिक एवं व्यक्तिगत जीवन की उन्नति हेतु, जीवन के समस्त सुसंस्कारों, पर्व-उत्सवों पर सामूहिक रूप से एकत्रित होने के लिए, सुख-दुःख बाटने, हवन-यज्ञ, धार्मिक स्थल, धर्मशाला, औषधालय, विद्यालय, पुस्तकालय, सार्वजनिक स्थल, खेल मैदान व्यामशाला, सभा-भवन आदि के निर्माण एवं रख-रखाव, शुद्ध स्वच्छ एवं स्वस्थ वातावरण बनाने हेतु, सामूहिक प्रयास से नारे, गीत-संगीत, लेख-आलेख, विचार-सुविचार, व्याख्यान, फिल्म-दर्शक, वक्ता-श्रोता, प्रदर्शनी, पत्र-पत्रिका प्रकाशन से समूचे भारत के कोने-कोने में बिखरी मानवजाति को समाज रुपी एकता की माला में पिरोने हेतु प्रबुद्ध व्यक्तियों का एक मंच बनाया गया । समाज में सभ्यता, सद्भावना एवं आदर्श स्थापित करने हेतु संगठन की बड़ी उपयोगिता हो जाती है । एकत्रित एवं संगठित समाज एक चमत्कारिक एवं अद्वितीय शक्ति का उदाहरण है । संगठन की एकता में बड़े से भी बड़ा कार्य करने की अपार क्षमता होती है । हम संगठित होकर समाज की सेवा, उन्नति एवं विकास कार्यों को पूर्णसंल्पना के साथ पूरा कर सकते हैं । तन-मन-धन तीन महाशक्तियों के संगम से समाज का चहुमुखी विकास संभव हो सका है । संगठित होकर ही हम समाज की हर क्षेत्र में निरंतर उपलब्धियों, प्रगति एवं उन्नति के पथ पर अग्रसर रह सकते हैं एवं स्वास्थ चिंतन कर उसे एक नई दिशा-दशा प्रदान कर सकते हैं । समाज में फैले घोर अंधकारमय निर्धनता एवं गरीबी को हम संगठित होकर ही दूर कर पायेंगे । अत: हमें संगठित रहने की परम् आवश्यकता है ।
समाज का कोई मूर्त स्वरुप नही है क्योंकि समाज सिर्फ व्यक्तियों के आपसी संबंधों की एक व्यवस्था है इसकी अवधारणा की कोई सीमा नही है, लेकिन इसके सदस्यों में एक दूसरे के आचार-विचार की विश्वसनीयता होती है। ज्ञान एवं विश्वसनीयता के अभाव में सामाजिक संबंधों का विकास संभव नहीं है। पारस्परिक सहयोग एवं संबंध का आधार समान स्वार्थ होता है। समान स्वार्थ की सिद्धि समान आचरण द्वारा संभव होती है। इस प्रकार का सामूहिक आचरण समाज द्वारा निर्धारित और निर्देशित होता है। वर्तमान सामाजिक मान्यताओं की समान लक्ष्यों से संगति के संबंध में सहमति अनिवार्य होती है। यह सहमति पारस्परिक विमर्श तथा सामाजिक प्रतीकों के आत्मीकरण पर आधारित होती है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक सदस्य को यह विश्वास होना चाहिए कि वह जिन सामाजिक मान्यताओं को उचित मानता, उनका पालन करता है और उसमे जीता है, उनका पालन दूसरे भी करते हैं। इस प्रकार की सहमति, विश्वास एवं आचरण सामाजिक व्यवस्था को स्थिर रखते हैं। व्यक्तियों द्वारा सीमित आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु स्थापित विभिन्न संस्थाएँ इस प्रकार कार्य करती हैं, जिससे एक आदर्श इकाई के रूप में समाज का संगठन अप्रभावित रहता है। असहमति की स्थिति व्यक्तियों में एक-दूसरे से एवं अंत:संस्थात्मक संघर्षों को जन्म देती हैं जो समाज के पतन का कारण बन जाते है। यह असहमति या यह माहौल उस स्थिति में पैदा होता है जब व्यक्ति संगठन के साथ आत्मीयता से सम्बन्ध बनाने में असफल रहता है। आत्मीयता के सम्बन्ध एवं समाज के नियमों को स्वीकार करने में विफलता, किसी व्यक्ति के अधिकारों का हनन एवं समुदाय में दूसरे सदस्यों के कारण यह समस्या उत्पन्न हो सकती है। इसके अतिरिक्त ध्येय निश्चित हो जाने के पश्चात् अक्सर इस विफलता का कारण बनता है।
