Tuesday, May 10, 2016

गांधी परिवार : आगस्ता और बोफोर्स

आगस्ता वेस्टलैण्ड हेलीकॉप्टर का मुद्दा
मीडिया, सोशल मीडिया और संसद से लेकर सड़क तक देश में हर जगह बहस का विषय बना हुआ है । यह मामला भारत द्वारा आगस्ता वेस्टलैण्ड कम्पनी से खरीदे गए हेलिकॉप्टरों से सम्बन्धित है जो 2013-14 में सामने आया। इसमें कई भारतीय राजनेताओं एवं सैन्य अधिकारियों पर आगस्ता वेस्टलैण्ड से मोटी घूस लेने का आरोप है। इसी तरह का एक और मामला था बोफोर्स इसमे भी कई भारतीय राजनेताओं एवं सैन्य अधिकारियों पर घूस लेने का अरोप था । बोफोर्स कांड के मामले में सन् 1987 में यह बात सामने आयी थी कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारतीय सेना को तोपें सप्लाई करने का सौदा हथियाने के लिये 80 लाख डालर की दलाली चुकायी थी। उस समय केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी, जिसके प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। स्वीडन की रेडियो ने सबसे पहले 1987 में इसका खुलासा किया। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में खलबली मचा दी और राजीव गांधी इसके निशाना बने। 1989 के लोकसभा चुनाव का ये मुख्य मुद्दा था जिसने राजीव गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया और वीपी सिंह राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री बने। और साथ ही बोफोर्स कांड राजीव गांधी को इस कदर ले डूबा कि वे इससे जीवन पर्यन्त उभर ही नही पाये । बोफोर्स मामला ने उनका राजनैतिक कैरियर ही खत्म कर दिया था ।
आरोप था कि राजीव गांधी परिवार के नजदीकी बताये जाने वाले इतालवी व्यापारी ओत्तावियो क्वात्रोक्की ने इस मामले में बिचौलिये की भूमिका अदा की, जिसके बदले में उसे दलाली की रकम का बड़ा हिस्सा मिला। कुल चार सौ बोफोर्स तोपों की खरीद का सौदा 1.3 अरब डालर का था। आरोप है कि स्वीडन की हथियार कंपनी बोफोर्स ने भारत के साथ सौदे के लिए 1.42 करोड़ डालर की रिश्वत बांटी थी। काफी समय तक राजीव गांधी का नाम भी इस मामले के अभियुक्तों की सूची में शामिल रहा लेकिन उनकी मौत के बाद नाम फाइल से हटा दिया गया। सीबीआई को इस मामले की जांच सौंपी गयी लेकिन सरकारें बदलने पर सीबीआई की जांच की दिशा भी लगातार बदलती रही। एक दौर था, जब जोगिन्दर सिंह सीबीआई चीफ थे तो एजेंसी स्वीडन से महत्वपूर्ण दस्तावेज लाने में सफल हो गयी थी। जोगिन्दर सिंह ने तब दावा किया था कि केस सुलझा लिया गया है। बस, देरी है तो क्वात्रोक्की को प्रत्यर्पण कर भारत लाकर अदालत में पेश करने की। उनके हटने के बाद सीबीआई की चाल ही बदल गयी। इस बीच कई ऐसे दांवपेंच खेले गये कि क्वात्रोक्की को राहत मिलती गयी।

अब वर्तमान मामला है आगस्ता वेस्टलैंड हेलीकाप्टर खरीदी का । इस मामले में यूपीए-1 सरकार के वक्त 2010 में अगस्ता वेस्टलैंड से वीवीआईपी के लिए 12 हेलिकॉप्टरों की खरीद की डील हुई थी। डील के तहत मिले 3 हेलिकॉप्टर आज भी दिल्ली के पालम एयरबेस पर खड़े हैं। इन्हें इस्तेमाल में नहीं लाया गया। डील 3,600 करोड़ रुपए की थी। टोटल डील का 10 फीसदी हिस्सा रिश्वत में देने की बात सामने आई थी। इसके बाद यूपीए सरकार ने फरवरी 2010 में डील रद्द कर दी थी।
तब एयरफोर्स चीफ रहे एसपी त्यागी समेत 13 लोगों पर केस दर्ज किया गया था। जिस मीटिंग में हेलीकॉप्टर की कीमत तय की गई थी, उसमें यूपीए सरकार के कुछ मंत्री भी मौजूद थे। इस वजह से कांग्रेस पर भी सवाल उठे थे।
मिलान कोर्ट ऑफ अपील्स ने दिए फैसले में माना है कि इस हेलिकॉप्टर डील में करप्शन हुआ है और इसमें इंडियन एयरफोर्स के पूर्व चीफ एसपी त्यागी भी शामिल थे। 90 से 225 करोड़ रुपए की रिश्वत भारतीय अफसरों को दी गई। कोर्ट ने वीवीआईपी हेलिकॉप्टर देने वाली कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड के चीफ जी. ओरसी को दोषी ठहराया है। उन्हें साढ़े चार साल जेल की सजा सुनाई गई है।
इटली की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोर्ट ने अपने जजमेंट में बताया है कि अगस्ता वेस्टलैंड ने कैसे कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी और उनके करीबी सहयोगियों जैसे पीएम मनमोहन सिंह और नेशनल सिक्युरिटी एडवाइजर एमके नारायणन के साथ लॉबिंग की। कोर्ट ने अपने फैसले में चार बार सोनिया गांधी और दो बार मनमोहन सिंह का नाम लिया है।
बोफोर्स के बाद सबसे बड़े कथित रक्षा घोटाले अगस्ता हेलिकॉप्टर खरीदी में करप्शन को लेकर राज्यसभा में हुई चर्चा के बाद कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तीन महीने के अंदर जांच पूरी कर अगले सत्र में रिपोर्ट पेश किए जाने की चुनौती देकर मोदी सरकार को असमंजस में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ी। हाल ही में मनोनीत सांसद सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा उछाले गए भ्रष्टाचार से जुड़े इस हाईप्रोफाइल मामले में बीजेपी ने भी सदन के बाहर और अंदर आक्रामक रुख अपनाया लेकिन कोई बड़ा सबूत प्रमाणिकता के साथ सामने नहीं ला पाई जिससे कांग्रेस बैकफुट पर जाने को मजबूर हो।  करीब 5 घंटे चली कार्रवाई के दौरान सदन में बचाव, सवाल-जवाब, आरोप-प्रत्यारोप का दौर ही चलता रहा ।

वस्तुतः देखा जाये तो बोफोर्स और आगस्ता दोनो मामलों में बहुत अधिक समानताएं हैं । मामलों का संबंध मुख्यरूप गांधी परिवार से जुड़ा हुआ है । दोनो मामले रक्षा क्षेत्र से जुड़े हैं । दोनो मामलों में भारतीय राजनेताओं तथा सैन्य अधिकारियों पर घूस लेने का आरोप है । दोनो मामले इटली से जुड़े हैं । दोनो मामलों में बिचोलियों ने मध्यस्था की भूमिका निभाई है । बोफोर्स घोटाला में राजीव गांधी का नाम आया था और इस कारण राजीव गांधी को सत्ता से बाहर हो गए थे । साथ बोफोर्स कांड राजीव को इस कदर ले डूबा कि वे इससे जीवन पर्यन्त उभर ही नही पाये । बोफोर्स मामला ने उनका राजनैतिक कैरियर ही खत्म कर दिया था । आगस्ता वेस्टलैंड में सोनिया गांधी का नाम सामने आया है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि यह मामला सोनिया गांधी के राजनैतिक जीवन को कितना प्रभावित करता है । इस मामले में घिरकर सोनिया गांधी का राजनैतिक उम्मीद से पहले ही समाप्त हो जायेगा या फिर आगे भी उनका वर्चस्व कायम रहेगा ।

सत्यम सिंह बघेल

बुंदेलखण्ड में सूखा संकट और सियासत

स्वतन्त्रता प्राप्ति के वर्षों बाद भी उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश का बुंदेलखण्ड क्षेत्र सूखे का शिकार है । उत्तर प्रदेश के पचास से अधिक जिलों में सूखे की मार पड़ी है, जिससे भूख-प्यास से लोगों के दम तोड़ने की भी खबरें आई हैं। इस पूरे क्षेत्र में कृषि ही लोगों के जीवन यापन का मुख्य आधार है। सिंचाई के लिए जल न होने के कारण क्षेत्र में अकाल जैसे हालात हो गए हैं। लोग किसानी छोड़कर मजदूरी करने को बाध्य हो गए हैं। भुखमरी जैसे हालात से गुजर रहे इस क्षेत्र में अन्य समाजिक समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं। क्षेत्र से लोगों का पलायन जारी है। बच्चों के स्कूल छोड़कर बालमजदूरी करने की घटनाओं में 24 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। पौष्टिक भोजन नहीं मिलने से बच्‍चे कुपोषण के शिकार हो रहे हैं। सूखा और गरीबी के कारण घास की रोटी खाने और गड्ढे का पानी पीने को मजबूर हैं । सूखे से निपटने में अक्षम माता पिता द्वारा अपने बच्चों को बेचने तक की घटनाएं सामने आ रही हैं।
वहीं राजनैतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर चालू है, प्यासे बुन्देलखण्ड को लेकर दलों के बीच सियासत जोरों पर है । वैसे तो बुंदेलखण्ड सदियों से प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होता है लेकिन केन्द्र और राज्य में सरकार किसी की भी हो सभी ने प्रकृति की नियति को नजर अंदाज ही किया है। मनमोहन सिंह सरकार ने बुंदेलखण्ड के लिए पैकेज दिया था लेकिन इस क्षेत्र में समस्या नहीं सुलझी लोग घास खाने को मजबूर हैं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जब बुंदेलखण्ड में पद यात्रा के लिए पहुंचे तब महिलाओं ने अपनी दर्द भरी दास्तां सुनाई । कि जब बच्चे रात में खाना मांगते हैं तो महिलाएं उन्हें रोटी देने की बजाए चाटें मारकर सुला देती हैं क्योंकी उनके पास इतना अनाज नहीं की बच्चों को कई बार खाना और दूध दे सकें। ये दास्तान बुंदेलखण्ड के हर  घर की है। लोगों के पेट से उफन रही भूख प्यास की आग पर सियासत की हाड़ी जरूर लगती है लेकिन समस्या का कोई समाधान नहीं निकला । राहुल गांधी की बुंदेलखण्ड में पद यात्रा पर कोई अपत्ती नहीं लेकिन देश में सार्वधिक समय कांग्रेस ने राज किया है। उत्तर प्रदेश ने देश को सबसे ज्यादा प्रधानमंत्री दिये है काश कांग्रेस ने समझा होता की समय का निदान कैसे होगा बुंदेलखण्ड की समस्या कम वर्षा की है और ऐसा कई सदियों से होता रहा है । अगर इस बात पर कांग्रेस संवेदनशील होती तो समस्या का समाधान संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से हो सकता था, लेकिन दुर्भाग्य है कि नही हुआ । बुंदेलखण्ड की विडम्बना ये है कि यहां हीरा ग्रेनाइट की खदाने है। जंगल तेंदू पत्ता आवला से पटे पड़े हैं लेकिन इसके वाबजूद ये क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का शिकार तो है ही साथ ही अल्प वर्षा का शिकार लगातार हो रहा है।
आज बुंदेलखण्ड की हालत इतनी खराब है कि वे मृत्यु शयया पर पड़ा नजर आ रहा है ।किसानों को पहनने के लिए कपड़े और खाने को अनाज नहीं हैं। यहां तक कि‍ चारा नहीं होने की वजह से जानवर भी दम तोड़ रहे हैं। सूखे का मतलब सिर्फ पानी का संकट नहीं है। रोज़गार का भी संकट है। खेती नहीं हुई है। किसान का कर्ज़ा बढ़ गया है। आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड में 80.53 फीसदी किसान कर्जदार है। मौत की ट्रेन लगातार अपने रफ़्तार से बुन्देलखण्ड में दौड़ रही है । लाशों और जल संकट पर सियासत का माहौल गर्म है, यहां मौत की फसल अपनी रफ्तार से पक रही है । मगर उन गांव का हाल जस का तस है जहां संनाटे को चीरती किसान परिवारों की चींखें सिसकियों के साथ हमदर्दी जताने वालों की होड़ में बार-बार शर्मसार होती है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, बुंदलेखंड में 2009 में 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745, 2013 में 750 और 2014 में 58 किसानों ने आत्महत्या कर मौत को गले लगा लिया। 6 वर्षों में 3,223 किसानों ने आत्महत्या की। 2015 के आंकड़े अभी जारी नहीं हुए हैं।
कभी बुन्देलखण्ड के लोग कम पानी में जीवन जीते थे लेकिन समय के साथ साथ जल स्त्रोत नष्ट हो गये । सिंचाई के पानी की कमी,गिरते जलस्तर और सूखे की मार के कारण खेती का संकट बढ़ता गया राज्य सरकारों ने भी खेतों तक नहर द्वारा पानी पंहुचाने की उचित व्यवस्था नहीं की । ऐतिहासिक अतीत की गवाह रही इस क्षेत्र की धरती जर्जर जर्जर होती गयी। किसान हाशिये की तरफ जाते रहे और भुखमरी का शिकार हो गये। कर्ज के बोझ से दबे होने के कारण मौत को गले लगाने लगे ।
जल संरक्षण उपायों का अभाव और जल संरक्षण का परम्परागत तरीकों के प्रति उदासीनता ने इस संकट को इतना बढ़ा दिया हैकि अब समाधान के लिए ठोस उपाये करने होंगे। जल संकट की यह भयंकर समस्या केवल कुछ टैंक पानी या जल ट्रेन चलाने से समाप्त नही होगी बल्कि कोई बृहद एवम् स्थाई योजना बनाकर काम करना होगा । साथ ही किसान को आत्महत्या से बचाना है, तो उसकी जमीन, मवेशी और चारे को तो बचाना ही होगा। उसे सक्षम बनाना है, तो पहले उस तक बीज, खाद और तकनीक को वाजिब दाम मे पहुंचाना होगा। भंडारण की पर्यापत व्यवस्था करनी होगी। बाजार की समझ पैदा करनी होगी। संसाधनों के बेहतर प्रबन्धन से ही तस्वीर बदलेगी अन्यथा बच्चों के रोटी मांगने पर मां चाटें मारती रहेंगी। ये भी याद रखना होगा कि जिस देश का बचपन भूखा हो उस देश की जवानी क्या होगी।