सामाजिक संगठन का स्वरूप कभी शाश्वत नहीं बना रहता। समाज अनेकों लक्ष्य की प्राप्ति एवं अनेक व्यवस्था संचालन के लिए अलग-अलग समूहों में विभक्त है। अत: मानव मन और समूह मन की गतिशीलता उसे निरंतर प्रभावित करती रहती है, परिणामस्वरूप समाज परिवर्तनशील होता है। उसकी यह गतिशीलता ही उसके विकास का मूल है। सामाजिक विकास परिवर्तन की एक निरंतर प्रक्रिया है जो सदस्यों की आकांक्षाओं और पुनर्निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति की दिशा में सदैव उन्मुख रहती है। विकास की निरंतरता में सदस्यों का सहयोग, उनकी सहमति और नूतनता से अनुकूल की प्रवृत्ति क्रियाशील रहती है।
समाज का इतना ऋण लदा रहने पर भी समाज के हित के लिए कुछ भी न करना, सामाजिक समस्याओं के प्रति उदासीन रहना, किसी संवेदनशील मनुष्य के लिए असंभव है। जो केवल अपनी सोचता है, मानो उसकी मानवीय संवेदना शून्य है। समाज के प्रति आपके कुछ कर्तव्य हैं, दायित्व हैं। समाज के प्रति अपने कर्तव्यों और दायित्वों से आप छुटकारा नहीं पा सकेंगे। समाज की उपेक्षा करते रहेंगे, तो फिर आप विश्वास रखिए, समाज आपकी उपेक्षा करेगा और आपको कोई पहचान नहीं मिलेगी, आप सम्मान नहीं पा सकेंगे, आप सहयोग नहीं पा सकेंगे। आप समाज की उपेक्षा करते रहिए अपने आप में सीमाबद्ध हो जाइए, अकेले हो जाइए, अकेले रहिए, खुद ही खाइए और खुद ही मजा उड़ाइए। फिर आप ये भी भूल जाइए। समय आने पर आपको समाज से किसी तरह का सहयोग भी नहीं मिल सकेगा। न ही सम्मान मिल सकेगा । सम्मान और सहयोग ही मनुष्य की जीवात्मा की भूख और प्यास है। अगर आप उनको अर्जित करना चाहते हों तो कृपा करके यह विश्वास कीजिए कि जो समाज के प्रति आपके दायित्व हैं, जो कर्तव्य हैं, वो आपको निभाने चाहिए। आप उन कर्तव्यों और दायित्वों को निभा लेंगे तो बदले में सम्मान और सहयोग अर्जित कर लेंगे। जिससे आपकी खुशी, आपकी प्रशंसा और आपकी प्रगति में चार चाँद लग जायेंगे।
स्वलिखित (कॉपी राइट)
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्यप्रदेश 

Sunday, February 21, 2016

आरक्षण की आग में जलता देश

आरक्षण कुछ चापलूस नेताओं द्वारा चलाई जा रही एक ऐसी कला है, मानों जैसे एक हाथी को एक छोटी खूँटी में बाँधने के लिए बाध्य किया जा रहा है | इंसान के पास विचारने-सोचने की अद्वतीय शक्ति है, जिससे वह कोई भी महान रचनात्मक कार्य कर सकता है | लेकिन हमारे देश में आरक्षण की ऐसी मानसिक गुलामी फैली है कि जिसने व्यक्ति की बौद्धिक छमता को बांध कर रख दिया है, छोटी सोच लेकर जीने पर मजबूर हैं | व्यक्ति के पास किसी महान लक्ष्य की प्रतियोगिता के लायक हिम्मत ही नहीं बचती, कुछ नया सोचने की उसकी शक्ति बांझ हो जाती है, आरक्षण की सुविधा जिसे मिल रही है वो अपनी बौद्धिकता खोने को मजबूर है |
संविधान निर्माताओं द्वारा आरक्षण इसलिए लाया गया था ताकि पिछड़ों को आगे लाकर समाज में समानता लाई जा सके और यह भी निर्णय लिया गया था कि तय अवधि के बाद इसे समाप्त कर दिया जायेगा लेकिन इसे अभी भी समाप्त नहीं किया गया | समाप्त करने की बजाय इसे दिनों-दिन बढ़ाया गया और इस पर राजनीति होने लगी | पहले     पढ़ाई में आरक्षण, फिर नौकरी में अब प्रमोशन में भी आरक्षण ये क्या तमाशा है | आरक्षण की व्यवस्था जिसके लिए की गई है, उसका ज्यादा भला तो नहीं हुआ, लेकिन हाँ जातिवाद फैलाकर उसकी नैया पर सवार होकर राजनीति की वैतरणी पार करने वालों को जरुर फायदा हुआ है | कुछ लोगों ने भैसों का चारा खा गये, तो कुछ ने पार्कों में अपनी मूर्तियाँ सजवा लिये | देश में जो भी निम्नस्तर की राजनीति हुई, जितने भी निम्नस्तर के नेता पैदा हुए इसी जातिगत आरक्षण के नाम पर टिके रहे | अगर जातिगत आरक्षण बंद हो जाये तो इस पर राजनीति कर देश को बाँटने वाले नेताओं की दुकाने भी बंद हो जायेंगी |
भारत देश जब स्वतंत्र हुआ, उसके पहले ही संविधान में कुछ समूहों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के रूप में संवैधानिक रूप से सूचीबद्ध कर दिया गया था, उस समय के आधार पर संविधान निर्माण समिति का कहना था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति ऐतिहासिक रूप से पिछड़े रहे हैं, उन्हें समाज में सम्मान और समान अवसर नहीं दिया गया है | इसी आधार पर संविधान का निर्माण हुआ तब संविधान निर्माण समिति ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को सरकारी प्राप्त शिक्षण संस्थाओं की खाली सीटों, तथा सरकारी एवं सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों के लिए अनुसूचित जाति को 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 7.5 प्रतिशत का आरक्षण रखा, साथ ही आर्टिकल 330 में लोकसभा और विधानसभा में भी इसकी जातीय जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण रखा गया | जो  सिर्फ दस वर्षों के लिए था, इसके हालात की समीक्षा कर इसे ख़त्म किया जाना था यह निर्णय संविधान निर्माण समिति द्वारा लिया गया था | लेकिन यह दुर्भाग्य की बात है कि आने वाली सरकारों द्वारा हमेशा अवधि बढ़ाती जाती रही है और 66 वर्ष हो गये देश अभी भी आरक्षण के बेड़ियों में जकड़ा हुआ है | बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए भी आरक्षण शुरू कर दिया गया |
आज तक किसी भी पार्टी ने या सरकार ने आरक्षण समाप्त करने का विचार तक नहीं किया, बल्कि समय के साथ इसे और ज्यादा बढ़ाया गया, आज आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत तक हो गयी, यही कारण हैं कि हर जाति हर वर्ग के लोग आरक्षण की मांग कर रहे हैं और आरक्षण के नाम पर आपस में ही विभाजन तथा विभेद पैदा हो रहा है | एक तरफ भारत एक धर्म निरपेक्ष देश है तो दूसरी तरफ आरक्षण के नाम पर राजनीति करने वाले इसे बाँट रहे हैं | आरक्षण में खरगोश और कछुये की दौड़ वाला खेल खेला जा रहा है, प्रतिभा और हुनर का सीधे-सीधे शोषण हो रहा है, योग्यता को उचित स्थान नहीं मिल पा रहा है | आरक्षण के कारण 80 फीसदी अंक लेकर आने वाला प्रतियोगिता की दौड़ से हो बाहर हो जाता है और वहीं 30 फीसदी अंक लेकर शीर्ष स्थान प्राप्त कर लेता है, यही कारण है कि आज देश की जो उन्नति होनी थी नहीं हो पायी, देश को जिन ऊंचाईयों में होना था वहाँ नहीं है | आरक्षण किसी का रक्षण तो नहीं है परन्तु देश का भक्षण जरुर कर रहा है |