सत्यम सिंह बघेल

प्यासे बुन्देलखण्ड में पानी पर सियासत

पिछले कुछ वर्षों से लगातार सूखा एवं जल संकट से जूझ रहे बुन्देलखण्ड में मार्च के महिने में वहां के किसानों और मजदूरों के परिवारों द्वारा अन्न की कमी के कारण घास की रोटी खाने का मामला प्रकाश में आने के बाद प्रशासन हरकत में आया था और प्रदेश सरकार व केंद्र सरकार की टीमें हालत का जायजा लेने वहां पहुंची थी। उसके बाद ही केंद्र की ओर से राहत पैकेज का ऐलान हुआ था जिसे प्रदेश सरकार ने अपेक्षा के मुताबिक नाकाफी बताया था और कहा कि प्रदेश सरकार के इंतजाम काफी हैं और उन्हें केन्द्रीय मदद की जरूरत नहीं है। लेकिन पिछले हफ्ते तक मामला सुर्ख़ियों में बने रहने तथा रेल मंत्रालय द्वारा पानी की एक ट्रेन झांसी भेजने के बाद फिर शुरू हुआ चिर-परिचित राजनीतिक ड्रामा। वर्षों पहले प्रख्यात फिल्म निर्माता एमएस. सथ्यू की फिल्म ‘सूखा’ (1980) के अंत में डायलॉग था कि इस देश में सूखे पर भी राजनीति होती है। हालात इन 36 वर्षों में कुछ भी बदले नहीं हैं ।
केंद्र सरकार ने लातूर की तर्ज पर सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड की प्यास बुझाने के लिये जल ट्रेन भेजी लेकिन यूपी की अखिलेश सरकार ने ट्रेन का पानी लेने से यह कहते हुए मना कर दिया कि बुन्देलखण्ड में पर्याप्त पानी है और राहत कार्य चल रहें हैं । यह  केवल पानी के मुद्दे पर राज्य और केन्द्र सरकार के बीच बुंदेलखण्ड में राहत का श्रेय लेने की होड़ का नतीजा है। राज्य सरकार को भय है कि केंद्र व विपक्षी दल यह संदेश देने में कामयाब रहेंगे कि प्रदेश सरकार पानी मुहैया कराने में ठीक से काम नहीं कर रही है। हालांकि पानी की ट्रेन भेजने के पीछे रेल मंत्रालय की ऐसी कोई मंशा नहीं है। वैसे भी पहले से ही केन्द्र का गंगा सफाई अभियान अखिलेश सरकार की आंख की किरकिरी बना हुआ है। अब पानी की ट्रेन के मामले ने अखिलेश सरकार को और डरा दिया। डर यही है कि श्रेय केन्द्र की मोदी सरकार को न मिल जाए। केन्द्र के हर कार्य को राजनीति के चश्मे से देखने की सपा की फितरत ने सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड के लोगों तक पानी की ट्रेन पहुंचने ही नही दिया । सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड से लोगों का पलायन रोकने में सपा सरकार कोई ठोस उपाय धरातल पर नहीं ला पाई। लोगों के पास रोजगार नहीं है और खाद्यान्न संकट बना हुआ है। किसान लगातार आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। पानी के लिए देश बहुत हद तक मॉनसून पर निर्भर है, पिछले दो सालों से कमजोर मॉनसून ने हालात और बिगाड़ दिए। उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड का क्षेत्र जो लगातार चार वर्षो से सूखे की मार से जूझ रहा है, इन दिनों आखिर बुंदेलखंड उस हालत में पंहुच गया जिसके बारे में पांच महिने पहले ही चेताया गया था। पिछले तीन महिनों में दिल्ली, भोपाल और लखनऊ के चार सौ से ज्यादा बड़े पत्रकार बुंदेलखंड का दौरा कर चुके हैं। लेकिन बुंदेलखंड की व्यथा कथाएं लिखने के अलावा वे भी ज्यादा कुछ सुझा नहीं पाए। हर दिन किसानों की मौतों की गिनती करते रहने के अलावा कोई कुछ नहीं कर पाया।
यह इलाका एक भरे पूरे प्रदेश के बराबर है। आबादी दो करोड़ है। इसे एक नजर में देखना और दिखाना दो-चार हफ्ते का काम नहीं था। ऐसा भी नहीं है कि समझने की कोशिश बिल्कुल भी न हुई हो। हां यह अलग बात है कि देश और विश्व के स्तर पर बुंदेलखंड को समझने की जितनी भी कोशिशें हुईं वे जल प्रबंधन की प्राचीन पद्धतियों को जानने और जटिल भौगालिक परिस्थितियों को समझने की ज्यादा हुईं। सत्तर के दशक में अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रुचि वाला बंगरा वाटरशेड अध्ययन हो या अस्सी के दशक में किया गया चंदेलकालीन जल विज्ञान का अध्ययन, किसी का भी फायदा सीधे-सीधे बुंदेलखंड को मिल नहीं पाया। कारण एक ही रहा कि इलाका इतना बड़ा है कि उसके लिए राजनीतिक ईमानदारी और अच्छी खासी रकम की जरूरत थी। इस बात को इसी स्तंभ में कई बार तथ्यों के आधार पर बताया जा चुका है।
उत्तर प्रदेश में सोनभद्र से लेकर महोबा तक जल संकट अब तक के सबसे भयावह रूप में खड़ा है। खेती किसानी तो पहले से चौपट हो चुकी थी अब गृहस्थियां तबाह हो रही है, जल संकट की वजह से रोजगार ठप्प है वहीँ अंतर्राज्यीय पलायन चरम पर पहुँच गया है। गौरतलब है कि अकेले सोनभद्र जनपद से 50 से 60 हजार आदियासियों के पलायन की खबर है। खबर चौंकाने वाली मगर सच है कि पानी के अभाव में पूरे राज्य में हजारों की संख्या में मवेशियों की मौत हुई है, सोनभद्र में पिछले एक सप्ताह के दौरान कई जानवरों ने जंगलों में पानी न मिलने पर पत्थर पर सिर पटक-पटक कर अपनी जान दे दी है। यूपी में 55 जिलों में सूखे की मार है , लेकिन सरकारी तंत्र इस विपदा से निबटने में न सिर्फ नाकाम रहा है बल्कि उसका रवैया असंवेदनशील भी है। ऐसा नहीं है कि सरकारें प्रयास नहीं कर रही हैं, लेकिन आपको समझना यह है कि क्या यह प्रयास पर्याप्त है, कितना बुनियादी हल है, कितना नाम के लिए और कितना दिखावे के लिए।
आज बुंदेलखंड में अकाल जैसे हालात में सरकारें अपना मुंह छिपाने के लिए बुंदेलखंड में कुछ लोगों को रोटी और पानी बंटवाने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सकती हैं। वहां मौतों और थोक में पलायन को रोका नहीं जा सकता है। लेकिन हॉ ! अगले साल फिर ऐसे हालात से बचने के बारे में तो सोच ही सकते हैं। राज्य एवं केंद्र सरकारें तथा सभी जन प्रतिनिधि एक बार तसल्ली से बैठकर, गंभीरता से बैठकर, ईमानदारी से बैठकर जल संकट से बचने के ठोस एवं बृहद रूप से तथा स्थाई रूप से योजना बनाने के उपाय ढूंढे ।
उन्हें यह भी समझना पड़ेगा कि आपस में लड़ते रहने से मीडिया में तो बना रहा जा सकता है लेकिन वे काम नहीं हो सकते जो राजनीति के उद्देश्यों में शामिल हैं।
अगर अगले वर्ष जल संकट से बचना है तो अभी से लगना पड़ेगा। सिर्फ लगना ही नहीं पड़ेगा बल्कि युद्ध स्तर पर जुटना पड़ेगा।