कुछ माह पूर्व गुजरात में राज्य का सबसे संपन्न पटेल-पाटीदार समाज ने आरक्षण की मांग को लेकर आन्दोलन किया है | गुजरात की कुल आबादी 6 करोड़ 27 लाख है, इसमें पटेल-पाटीदार लोगों की संख्या 20 प्रतिशत है | ये लोग खुद को ओबीसी कैटेगिरी में शामिल करना चाहते हैं, ताकि कालेजों और नौकरियों में कोटा मिल सके | राज्य में अभी ओबीसी रिजर्वेशन 27 प्रतिशत है, ओबीसी में 146 कम्युनिटी पहले ही लिस्टेड हैं, पटेल-पाटीदार समाज खुद को 146 वीं कम्युनिटी के रूप में ओबीसी की लिस्ट में शामिल होना चाहता है इसलिए यह समुदाय आरक्षण की मांग को लेकर आन्दोलन कर रहा था, जो बेहद हिंसात्मक रूप धारण कर चुका था, भयानक आग जनी, तोड़-फोड़ हुई, बहुत ज्यादा धन-जन की हानि हुई और अब हरियाणा में जाटों ने पूरे प्रदेश को आग में झोंक दिया । वैसे यह कोई नई बात नहीं है, देश पहले भी कई बार जातिगत आरक्षण की आग में जला है | ऐसे आन्दोलन पहले भी हुये हैं, जातिगत आरक्षण अगर बंद नहीं हुआ तो देश आगे भी ऐसे ही जलता रहेगा | आरक्षण किसी का रक्षण तो नहीं लेकिन देश का भक्षण जरुर कर रहा है |
आरक्षण से हमारा समाज कहाँ जा रहा है ? सोचो जरा, ये भीख मांगने का स्वाभाव नहीं तो और क्या है ? आरक्षण का ही दुष्परिणाम है कि 21 वीं सदी में भी लोगों की कितनी निम्न सोच है | जिस देश में लोगों में पिछड़ा बनने की होड़ लगी हो वो देश आगे कैसे बढ़ सकता है, इसलिए अगर देश को सुपरपावर बनाना है, तो आरक्षण को अविलम्ब बंद कर देना चाहिए | क्योंकि देश में जातिवाद की नहीं गरीबी की समस्या है, बेरोजगारी की समस्या है, जिस दिन देश से गरीबी समाप्त हो जाएगी लोगों को पर्याप्त रोजगार मिलने लगेंगे, तो आरक्षण की जरुरत ही नहीं पड़ेगी जातिवाद ही ख़त्म हो जायेगा | इसलिए सरकार को जातिगत आरक्षण देने की वजाये गरीबी दूर करने एवं रोजगार अवसर उपलब्ध कराने पर ज्यादा जोर देना चाहिए और सभी दलों को भी जाति-धर्म की राजनीति छोड़कर विकासवाद की राजनीती करनी चाहिए, जिससे देश में विकासवाद का माहोल बने |
स्वलिखित (कॉपी राइट)
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश

जीएसटी चढ़ा राजनैतिक सिआसत की भेंट

जीएसटी अर्थात गुड्स एन्ड सर्विसेस टैक्स जिसे हम वस्तु एवं सेवा कर बिल भी कह सकते हैं | यह बिल पिछले वर्ष मानसून सत्र में स्टेंडिंग कमेटी और लोकसभा से भी पास हो गया है परंतु राज्यसभा में हंगामें के कारण अटका पड़ा है | देश आजाद होने के बाद के सबसे बड़े कर सुधार करार दिए जा रहे वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) बिल के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल घिर गए हैं। अब यह स्पष्ट नहीं है कि जीएसटी कब से लागू होगा, हालांकि सरकार को उम्मीद है कि जीएसटी विधेयक बजट सत्र में पारित हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि सरकार ने एक अप्रैल 2016 से जीएसटी लागू करने का लक्ष्य रखा है लेकिन जीएसटी के लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक राज्य सभा में लंबित होने के चलते इसका भविष्य अनिश्चित हो गया है। सरकार को उम्मीद थी कि वह विपक्ष की सहमति से शीतकालीन सत्र में इस विधेयक को पारित करा लेगी, लेकिन विपक्ष के विरोध के चलते इस पर विचार नहीं किया जा सका। जीएसटी के लिए संविधान में संशोधन जरूरी है इसलिए इस संशोधन को कम से कम 50 प्रतिशत राज्य विधानमंडलों से मंजूरी दिलाना जरूरी होगा। अगर बजट सत्र में संविधान संशोधन विधेयक पारित हो जाता है तब यह देखना होगा कि राज्यों के विधानमंडलों से यह कब तक पारित होता है। जीएसटी के लागू होने पर उत्पाद शुल्क और सेवा कर सहित केंद्र और राज्यों के परोक्ष कर समाप्त हो जाएंगे।
वैसे यह बिल कांग्रेस के शासन काल में ही लागू होना था, 2006-07 के आम बजट में वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि सरकार 1 अप्रैल 2010 से जीएसटी लागू करेगी लेकिन अभी तक लागू नहीं हो पाया है, अभी भी रुका हुआ है | जो कांग्रेस सत्ता पक्ष में रहते हुये जीएसटी बिल लागू करना चाह रही थी और भाजपा उसका विरोध कर रही थी अब वही कांग्रेस विपक्ष में आने के बाद बिल का विरोध कर रही है और अब भाजपा बिल लाना चाहती है | यह देश का दुर्भाग्य है कि हमारे राजनेता भूल जाते हैं कि संसद काम करने के लिए है और वे जनता की समस्याओं के निवारण करने के लिए हैं, लेकिन हमारे देश के जन सेवक कुर्सी पर बैठकर सिर्फ अपनी निजी राजनैतिक रोटियां सेकने में लगे रहते हैं | बहुत दुःख होता राजनेताओं की इस तरह की अनैतिक कार्यशीलता देखकर | कांग्रेस की मांग है कि जीएसटी दर पर सीमा लगे और इसे संविधान संशोधन विधेयक में शामिल किया जाए। वित्त मंत्री जेटली का कहना है कि कर की दर को संविधान का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता क्योंकि कर की दर को संविधान के दायरे में लाने का मतलब भावी पीढ़ी पर बोझ देना और इस उद्देश्य से देखा जाए तो सरकार का मत उचित दिखाई पड़ता है |
सरकार इस बिल को अब तक का सबसे बड़ा टेक्स रिफार्मर बता रही है | भारत में सरकार के संघीय ढांचे होने के कारण जीएसटी बिल का स्वरूप दोहरा होगा, क्योंकि इसमें केंद्र और राज्य के जीएसटी शामिल होंगे। यह बिल देशभर में अलग-अलग टेक्स प्रणाली को ख़त्म कर एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए है | सरकार ने इस टैक्स पर अप्रैल 2016 से अमल करने का लक्ष्य रखा है । कई अर्थशास्त्रियों ने इसके लागू होने के बाद GDP ग्रोथ एक साल में 2-3 प्रतिशत बढ़ने की पूरी-पूरी उम्मीद जताई है | यह बिल देश की अर्थव्यवस्था की दिशा में क्रान्तिकारी कदम साबित हो सकता है | अगर वस्तु एवं सेवा कर लागू हो गया तो, सेंट्रल सेल्स टैक्स, एक्साइज़, लग्जरी टैक्स, एंटरटेनमेंट टैक्स, चुंगी, वैट जैसे सभी कर समाप्त  हो जाएंगे । इससे पूरे देश में एक उत्पाद लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा | अभी तक कोई भी सामान खरीदने पर 30-35 