सत्यम सिंह बघेल

Tuesday, May 3, 2016

क्या विधवा स्त्री समाज का अंग नही

कुछ साल पहले एक एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक पीआईएल दाखिल की थी। इसमें विधवाओं की दयनीय हालत को सुधारने की बात कही गई थी। इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से विधवाओं को पर्याप्त घर उपलब्ध कराने के लिए कहा। साथ ही मंथली ग्रांट को इस साल 1 जनवरी से 1300 से 5100 रुपए तक बढ़ाने के लिए कहा। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद केंद्र सरकार वृंदावन में एक हजार विधवाओं के रहने के लिए घर बनवाएगी। इसके लिए 57 करोड़ का बजट रखा गया है। ये घर दिसंबर 2017 तक तैयार हो जाएंगे। इनके मेन्टेनेंस के लिए हर साल 4 करोड़ रुपए दिए जाएंगे। तथा वृंदावन की विधवाओं को राहत देने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने यूपी के दूसरे शहरों और पश्चिम बंगाल, ओड़िसा और उत्तराखंड की विधवाओं को भी रिलीफ देने की ओर ध्यान दिया है । संतुलित समाज की कल्पना को साकार करने की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत ही सराहनीय और सम्मानजनक है। क्योंकि हमारे देश के अंदर समाज में विधवाओं की बहुत ही दयनीय स्थिति है । हमारे यहा विधवाओं की दूसरी शादी का चलन ही नहीं है। पति की मौत के बाद पत्नी को बाकी की जिंदगी अकेले ही बितानी होती है। भारतीय परंपरा में माना जाता है कि शादी सात जन्मों का रिश्ता है। ऐसे में विधवा स्त्री दूसरे विवाह के बारे में सोच भी नहीं सकती। पति की मौत के बाद उसे पूरे जीवन कठिनाइयों से जूझना पड़ता है। देश में कुछ ऐसे भी इलाके हैं, जहां विधवाओं को अपशकुनी या चुड़ैल मान लिया जाता है। उत्तर व मध्य भारत और नेपाल सीमा से लगे कुछ ग्रामीण इलाकों में ऐसी घटनाएं सुनने में आई हैं। ऐसे मामलों में स्थानीय पंचायतें भी कुछ नहीं कर पाती हैं। विधवाओं पर अनेक तरह की सामाजिक बंदिशे हमारे समाज में प्रचलित हैं । उनके लिए श्रृंगार तथा रंग-बिरंगे वस्र धारण करना वर्जित माना गया है। प्रायः वे काली ओढ़नी तथा सफेद छींट का घाघरा पहनते हुए सन्यास- व्रत के नियमों का पालन करती हैं। भारत में विधवाओं के खराब हाल के लिए काफी हद तक पितृसत्तामक व्यवस्था जिम्मेदार है। इस व्यवस्था के तहत परिवार के अंदर सारे अधिकार पति के पास होते हैं। ऐसे में पति की मौत होते ही महिला से सारे अधिकार छीन लिए जाते हैं और उसका शोषण शुरू हो जाता है। कहने के लिए तो देश में महिलाओं के लिए कई कानून हैं। लेकिन असल में इन कानूनों का पालन नहीं हो पाता है। अक्सर पति की मौत के बाद घर की जमीन भाइयों और बेटों में बट जाती है और विधवा महिला पूरी तरह असहाय हो जाती है। कई बार ऐसा भी होता है कि विधवा के पति अपनी मृत्यु से पहले अपनी सारी संपत्ति उसके नाम कर देते हैं, लेकिन उन्हें यह अधिकार हासिल करने के लिए कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ता है। उन्हें इसके लिए अपने बेटों से एनओसी लेना पड़ता है।
हम सब एक सामाजिक समुदाय का हिस्सा हैं। हमें सदैव एक-दूसरे की मदद करनी चाहिए, हमें एक-दूसरे की समस्याओं के बारे में पता होना चाहिए जिससे समाधान की दिशा में सही कदम उठाए जा सकें। देश भर में बड़ी संख्या में महिलाएं युद्ध, हिंसा  व बीमारी के चलते अपने पतियों को खो देती हैं और वो विधवा कहलाने लगती हैं | विधवाओं के साथ हमेशा से भेदभावपूर्ण व्यवहार होता आ रहा है। एक अनुमान के अनुसार पति की मौत के बाद अभिशाप समझकर परिवार द्वारा निकाली गईं, ऐसी महिलाओं की संख्या करीब चार करोड़ के आस-पास है | तथा वर्ष 2014 के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 5 करोड़ विधवाएं हैं, परंपरा, रीति-रिवाज के नाम पर इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा जाता है, परिवार के अंदर उन्हें बोझ समझा जाता है।
वृंदावन और बनारस में रह रही हजारों विधवायें पिछले कई सालों से समाज की मुख्यधारा से दूर एक गुमनाम जिंदगी बिता रही है। इनमें अधिकतर विधवायें पश्चिम बंगाल एवं उत्तर भारत की हैं जो पति की मौत के बाद परिवार से निकाल दी गईं और देश के कई हिस्सों में भटकने के बाद वृंदावन और बनारस के विभिन्न आश्रमों में पहुंची या खुद परिवार द्वारा यहां जबरन पहुंचा दी गई। विधवाओं की खराब स्थिति के लिए अशिक्षा एक बड़ी वजह है। जहां अशिक्षा है, वहां गरीबी होना तय है। गरीबी की वजह से विधवाओं को बुनियादी जरूरतें जैसे भोजन, कपड़े और दवाएं उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। अनपढ़ होने की वजह से इन महिलाओं को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं होता और वे चुपचाप शोषण बर्दाश्त करने को मजबूर हो जाती हैं। उनके लिए राज्य और केंद्र सरकारों की कई योजनाएं हैं, पर इनका लाभ उन तक नहीं पहुंचता। गैर समाज सेवी संस्थाओं की मदद से इनमें से कुछ को रहने और खाने का आसरा मिल जाता है ।
ईश्वर चंद्र विद्यासागर की पुस्तक "हिन्दू विधवा विवाह" के अनुसार प्राचीन भारत के इतिहास में ब्राह्मण,  उच्च राजपूत, महाजन, ढोली, चूड़ीगर तथा सांसी जातियों में विधवा विवाह वर्जित था। अन्य जातियों में विधवा विवाह प्रचलित थे। वर्ष 1853 में हुए एक अनुमान के अनुसार कोलकाता में लगभग 12,718 वेश्याएं रहती थी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर उनकी इस हालत को परिमार्जित करने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। अक्षय कुमार दत्ता के सहयोग से ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह को हिंदूसमाज में स्थान दिलवाने का कार्य प्रारंभ किया। उनके प्रयासों द्वारा 1856 में अंग्रेज़ी सरकार ने विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पारित कर इस अमानवीय मनुष्य प्रवृत्ति पर लगाम लगाने की कोशिश की। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया था। विधवा विवाह से तात्पर्य ऐसी महिला से विवाह है जिसके विवाह उपरांत उसके पति का देहांत हो गया हो और वह वैध्वय जीवन व्यतीत कर रही हो। कुलीन वर्गीय ब्राह्मणों में यह व्यवस्था थी कि पत्नी के निधन हो जाने पर वह किसी भी आयु में दूसरा विवाह कर सकते हैं। यह आयु वृद्धावस्था भी हो सकती थी। पत्नी के रूप वह किशोरवय लड़की का चयन करते थे और जब उनकी मृत्यु हो जाती थी तो उस विधवा को समाज से अलग कर उसके साथ पाश्विक व्यवहार किया जाता था। जो महिलाएं इस तरह के व्यवहार को सहन नहीं कर पाती थीं, वह खुद को समर्थन देने के लिए वेश्यावृत्ति की ओर क़दम बढ़ा लेती थीं। विधवा विवाह को बेहद घृणित दृष्टि से देखा जाता था। इसी कारण बंगाल में महिलाओं विशेषकर बाल विधवाओं की स्थिति बेहद दयनीय थी।
लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में ऐसी विधवाओं को समाज की मुख्यधारा में वापिस लाए जाने की जरूरत है। जो अपने तन पर सफेद साड़ी आते ही समाज के रिश्ते-नातों और दुनिया के रंगों से अलग कर दी जाती हैं । वे अब बदलते समय के साथ समाज की मुख्यधारा में लौटना चाहती हैं और इनमें से कई विधवाएं एक बार फिर विवाह बंधन में बंधने एवं नई जिन्दगी जीने का सपना भी देखती हैं। अत: महिलाओं को विधवा होने के बाद पुरुषों की ही तरह फिर से विवाह करने का अधिकार होना चाहिए। विधवा महिलाओं को समाज में बिल्कुल अनदेखा कर दिया जाता है, जबकि उन्हें फिर से रिश्ते जोड़ने का हक मिलना चाहिए, समाज के लोग इसमे उनका साथ दें। महिला कम उम्र में विधवा हो जाती है तो उसे पुन: घर बसाने का मौका दिया जाना चाहिए। इसके लिए समाज को एवं समाज के हर वर्ग को जागरूक होना होगा और रीति-रिवाज और परम्पराओं को परे रखकर, विधवाओं को उनके अधिकार दिलाने की अवाश्यकता है, जिस समाज में सभी को समान रूप से जीने का अधिकार है उस समाज में विधवाओं का यह अधिकार क्यों छीन लिया जाता है, उनका शोषण क्यों किया जाता है ? क्यों उन्हें अनदेखा किया जाता है ? क्यों उन्हें अछूत की दृष्टि से देखा जाता है ? क्यों उनके साथ दोहरा व्यवहार किया जाता है ? क्या वे समाज का अंग नही है ? क्यों उनके प्रति दुर्भावना रखी जाती है ? उनके साथ ऐसा नही किया जाना चाहिए उन्हें समाज में समानता का दर्जा दिया जाना चाहिए । अगर वे फिर से विवाह करना चाहती हैं तो विरोध करने की बजाये उनका साथ देना होगा, वे अगर नई जिन्दगी की शुरुआत करने का सपना देखती हैं, तो उनके अंदर सपने सकार करने का हौसला भरना चाहिए । उनकी शोषित, दुखभरी, अनदेखी दुनिया को समाप्त कर फिर से उनके जीवन को खुशियों से भर देना चाहिए । क्योंकि रीति-रिवाज इंसान के लिए हैं न कि इंसान रीति-रिवाज के लिए, अगर किसी अच्छे काम के लिए रीति-रिवाज को बदलना पड़े तो हमे बदल देना चाहिए ।