टैक्स के रूप में दिया जाता है । जीएसटी लागू होने के बाद टैक्स घटकर 20 प्रतिशत तक आ जायेंगे। कुछ विरोध करने वाले राज्यों का कहना है कि हमें 27 प्रतिशत से अधिक जीएसटी दिया जाये | लेकिन केंद्र का कहना है कि 20 प्रतिशत से अधिक दर तय की गई तो उत्पाद और सेवायें महंगी हो जाएंगी । लेकिन अब केंद्र के मनाने पर 20 प्रतिशत तक के लिए सभी राज्य राजी हो गए हैं । जैसे यदि जीएसटी 20 प्रतिशत तय होता है तो केंद्र और राज्य को Tax Revanue(टेक्स रेवेन्यु) का 10-10 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा और बाकी के टैक्स से जनता को छूट मिलेगी |
कुछ राज्य पैट्रो उत्पाद को जीएसटी के अंतर्गत नहीं रखना चाहते, इसलिए वे बिल का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उनको एक-तिहाई टैक्स प्राप्ति केवल पेट्रोल-डीजल से होती है | परंतु मोदी सरकार ने GST के अंतर्गत टैक्स प्राप्ति में हानि होने वाले राज्यों को केंद्र की ओर से पाँच वर्ष तक, पहले वर्ष में 100 प्रतिशत, दूसरे वर्ष में 75 प्रतिशत और तीसरे से पांचवें वर्ष तक 50 प्रतिशत की क्षतिपूर्ति का प्रावधान किया है । अलग-अलग प्रणाली को बंद कर देशभर में एक ही टेक्स प्रणाली लागू करने के लिए ही जीएसटी बिल का प्रारूप तैयार किया गया है | अभी तक सभी राज्यों में अलग-अलग स्थानीय  टैक्स लगाया जाता है, जिससे विभिन्न राज्य में एक ही वस्तु का अलग-अलग मूल्य होता है,  जैसे मोटर वाहन और डीजल  का मूल्य हर राज्य में अलग-अलग होता है । कई सामानों की कीमत सभी राज्यों में अलग अलग होती है । परंतु जीएसटी लागू होने के बाद ऐसा नहीं होगा,  प्रत्येक उत्पाद पर लगने वाले टैक्स में केंद्र और राज्यों को बराबर भाग मिलेगा । इससे पूरे देश में एक प्रोडक्ट लगभग एक जैसी ही कीमत पर मिलेगा और पहले से कम कीमत पर मिलेगा | इस तरह जीएसटी बिल के पास हो जाने से आमजनता का भला होगा और देश की आर्थिक दिशा में क्रांतिकारी कदम होंगे, इसलिए मैं सभी राजनैतिक दलों से निवेदन करता हूँ कि आने वाले बजट सत्र में जीएसटी बिल पारित करवाने में सरकार का सहयोग करें | जिससे जानता की भलाई हो सके, देश की आर्थिक गति तेजी से बड़े और जो राज्य वस्तु एवं सेवा में अधिक कर वसूलते हैं उन पर भी अंकुश लग सके | इसलिए मैं देश के सभी दलों और जनसेवकों से निवेदन करता हूँ कि वे अपनी सिआसी रोटियां सेकना छोड़े और देश के प्रति ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें |
स्वलिखित (कॉपी राइट)
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्यप्रदेश

Saturday, February 20, 2016

राष्ट्र विरोधी नारे अभिव्यक्ति की आजादी या राष्ट्रद्रोह