लेखक - सत्यम सिंह बघेल

किसान हितैषी बयानों से घिरी किसानों की दर्द भरी जिंदगी

किसान के लिए उसके खेत खलिहान और उसकी फसल ही उसका भविष्य, उसकी तरक्की, उसके अरमान, उम्मीदें, सबकुछ होती हैं । लेकिन जब सूखा, बाढ़, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि या फिर किसी कारण वश किसान की फसल नष्ट हो जाये तो उसका सबकुछ बर्बाद हो जाता है उसकी उम्मीदें बिखर जाती हैं, सपने चूर चूर हो जाते हैं . वर्तमान समय में भी सूखा पड़ने के कारण देश के अन्नदाता के यही हाल बने हुए हैं ।
देश के अधिकांश भागों में बारिश कम होने और सूखा पड़ने के कारण पिछले वर्ष खरीफ की फसल पूरी तरह नष्ट हुई थीं । इसके बाद ओलावृष्टि के कारण कुछ क्षेत्रों में रबी की फसल पूरी तरह चौपट हो चुकी है । इससे अन्नदाता कहे जाने वाले भारतीय किसानों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है, वह अपनी बेहताशा आर्थिक समस्याओं से जूझ रहा है ।
किसानों का जीवन अस्त-व्यस्त और बेहाल है, जीना मुसकिल हो गया है । किसान खून के आंसू पीने पर मजबूर हैं । किसान आत्महत्या करने पर विवश हैं और हमारे देश की राजनैतिक दल एवं सरकार उसकी विवशता पर उसे सहयोग देने, आर्थिक मदद करने , उसका हौसला बढ़ाने की बजाये उसकी इस दशा पर सिर्फ अपनी राजनैतिक सियासत की गोटियाँ खेल रहे हैं । अब मप्र के किसानों के हाल ही देख लीजिये । वहां पिछले रबी के सीजन में भारी ओलावृष्टि से कुछ जगह फ़सलें पूरी तरह चौपट हो चुकी हैं । ओलावृष्टि से चौपट हुई फसलों का सर्वे भी हुआ। नुकसान की रिपोट भी तैयार हुई । उस समय ओलावृष्टि से पीड़ित किसानों की बदहाल दशा पर खूब राजनीति भी हुई । सभी दल के नेताओं ने खेतों में जाकर नष्ट हुई फसल और पीड़ित किसानों के साथ खूब फोटो निकलवाया । बढ़-चढ़कर बयान बाजी हुई । खूब घोषणाएं हुई, हर संभव मदद की दिलाशाएं दी गई । सरकार द्वारा बिजली बिल माफ़ करने, इस वर्ष ऋण वसूली स्थगित करने, पीड़ित किसानों को एक रुपया किलो चावल, नमक, गेहूं देने की घोषणा की गई, जल्द से जल्द मुआवजा देने का वादा किया गया लेकिन अभी तक किसानों को कोई मदद नही मिल पाई । समय बीता समय के साथ सारी घोषणा, अस्वासन, वादे सब के सब ठंडे बस्ते में चला गया, अब किसानों के हाल जानने वाला कोई नही है
ऐसा नही है कि किसानो की यह स्थिति केवल वर्तमान समय में है । किसानों की यह दयनीय दशा हमेशा से बनी हुई है । चाहे वह कांग्रेस की सरकार को या भाजपा की सरकार सभी के कार्यकाल में किसानों का शोषण हुआ है, उन्हें अनदेखा किया गया है, उनकी दयनीय दशा पर हमेशा से राजनीति हुई है ।
जब से देश आजाद हुआ तब से अपनी समस्याओं के चलते किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं। आर्थिक तंगी से जूझ रहे किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े निरंतर बढ़ते ही जा रहे हैं । राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार भारत भर में 2008 में 16196 किसानों ने आत्महत्याएं की थी । 2009 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या में 1172 की वृद्धि हुई थी, अत: 2009 के दौरान 17368 किसानों द्वारा आत्महत्या की आधिकारिक रपट दर्ज हुई. राष्ट्रीय अपराध लेखा कार्यालय द्वारा प्रस्तुत किए गए आंकड़ों के अनुसार 1994 से 2011 के बीच 17 वर्ष में 7 लाख, 50 हजार, 860 किसानों ने आत्महत्या की हैं । सरकार की तमाम कोशिशों और दावों के बावजूद कर्ज के बोझ तले दबे किसानों की आत्महत्या का सिलसिला रूक नहीं रहा है, देश में हर महीने 70 से अधिक किसान आत्महत्या कर रहे हैं । वहीं केवल यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र में इस वर्ष आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 500 पहुँच गई है, इस क्षेत्र में पिछले 10 वर्षों में 5000 लोग आत्महत्या कर चुकें । बुंदेलखंड के लोग घास की रोटी और घास की ही चटनी खाने को मजबूर हैं ।
महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र की स्थिति सभी को मालूम है, जहाँ लोगों के पास पीने तक को पानी नही है उस क्षेत्र के किसानों की क्या दशा होगी । यह सब सोचकर मन बहुत ज्यादा विचलित हो जाता है । लेकिन किसानों की इस दुखदायी घड़ी में राजनैतिक दल उनका साथ देने और उनका सहयोग करने की बजाए, उनकी इस लाचारी एवं बेवसी पर राजनीति कर रहे हैं ।
हाल ही में कुछ माह पूर्व राहुल गाँधी ने किसानों से मिलने के लिए पद यात्रा किये थे। बड़ी आस लगाकर किसान उनसे मिलने पहुंचे कि हमें हमारी समस्या से निपटने के लिए, सूखे की मार से उभरने के लिए, बारिश की चपेट से बचने के लिए सुझाव दिए जायेंगे हमारी कुछ मदद की जाएगी । लेकिन यात्रा में ऐसा कुछ नहीं हुआ, वहां हुआ तो सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और अपनी वोट बैंक की राजनीति बस, जो 65 वर्षों से हो रहा है । किसानो की कोई मदद नही, कोई सुझाव नही, किसानो की स्थिति आज भी वैसी की वैसी बनी हुई है, चाहे विदर्भ या बुन्देलखण्ड हो या फिर अन्य क्षेत्र । ऐसा क्या हुआ कि कांग्रेस को अचानक से किसानों की याद आने लगी, क्या इसलिए कि कांग्रेस का अस्तित्व अब धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है ? क्या कारण है कि कांग्रेस किसानों की हितेषी बन गई, उसे देश में हो रही नित्य प्रति किसानों की आत्महत्याएं दिखाई देने लगी, उनकी छिनती हुई जमीन याद आने लगी, उन पर अपार सहानुभूति बरसने लगी ।
वैसे ये कोई नयी बात नहीं है ये तो हमेशा से ही हो रहा है, देश के अन्नदाता कहे जाने वाले किसानों के साथ छल कपट कर उनकी भावनाओं से खिलवाड़ हमेशा से ही होता चला आ रहा है, राजनैतिक पार्टियां सिर्फ अपनी वोट बैंक की राजनीति करती आयी हैं । हम लोग हमेशा से यही कहते-सुनते आ रहे हैं, भारत एक कृषि प्रधान देश है, यह देश किसानों का देश है, इस देश के किसान भारत की जान हैं, शान हैं, किसान हमारा अन्नदाता है और ना जाने कितनी तरह की बातें करते हैं और सुनते हैं . इन बातों को अख़बारों, किताबों में पढ़ते-पढ़ते और भाषणों, समाचार चेनलों में सुनते सुनते वर्षों बीत गये, कई पीढियां गुजर गई, फिर भी आज इस देश में जो स्थिति किसानों की है वह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है और राजनैतिक दल उसकी इस हालत पर राजनीति करने में लगे हुए हैं .
हमारे द्वारा ही चुनी गई सरकारें आज इतने संवेदनशून्य हो चुकी हैं कि उन्हें किसानों की मौत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । यही नहीं सरकारें किसानों की फसल खराब होने पर उन्हें मुआवजा राशि के रूप में 6₹, से लेकर 100₹ तक देती हैं । आख़िर ये जले पर नमक छिड़कना नहीं तो और क्या है ? किसान परिश्रम, बलिदान, त्याग और सेवा के आदर्श द्वारा देश का उपकार करता है, प्रकृति का वह पुजारी तथा धरती मां का उपासक है । धन से गरीब होने पर भी वह मन का अमीर और उदार होता है । किसान अन्नदाता है, वह समाज का सच्चा हितैषी है। उसके सुख़ में ही देश का सुख़ है और उसकी समृद्धि में ही देश की समृद्धि है । लेकिन फिर भी देश राजनैतिक दल किसानों के साथ छल-कपट की राजनीति कर रहें है और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ कर रहे हैं, बार-बार सिर्फ कोरे वादे करके अपना प्रचार प्रसार करते हैं बस और कुछ नहीं । आज हम देख रहे हैं किसानों की दशा क्या है यह किसी से छुपी नहीं है, किसान आज भी गरीब, लाचार, दुखी-पीड़ित और हर तरफ से मजबूर, तंग हालात में जीवन-यापन कर रहा है
सरकारों द्वारा किसानों के लिए उचित कार्य जो करने चाहिए थे नहीं किया गया । तभी तो आज भी देश में कृषि शिक्षा के विश्वविध्यालय और कॉलेज नाम-मात्र के हैं, उनमें भी गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है। शिक्षा का ही दूसरा पहलू जिसे प्रबंधन शिक्षा की श्रेणी में रखा जा सकता है, नाम-मात्र भी नहीं है । राष्ट्रीय अथवा प्रदेश स्तर पर कृषि शिक्षा के जो विश्वविध्यालय हैं, उनमें शोध संस्थानों के अभाव में उच्चस्तरीय शोध समाप्त प्राय से हैं । कृषि शिक्षा का व्यापक प्रचार-प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों में होना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ । जिन फसलों को किसान बोना चाहते हैं, उनके लिए आवश्यक जलवायु, पानी, भूमि आदि कैसा होना चाहिए । इसका परीक्षण कर संबंधित किसानों को शिक्षित किये जाने की भी व्यवस्था कराई जानी चाहिए ताकि वह सुझावानुसार कार्य करने के लिए सहमत हो। इस हेतु अच्छी प्रजाति के बीजों की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए, बीज की बुवाई के समय कृषि क्षेत्र के तकनीकी विशेषज्ञ अपनी देखरेख में बुवाई कराएं तथा उन पर होने वाली बीमारियों, आवश्यक उर्वरकों, सिंचाई, निकाई, निराई, गुड़ाई आदि का कार्य आवश्यकतानुसार समय-समय पर कृषि विशेषज्ञों के निर्देशन में कराया जाना चाहिए, इससे उत्पादन बढ़ेगा एवं किसान समृद्ध होगा । किसान समृद्ध होगा तभी तो देश समृद्ध होगा ।