दिसंबर 2001 को जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकवादियों ने लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद पर हमला किया था। उस दिन उन आतंकवादियों ने 45 मिनट में संसद भवन को गोलियों से छलनी करके पूरे हिंदुस्तान को झकझोर दिया था । लोकतंत्र के इस मंदिर को गोलियों-बमों से थर्रा कर रख दिया था। आतंक के नापाक कदम उस दिन लोकतंत्र के मंदिर की दहलीज तक पहुंच गए थे, शायद उन आतंकवादियों की पूरे संसद भवन को नेस्तनाबूद करने की साजिद थी,  लेकिन हमारे सुरक्षाकर्मियों ने अपनी जान की परवाह न करते हुए उन आतंकियों के मंसूबों पर पानी फेर दिया। लोकतंत्र के इस मंदिर में कोई आंच न आए, इसलिए उन्होंने अपनी जान की बाजी लगा दी। सुरक्षाकर्मियों ने बड़ी ही वीरता से सभी आतंकियों को मार गिराया। आतंकियों का सामना करते हुए दिल्ली पुलिस के पांच जवान, सीआरपीएफ की एक महिला कांस्टेबल और संसद के दो गार्ड शहीद हुए। 16 जवान इस दौरान मुठभेड़ में घायल हुए थे । इसके बाद संसद पर हमले की साजिश रचने वाले अफजल गुरु को सुप्रीम कोर्ट ने 4 अगस्त 2005 को फांसी की सजा सुनाई, कोर्ट ने आदेश दिया था कि 20 अक्टूबर 2006 को अफजल गुरु को फांसी के तख्ते पर लटका दिया जाए। तीन अक्टूबर 2006 को अफजल की पत्नी तब्बसुम ने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दाखिल कर दी। राष्ट्रपति ने इस दया याचिका पर गृह मंत्रालय से राय मांगी। मंत्रालय ने इसे दिल्ली सरकार को भेज दिया जहां दिल्ली सरकार ने इसे खारिज करके गृह मंत्रालय को वापस भेजा । गृह मंत्रालय ने भी दया याचिका पर फैसला लेने में वक्त लगाया लेकिन मंत्रालय ने अपनी फाइल राष्ट्रपति के पास भेज दी । फांसी पर अंतिम फैसला देश के राष्ट्रपति को ही लेना था, अत: राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अफजल की दया याचिका खारिज कर दी और सरकार ने 2013 में उसे फांसी दे दिया । अफजल गुरु और अजमल कसाब को फांसी उस समय दी गई थी जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। कांग्रेस सरकार ने दोनों आतंकवादियों को रातों रात बिना किसी को बताये चुपचाप फांसी पर लटका दिया था। कांग्रेस सरकार को यकीन था कि  बताकर फांसी देने के बाद भारत के लोग विरोध करने के लिए बाहर आ सकते हैं इसके बावजूद भी कांग्रेस सरकार ने फांसी दी। लेकिन आज वही कांग्रेस बदल गयी है, कांग्रेस की स्वस्वार्थ की राजनीति देखकर ऐसा लग रहा है कि अगर अजमल कसाब और अफजल गुरु को मोदी सरकार के समय में फांसी दी गयी होती और JNU में लोग फांसी का विरोध करते तो कांग्रेस भी उनका समर्थन करती और फांसी रुकवाने की हर संभव कोशिश करती। जिस कांग्रेस पार्टी ने अफजल गुरु को फांसी दी थी आज उसी पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी अफजल गुरु को शहीद का दर्जा देने की मांग करने वालों का साथ दे रहे हैं। आज राहुल गाँधी भारत विरोधी नारे लगाने वालों का समर्थन करते हुए कह रहे हैं कि भारत में बोलने की आजादी है, भारत में विरोध करने की आजादी है और जो विरोध करने वालों की आवाज दबाना चाहता है वह राष्ट्र विरोधी हैं।