लेखक – सत्यम सिंह बघेल

Sunday, May 1, 2016

बाल मजदूरी : भारत का भविष्य अंधकार के आगोश में

इंसान के लिए बचपन की यादें उसकी जिन्दगी में सबसे बेहतरीन और यादगार पल के रूप में होती हैं, न किसी बात की फ़िक्र, न ही कोई काम और न ही कोई जिम्मेदारी। बस हर पल हर घड़ी खेलते कूदते रहना, पढ़ना-लिखना, आराम करना और अपनी मस्तियों में खोए रहना और ख़ुशी-ख़ुशी जीना । लेकिन समाज में हर किसी का बचपन ऐसा ही हसीन हो यह जरूरी नहीं, आज भी समाज में एक बहुत बड़ा तबका ऐसा भी है, जो इन सब बातों से अनभिज्ञ है, जो अपनी दैनिक जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है | समाज का यह वर्ग बचपन से ही अपनी आर्थिक-सामाजिक समस्याओं से जूझ रहा है, मुसीबतों से लड़ रहा है | अपनी गरीबी, निर्धनता, लाचारी के कारण मजदूरी करने के लिए बेबस है | हमारे समाज में आज बहुत अधिक संख्या में 14 वर्ष से भी कम उम्र के बच्चे मजदूरी करने के लिए विवश हैं, जिसे हम बाल मजदूरी कहते हैं |  
दुनिया के कई देशों में आज भी बच्चों को बचपन नसीब नहीं है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 12 जून बाल मजदूरी के विरोध का दिन है, अंतरराष्ट्रीय मजदूर संगठन आईएलओ 2002 से हर साल इसे मना रहा है, लेकिन फिर भी दुनिया भर में बड़ी संख्या में बच्चे मजदूरी कर रहे हैं, इनका आसानी से शोषण हो सकता है | उनसे काम दबा छिपा के करवाया जाता है, वे परिवार से दूर अकेले इस शोषण का शिकार होते हैं, घरों में काम करने वाले बच्चों के साथ बुरा व्यवहार बहुत आम बात है | वैश्विक स्तर पर देखें तो सभी गरीब और विकासशील देशों में बाल मजदूरी बड़ी समस्या बनी हुई है | दुनिया में ऐसे 71 देश हैं जहां बच्चों से मजदूरी करवाई जाती है, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की नई रिपोर्ट में 140 देशों का आंकलन किया गया है | 'फाइंडिंग्स ऑन द वर्स्ट फॉर्म्स ऑफ चाइल्ड लेबर' नाम की इस रिपोर्ट में ऐसी 130 चीजों की सूची बनाई गई है जिन्हें बनाने के लिए बच्चों से काम करवाया जाता है | इस रिपोर्ट में बताया गया है कि ईंटें तैयार करने से लेकर मोबाइल फोन के पुर्जे बनाने तक के कई काम बच्चों से लिए जाते है | इसकी मुख्य वजह यही है कि मालिक सस्ता मजदूर चाहता है, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने बाल मजदूरी पर 130 ऐसी चीजों की सूची बनाई है, जिनके निर्माण में बच्चों से काम करवाया जाता है, इस सूची में सबसे ज्यादा बीस उत्पाद भारत में बनाए जाते हैं, इनमें बीड़ी, पटाखे, माचिस, ईट, जूते, कांच की चूड़ियां, ताले, इत्र, कालीन कढ़ाई, रेशम के कपड़े और  फुटबॉल बनाने जैसे काम शामिल हैं | आईएलओ का कहना है कि दुनिया में एक तिहाई देशों ने अब तक ऐसी सूची बनाई ही नहीं है जिस से वे तय कर सकें कि कौन से काम बच्चों के लिए हानिकारक हो सकते हैं | कई देशों में काम करने की कोई न्यूनतम उम्र तय नहीं की गई है और उन देशों में जहां बाल श्रम के खिलाफ कानून हैं वहां इनका ठीक तरह से पालन नहीं किया जाता, विकासशील देशों में बाल श्रमिकों की संख्या सब से ज्यादा है |
बाल मजदूरी की यह विकराल समस्या भारत में भी विशाल रूप धारण किये हुए है, यह देश में बहुत बड़े पैमाने में फैली हुई है | हमारे देश में तमाम सरकारी-गैरसरकारी प्रयासों के बावजूद देश में बाल मजदूरी बड़ी चुनौती बनी हुई है, नगरों-महानगरों से लेकर गांव कस्बों तक घरों से लेकर छोटे-बड़े ढाबों, दुकानों और सार्वजनिक संस्थानों में बड़ी संख्या में बच्चों को काम करते देखना आम बात है | बीड़ी उद्योग जैसी जगह में बड़ी संख्या में बच्चे काम कर रहे हैं जो लगातार तंबाकू के संपर्क में रहने से ज्यादातर बच्चों को इसकी लत पड़ जाती है और इससे फेफड़े संबंधी रोगों का खतरा बना रहता है | ऐसे ही बड़े पैमाने पर अवैध रूप से चल रहे पटाखा और माचिस कारखानों में लगभग 50 प्रतिशत बच्चे होते हैं जिन्हें दुर्घटना के साथ-साथ सांस की बीमारी का भी खतरा बना रहता है, इसी तरह से चूड़ी निर्माण में भी बाल मजदूरों का ही पसीना होता है जहां 1000-1800 डिग्री सेल्सियस के तापमान वाली भट्टियों के सामने बिना सुरक्षा इंतजामों के बच्चे काम करते हैं, देश के कालीन उद्योग में भी लाखों बच्चे काम करते हैं, आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के कालीन उद्योग में जितने मजदूर काम करते हैं, उनमें से तकरीबन 40 प्रतिशत बाल श्रमिक होते हैं | वस्त्र और हथकरघा खिलौना उद्योग में भी, भारी संख्या में बच्चे खप रहे हैं, पश्चिम बंगाल और असम के चाय बागानों में लाखों की संख्या में बाल मजदूर काम करते हैं, इनमें से अधिसंख्या का तो कहीं कोई रिकॉर्ड ही नहीं होता, कुछ बारीक काम जैसे रेशम के कपड़े बच्चों के नन्हें नाजुक हाथों से बनवाए जाते हैं | वहीँ हमे कचरे के ढेर से  पन्नी बीनना हो या बूट पालिस की दुकान, ढाबों में बर्तन धोने का काम हो या फिर बसों-ट्रेनों में अश्लील किताबें बेचने के लिए दिन भर बस स्टैण्ड में बोझा उठाने के काम में जुटे भूखे नंगे, अधनंगे बच्चे प्रदेश के प्राय: सभी शहरों और कस्बों में मिल जाएंगे, जिन्हें कानून और समाज ने बाल श्रमिक का नाम दिया है। ये लोग यह काम मजबूरी में करते हैं, भला पेट की आग तो उन्हें बुझाना ही पड़ेगा। भूखे पेट भला बच्चे स्कूल कैसे जाएंगे और कैसे पढ़ाई करेंगे? सरकार गरीब बच्चों को स्कूलों तक लाने और साक्षरता प्रतिशत बढ़ाने के लिए विशेष अभियान चला रही है। इसके तहत गरीब बच्चों को चिन्हित कर उनका स्कूलों में एडमिशन कराया जा रहा है, लेकिन इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि ये बच्चे अपने परिवार की आर्थिक मदद करने के लिए ही इन कामों में जुटे हुए हैं। कोई पन्नी बीनकर अपने भोजन की व्यवस्था करता है, तो कोई ढाबे पर बर्तन मांझकर, तो कोई घरों में झाडू-पौछा करके।
सरकारें लाख बाल श्रम से जुड़े चाहे कितने भी कड़े कानून बना दिए जाएं, लेकिन बच्चों को उनके पेट की आग मजदूरी करने को विवश कर ही देती है। दौर चाहे सामंतों का रहा हो या फिर आज के आजाद देश का, बाल श्रमिक आज भी अमीरों के घरों से लेकर कचरे के ढेरों पर पन्नी बीनते, ढाबों पर काम करते नजर आ जाते हैं। मानवधिकार ही नहीं तमाम सरकारी-गैरसरकारी संगठन जो भी इन्हें अधिकार दिलाने की बात मंचों और समारोहों में करते हैं, उन्हे छोड़ भी दे तो सबसे अहम सवाल पेट के लिये दो वक्त की रोटी का है, जिसकी तलाश में बच्चें बोरी उठाये कचरें में रोजी और रोटी दोनों ही तलाशतें हैं। सार्वजनिक स्थलों पर बूट पलिस की बूट चमकाने में अपने बचपने की धार खो देते हैं । ढावे में साफ सफाई करने से लेकर सब्जी काटने और रोटी परोसने में यही बच्चे लगे रहते हैं । अपना बचपना बर्बाद करने के बाद उन्हें कुल दो जून का खाना भी नहीं मिल पाता है ।
यह स्थिति समाज में बालश्रम की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाती है और यह भी कि समाज में कानून का कोई खौफ नहीं है, सरकारी मशीनरी इसे नजरअंदाज करती नजर आती है,  2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 5 से 14 साल के बच्चों की आबादी 25.96 करोड़ है |  इनमें से करीब एक करोड़ बच्चे मजदूरी करते हैं, इनमें 5 से 9 साल की उम्र के करीब 25 लाख और 10 से 14 वर्ष की उम्र के 75 लाख बच्चे शामिल हैं | राज्यों की बात करें तो सबसे ज्यादा बाल मजदूर उत्तर प्रदेश (21.76 लाख) में हैं, जबकि दूसरे नम्बर पर बिहार है जहां 10.88 लाख बाल मजदूर हैं, राजस्थान में 8.48 लाख, महाराष्ट्र में 7.28 लाख तथा, मध्यप्रदेश में 7 लाख बाल मजदूर हैं |  यह सरकारी आंकड़े हैं और यह स्थिति तब है जब 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे बाल श्रम की परिभाषा के दायरे में शामिल हैं |
1992 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह कहा था कि अपनी आर्थिक व्यवस्था देखते हुए हम बाल मजदूरी को खत्म करने का काम रुक-रुककर करेंगे क्योंकि इसे एकदम से नहीं रोका जा सकता है, लेकिन भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा 32 पर सहमति नहीं दी है जिसमें बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने की बाध्यता है, 22 साल बीत जाने के बाद हम बाल मजदूरी तो खत्म नहीं कर पाए हैं | साथ ही इसके विपरीत केंद्रीय कैबिनेट ने बाल श्रम पर रोक लगाने वाले कानून को कुछ नरम बनाने की मंजूरी दे दी है | इसमें सबसे विवादास्पद संशोधन पारिवारिक कारोबार या उद्यमों, एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री और स्पोर्ट्स एक्टिविटी में संलग्न 14 साल से कम उम्र के बच्चों को बाल श्रम के दायरे से बाहर रखने का है |
बिडम्बना देखिये कि पिछले साल ही बाल मजदूरी के खिलाफ उल्लेखनीय काम करने के लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के प्रणोता कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिनका कहना है कि बच्चों से उनके सपने छीन लेने से ज्यादा गम्भीर अपराध और क्या हो सकता है, जब बच्चों को उनके माता-पिता से जुदा कर दिया जाता है, उन्हें स्कूल से हटा दिया जाता है या उन्हें तालीम हासिल करने के लिए स्कूल जाने की इजाजत न देकर कहीं मज़दूरी के लिए मजबूर किया जाता है या सड़कों पर भीख मांगने के लिए मजबूर किया जाता है, ये सब तो इंसानियत के माथे पर धब्बा है | लेकिन लगता है कैलाश सत्यार्थी की यह आवाज अभी हमारे नीति निर्माताओं के कानों तक नहीं पहुची है, तभी तो कहा जा रहा है कि बच्चों की सेहत और शिक्षा बाधित किये बिना वे घरेलू श्रम में हाथ बंटा सकते हैं, बालश्रम के विरुद्ध लागू कानून में यह संसोधन बाल श्रम और शोषण को सीमित करने के बजाय उसे बढ़ावा ही देगा | अगर चाइल्ड लेबर एक्ट को भी अच्छी तरह से लागू कर दे तो भी बहुत कुछ हो जाएगा लेकिन वो भी नहीं होता, मजदूरी कराने वालों के हिसाब से काम होता है, बच्चों से मजदूरी करवाने की जो सजा है वो बिलकुल सख्त नहीं है, या तो तीन महीने की सजा होगी या फिर 20 हजार का जुर्माना, दोनों में से एक ही सजा मिलती है तो अधिकतर लोग जुर्माना दे कर छूट जाते हैं | फिर ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई भी नहीं होती, बच्चे पुनर्वास केंद्रों में फंसे रहते हैं, वहां की हालत कैसी है ये सभी जानते हैं | भारत में बाल मजदूरों की इतनी बड़ी संख्या होने का सबसे बड़ा कारण गरीबी-लाचारी है अगर गरीबी हट जाये तो बाल मजदूरी का अंत संभव है | यदि बाल मजदूरी का अंत किया जाता है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी लेकिन इस दिशा में पहला कदम तो उठाया ही जाना चाहिए, मतलब गरीबी दूर की जानी चाहिए । देश में व्याप्त बाल मजदूरी को सामूहिक रूप से उखाड़ फेंकने की आवश्यकता है, क्योंकि यह संतुलित समाज के लिए कलंक है इसे समाप्त करना ही होगा | यदि हमें बेहतर भारत का निर्माण करना है और बच्चों के भविष्य को सुधारना है तो फिर इंतजार मत कीजिए, इस महत्वपूर्ण कार्य को तत्काल शुरू कर दीजिए। बाल मजदूरी की समस्या विकराल है लेकिन कुछ अच्छी कोशिशें भी नजर आ रही हैं, कर्मचारी संघों और नियोक्ता संगठनों के बाल मजदूरी के खिलाफ कदम उठाने के कुछ उदाहरण सामने आ रहे हैं, खासकर ग्रामीण इलाकों में, संयुक्त राष्ट्र की वेबसाइट पर लिखा है, "तमिलनाडु और मध्यप्रदेश के कर्मचारी संघों में ग्रामीण सदस्य कोशिश कर रहे हैं कि उनका गांव बाल श्रमिकहीन गांव बने, कई लोग बाल मजदूरी को खत्म करने के लिए एक साथ काम कर रहे हैं", इसी मुहिम में हमें सभी को जुड़कर एवं आन्दोलन का रूप देकर बाल मजदूरी को जड़ से समाप्त करना होगा ।