हमारे लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर संसद भवन पर हमला करने और उसे तबाह कने की सोच रखने वाले मास्टर माइंड आतंकी अफजल गुरु की बरसी मनाई जा रही थी, वो भी हमारे देश की राजधानी दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में और फिर उस कार्यक्रम में "इण्डिया गो बैक", "कश्मीर मांगे आजादी", "केरल मांगे आजादी", "कितने अफजल मारोगे हर घर से अफजल निकलेगा", "पाकिस्तान जिंदाबाद हिन्दुस्तान मुर्दाबाद", "कश्मीर की आजादी तक जंग चलेगी, भारत की बर्बादी तक जंग चलेगी", "भारत तेरे टुकड़े होंगे", जैसे देश विरोधी नारे लगाये गये। जो कि ऐसे नारे देश के लिए बहुत घातक हैं । इस तरह के नारे लगाने का सीधा मतलब है, देश से घात करना, देश के खिलाफ जाना, देश विरोधी ताकतों को बढ़ावा देना । आतंकी अफजल गुरु की फांसी का विरोध करने का मतलब हैं देश के लोकतंत्र का अपमान करना, देश का अपमान करना और देश की न्यायपालिका एवं राष्ट्रपति की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े कर देना, तथा उनके फैसले को ठेंगा दिखाना । लेकिन हमारे देश के कुछ राजनैतिक दल और उनके नेता अपनी निम्नस्तर की घटिया राजनीति के चलते इसे अभिव्यक्ति की आजादी बताकर अपनी राजनीति चमकाने में लगे हुये हैं । अभिव्यक्ति की आजादी की आड़ में देश विरोधी ताकतों का समर्थन करना और स्वार्थ की राजनीति करना देश के लिए बेहद शर्मनाक है । क्योंकि हिन्दुस्तान में रहने वाला कोई भी नागरिक ऐसे नारे लगाता है तो वह निश्चित ही देशद्रोही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर होने वाले इस देशद्रोही हरकत का समर्थन कुछ राजनीति दल,  देश के संविधान और न्यायपालिका का मजाक बनाने से नही चूक रहें हैं । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर मातृभूमि का अपमान किया गया लेकिन कुछ नेताओं को राष्ट्र से ज्यादा अपनी राजनीति महत्वपूर्ण लगती है । देश विरोधी नारा लगाना अभिव्यक्ति की आजादी नही बल्कि देश द्रोह है और देश द्रोह का कतई समर्थन नही किया जाना चाहिए ।
ऐसी देश विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने वाले अड्डे के नाते जेएनयू पर अब इस देश के लोगों को और सरकार को सोचना होगा कि इससे कैसे सख्ती से निपटा जाए। क्योंकि दुनिया में कही भी ऐसी शैक्षणिक संस्था नही है जहाँ पर इतनी आजादी हो कि आप जिस राष्ट्र का अंग हैं उसी राष्ट्र के अंग भंग याकि सोलह टुकड़े करने के नारे लगाने का बौद्धिक विमर्श करें। जेएनयू के छात्रसंघ ने, वामपंथी छात्र संगठन ने, और देश के कुछ राजनैतिक दलों ने देश विरोधियों को जो मौका दिया है, जैसी उनकी हौसलाबुंलदी की है, जैसे उनके पक्ष में खड़े हुए, उनका समर्थन किया, ये समान रूप से उतने ही दोषी हैं जितने भारत के सोलह टुकड़े के नारे लगाने वाले हैं। नारे देश के टुकड़े चाहने की मंशा लिए हैं, जो कि बहुत ही गंभीर विषय है, बतौर साक्ष्य वीडियो मौजूद है। दोषी पूरा जेएनयू है, वहां की आबोहवा है, भारत के किसी विश्वविद्यालय, किसी कॉलेज में या किसी संस्थान में यदि शैक्षिक आजादी के नाम पर भारत को तोड़ने की सोच के परिवेश की हकीकत बनती है तो उसे बरदाश्त नहीं किया जा सकता। जेएनयू एंटी नेशनल एक्टिविटीज का अड्डा बन गया है, इन पर सख्त से सख्त कार्यवाही की जाये । ज्ञात हो कि भारत के बंटवारे की पटकथा अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में लिखी गई थी और वही नजारा जेएनयू में दिख रहा है ।
स्वलिखित (कॉपी राइट)
सत्यम सिंह बघेल
केवलारी, सिवनी
मध्य प्रदेश