सत्यम सिंह बघेल

दहेज प्रथा से परिवारों में बढ़ती हिंसा

मीडिया में एक खबर चल रही है कि बसपा के राज्यसभा सांसद की पुत्रवधु ने संदिग्ध परिस्थितियों में लाईसेंसी पिस्तौल से सिर पर गोली मारकर आत्महत्या कर ली। सांसद के बड़े बेटे सागर कश्यप की पत्नी हिमानी ने बाथरूम में जाकर लाईसेंसी पिस्तौल से खुद को गोली मार ली। सागर खुद एमएलसी हैं ।
सांसद की पुत्रवधु हिमानी बसपा सरकार में मंत्री रह चुके बदायूं के पूर्व विधायक हीरा लाल कश्यप की बेटी थी। सांसद परिवार का दावा कर रहा था कि उनकी बहू ने खुद को बाथरूम में लॉक करके गोली मारी थी। लेकिन वहीं हिमानी के पिता का आरोप है कि दहेज प्रथा के चलते उसकी हत्या की गई है, उनका आरोप है कि ससुराल वाले आये दिन दहेज को लेकर उनकी बेटी को प्रताड़ित करते थे । सांसद परिवार आरोप को नकार रहा है, किन्तु फिलहाल राज्यसभा सांसद और उनकी पत्नी को पुत्रवधु की रहस्यमय मौत के मामले में दहेज निरोधक कानून का मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया गया । आखिर सच्चाई क्या है ? इस मामले में घटना की पूरी जांच होने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है, अभी किसी निष्कर्ष तक नही पहुंच सकते ।
अगर हिमानी की मौत दहेज की प्रताड़ना से हुई है, तो यब एक गंभीर विषय है और यह केवल उस परिवार का नही बल्कि सम्पूर्ण समाज का विषय है । एक धनवान व सभी तरह के संसाधनों से परिपूर्ण परिवार । अगर इस तरह दहेज के लिए अपनी बहु को प्रताड़ित करे  और इतना प्रताड़ित करे कि अंत में उसे मौत को गले लगाना पड़े तो यकीनन समाज के लिए यह बहुत ही गंभीर विषय है । यह घटना हमे सोचने पर मजबूर कर देती है कि आखिर समाज किस ओर जा रहा है जो सबकुछ रहते हुए भी लालचवश कुछ रुपयों के लिए । उस देवीय स्वरूपा नारी पर अत्याचार करने लगते हैं जिसकी नवरात्रि में नव दिन उपासना करते हैं, उसी नारी को प्रताड़ित करते है, उस पर हिंसा करते हैं, जिसे हम देवी मानकर पूजते हैं और सारा समाज मूकदर्शक बनकर इस कृत्य को देख रहा है । आखिर क्यों समाज इस तरह के दोयम दर्जे का व्यवहार करता है ।
समाज में दहेज़ प्रथा अमावस के गहरे अंधियारें की तरह फैली हुई है और यह कुप्रथा दिन पर दिन अपनी जड़ें मजबूत करती जा रही है | इस युग में स्त्री और पुरुष कंधे से कन्धा मिलाकर साथ चल रहे हैं, हर एक क्षेत्र में परस्पर अपना योगदान दे रहे है । फिर भी इसी समाज में देहज प्रथा के नाम पर औरतों के साथ हुए उत्पीड़न के मामले आये दिन सामने आते रहते हैं । फिर प्रश्न ये उठते हैं कि "हमारे जीवन में धन संपत्ति का कितना महत्व है ? क्यों अकारण ही हम सभी किसी न किसी पर हर बात का दोष मड़ते रहते है ? क्या हम इतने सक्षम नहीं है कि अपनी मेहनत से कुछ प्राप्त कर सके ? क्या अपने जीवन को जीने के लिए दूसरे के धन पर निर्भर होना उचित है ? क्या अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किसी की भी जान लेना उचित है ? अक्सर यह सवाल हम सब के मन को विचलित सा कर देते हैं । अगर स्त्री और पुरुष एक समान है, तो देहज प्रथा का होना कितना अनिवार्य है ? जब दोनों ही एक बराबर शिक्षित और सक्षम हैं, तो इतना भेदभाव रखना क्या उचित है ? वर्तमान दौर में स्त्री क्या कुछ नहीं कर रही है हर जगह अपने नाम का परचम लहरा रही है उदाहरण के तौर पर “चाहे वो पर्वत की सबसे ऊँची चोटी पर पहुंचना हो और या फ़ौज़ में जाना हो हर जगह अपने माता-पिता का नाम रौशन कर रही है | फिर भी आये दिन दहेज प्रथा के चलते औरते आत्महत्या कर बैठती हैं या फिर उन्हें ज़िंदा जलाकर मार दिया जाता है । पुलिस थाने में अक्सर जलाकर मार देने के मामले दर्ज होते हैं | रपट लिखायी तो जाती है मगर महिला पर इतना दबाव बना दिया जाता है कि अंत में उसको अपनी शिकायत वापस ही लेनी पड़ती है । कभी महिला को अपने माता पिता से अत्यधिक धन राशि न लाने पर ताने दिए जाते हैं, कभी उसको प्रताड़ित किया जाता है या तो फिर उसे वापस ही भेज दिया जाता है | अकारण ही उसको इतना विवश कर दिया जाता है कि वो खुद ही अपना जीवन समाप्त करने को मजबूर हो जाती है और ऐसे हालात के चलते हुए खुद को नुक्सान पंहुचा लेती है |
अभिप्राय यह है कि समाज में जो भी परम्पराये बनायीं गयी हैं वो हमारे सहयोग के लिए हैं न कि किसी को भी शोषित करने के लिए । महिला का भी बराबर का अधिकार है वो इतनी सक्षम है कि स्वयं को खुद ही उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है । इसलिए उसे असहाय या लाचार न समझें, उसका सम्मान करें, उसे नीचा न दिखायें और अपनी इच्छाओ में इतने अंधे न बने कि आप इंसान कहलाने लायक न रह जायें । क्योकि वो भी किसी की बेटी है किसी की पत्नी, बहू और माँ होने से पूर्व, ये कहना अनुचित नहीं होगा कि समाज कभी ऐसी बातों को स्वीकृति नहीं देता है, तो फिर ऐसी स्थिति में एकजुट होकर कोई भी अपना योगदान क्यों नही देता है । हर व्यक्ति को सदैव ये याद रखना चाहिए कि धन सिर्फ एक जरुरत है जिंदगी नहीं और अपनी महत्वकांशाओ को इतना न बढ़ाये जो किसी भी व्यक्ति की जान ले ले । अतः समाज को एवं समाज के हर व्यक्ति को देहज प्रथा पर रोक लगाने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए, एकजुट होकर पीड़ित महिलों की सदैव सहायता करें । एकता में बहुत शक्ति है, एकता ऊँचे से ऊँचे पर्वत को हिला सकती है, समुद्र को चीर सकती है | ऐसे शिक्षित होने का क्या लाभ है जहां कुप्रथाओ के चलते महिलायें सिर्फ शोषित होती रहें और हम सब तमाशबीन बने रहें । एक चीटी अकेले अपना खाना लेकर आने की कोशिश करती है और नहीं ला पाती, तो उसकी सहयोगी चीटियाँ उसके साथ चल पड़ती हैं, उसी तरह अगर एक इंसान अपनी आवाज़ को बुलंद करेगा उसी पहर एकजुटता प्रारम्भ होगी, और वह आवाज एक बुलन्द आवाज बन जाएगी | सदैव याद रखे कि देहज प्रथा सिर्फ एक प्रथा है उसके चलते किसी भी महिला को मानसिक और शारीरिक यातना देना उचित नहीं है, इसलिए इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज उठाना बहुत जरुरी है । इसके लिए हम सभी दोषी हैं, हम सभी को इस समाज से दहेज़ प्रथा को जड़ से उखाड़ फेकना होगा इसमे सरकार दोषी नहीं है, सरकार ने तो कानून बना दिया दहेज़ लेना-देना दोनों अपराध हैं फिर भी हम-आप नहीं मानते हैं खुलेआम कानून का उलंघन करते हैं कमजोरी हमारे और आपके अन्दर है जिसका परिणाम आपके सामने है, गलती खुद करते हैं दोष सरकार और समाज को देते हैं, सरकार और समाज दोनों का निर्माण हम आप ही ने तो किया है ।

सत्यम सिंह बघेल